मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले में कृषि क्षेत्र को नई दिशा देने और किसानों को आधुनिक व टिकाऊ तकनीकों से लैस करने के उद्देश्य से एक सराहनीय पहल की गई है। कृषि विभाग द्वारा 29 मई 2026 को बालाघाट स्थित 'आत्मा' (ATMA - Agricultural Technology Management Agency) कार्यालय में एक महत्वपूर्ण प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में मुख्य रूप से जिले के परसवाड़ा और खैरलांजी विकासखंड की 'कृषि सखियों' ने बड़े उत्साह के साथ सहभागिता की. इस प्रशिक्षण का प्राथमिक ध्येय उन्नत कृषि पद्धतियों, विशेषकर डीएसआर (DSR) तकनीक और प्राकृतिक खेती को जमीनी स्तर तक पहुंचाना था, ताकि किसान न केवल बेहतर उत्पादन ले सकें, बल्कि उनकी खेती अधिक लाभदायक और पर्यावरण के अनुकूल बने.

डीएसआर तकनीक: धान की खेती में नई क्रांति

प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान परियोजना संचालक श्री फूलसिंह मालवीय ने उपस्थित कृषि सखियों को 'डीएसआर' (Direct Seeded Rice) यानी धान की सीधी बुवाई पद्धति के बारे में विस्तार से जानकारी प्रदान की. उन्होंने बताया कि यह पद्धति वर्तमान समय में धान उत्पादन की सबसे आधुनिक और प्रभावी तकनीकों में से एक है.

डीएसआर पद्धति के लाभों पर चर्चा करते हुए उन्होंने निम्नलिखित बिंदुओं को प्रमुखता दी:

  • पानी की बचत: धान की पारंपरिक रोपाई वाली विधि में अत्यधिक जल की आवश्यकता होती है, जबकि डीएसआर में पानी की खपत काफी कम हो जाती है.

  • श्रम और समय की बचत: इस तकनीक में धान की पौध तैयार करने और फिर उसकी रोपाई करने की आवश्यकता नहीं होती, जिससे श्रम लागत में भारी कमी आती है और समय भी बचता है.

  • पर्यावरणीय लाभ: श्री मालवीय ने बताया कि पारंपरिक विधि की तुलना में डीएसआर तकनीक पर्यावरण के लिए बहुत अधिक लाभकारी है. उन्होंने स्पष्ट किया कि इस विधि से खेतों में मीथेन गैस का उत्सर्जन काफी कम हो जाता है, जो जलवायु परिवर्तन की दृष्टि से एक सकारात्मक कदम है.

श्री मालवीय ने सभी कृषि सखियों से यह आह्वान किया कि वे अपने-अपने गांव वापस जाकर किसानों को इस तकनीक के बहुआयामी लाभों से अवगत कराएं और उन्हें अधिक से अधिक प्रेरित करें ताकि इस वर्ष अधिक से अधिक किसान डीएसआर पद्धति को अपना सकें.

प्राकृतिक खेती और जैविक उर्वरकों का महत्व

प्रशिक्षण में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने पर भी विशेष जोर दिया गया. कृषि सखियों को बताया गया कि रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अंधाधुंध उपयोग से न केवल मिट्टी की उर्वरा शक्ति धीरे-धीरे समाप्त हो रही है, बल्कि मानव स्वास्थ्य पर भी इसके गंभीर दुष्प्रभाव पड़ रहे हैं.

प्राकृतिक और जैविक खेती को अपनाने के लाभों को समझाते हुए श्री मालवीय ने कहा कि:

  • भूमि की उर्वरा शक्ति: प्राकृतिक खेती मिट्टी की जैविक संरचना को पुनः जीवित करती है और उसकी उर्वरता को लंबे समय तक बनाए रखती है.

  • लागत में कमी: रसायनों पर होने वाला खर्च बचेगा, जिससे किसानों की वास्तविक आय में वृद्धि होगी.

अजोला का उपयोग और इसके जादुई लाभ

कार्यक्रम में धान की फसल में 'अजोला' के उपयोग को एक प्रभावी जैविक उर्वरक के रूप में रेखांकित किया गया. प्रशिक्षणार्थियों को बताया गया कि अजोला का उपयोग करने से मिट्टी में पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ जाती है. इसके साथ ही:

  • यह मिट्टी की नमी को लंबे समय तक बनाए रखने में सहायक होता है.

  • यह खरपतवारों को नियंत्रित करने में भी प्रभावी भूमिका निभाता है.

हरी खाद के रूप में 'ढैंचा' का महत्व

प्रशिक्षण में कृषि सखियों को हरी खाद की प्रमुख फसल 'ढैंचा' के बारे में भी महत्वपूर्ण जानकारी दी गई. बताया गया कि ढैंचा की खेती मिट्टी में जैविक कार्बन और नाइट्रोजन की मात्रा को प्रचुर मात्रा में बढ़ाती है. भूमि की गुणवत्ता में सुधार करने और अगली फसल की उत्पादकता को बढ़ाने के लिए ढैंचा एक सर्वोत्तम विकल्प है.

कृषि सखियों की भूमिका और जिम्मेदारी

प्रशिक्षण कार्यक्रम के अंत में यह स्पष्ट किया गया कि कृषि सखियां कृषि विभाग और अंतिम किसान के बीच की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी हैं. उन्हें यह जिम्मेदारी सौंपी गई है कि वे ट्रेनिंग में प्राप्त इस महत्वपूर्ण जानकारी को अपने गांवों के हर किसान तक पहुंचाएं.

यह प्रशिक्षण कार्यक्रम न केवल सूचना प्रदान करने वाला रहा, बल्कि इसने परसवाड़ा और खैरलांजी क्षेत्र की कृषि सखियों में नई ऊर्जा का संचार किया है. बालाघाट जिले में टिकाऊ और प्राकृतिक खेती के प्रसार के लिए यह एक सार्थक प्रयास सिद्ध हुआ है. कृषि विभाग की मंशा स्पष्ट है कि आने वाले समय में जिले का प्रत्येक किसान आधुनिक, कम लागत वाली और पर्यावरण के अनुकूल खेती की ओर अग्रसर हो.

Image Source: https://balaghat.mpinfo.org