मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले में जल स्रोतों की सुरक्षा और शुद्धता सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है। 'जल गंगा संवर्धन अभियान' के अंतर्गत 25 मई 2026 को बालाघाट विकासखंड के हट्टा स्थित सामुदायिक भवन में एक दिवसीय एफटीके (फील्ड टेस्टिंग किट) प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को जल की गुणवत्ता की जांच करने में सक्षम बनाना था, ताकि ग्रामीण स्तर पर बच्चों और आम नागरिकों को सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराया जा सके।

प्रशिक्षण का उद्देश्य और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की सक्रिय भागीदारी

प्रशिक्षण कार्यक्रम का संचालन लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग (पीएचई) उपखंड बालाघाट द्वारा किया गया। इसमें महिला एवं बाल विकास विभाग के लिंगा एवं हट्टा सेक्टर की कुल 53 आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और सेक्टर सुपरवाइजरों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। कार्यक्रम की शुरुआत ब्लॉक समन्वयक रानी सिंह राजपूत के कुशल मार्गदर्शन में हुई। प्रशिक्षण सत्र के दौरान डिजिटल साक्षरता और तकनीकी दक्षता पर जोर देते हुए, इन 53 आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के लिए एफटीके यूजर आईडी का निर्माण किया गया।

यह कार्य हरीश झा, शीतल मिश्रा, फनीश रंगारे, श्रुति डहाटे, मोहिनी पटले एवं रानी सिंह राजपूत की सक्रिय टीम द्वारा संपन्न कराया गया। इस तकनीकी प्रक्रिया का मुख्य लाभ यह है कि अब आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अपने मोबाइल या संबंधित पोर्टल के माध्यम से जल जांच के परिणामों को सीधे दर्ज कर सकेंगी, जिससे निगरानी प्रणाली में पारदर्शिता और गति आएगी।

फील्ड टेस्टिंग किट (FTK) का लाइव डेमो और व्यावहारिक समझ

प्रशिक्षण कार्यक्रम केवल सैद्धांतिक जानकारी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसे व्यावहारिक स्वरूप देने के लिए विशेषज्ञों ने लाइव डेमो प्रस्तुत किया। आंगनवाड़ी केंद्रों और निकटवर्ती स्कूलों से पानी के नमूने मंगवाए गए और फील्ड टेस्टिंग किट की मदद से उनकी जांच की गई। इस दौरान कार्यकर्ताओं को पानी की गुणवत्ता निर्धारित करने वाले मुख्य मापदंडों को बारीकी से समझाया गया:

  • पीएच (pH) मान: पानी के अम्लीय या क्षारीय होने की प्रकृति की जांच करना।

  • फ्लोराइड की मात्रा: पानी में फ्लोराइड के अधिक स्तर की पहचान, जिससे दांतों और हड्डियों की बीमारियों को रोका जा सके।

  • आयरन (लोहा): जल स्रोतों में आयरन की मात्रा की जांच, जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकती है।

  • पानी की कठोरता: जल में कैल्शियम और मैग्नीशियम जैसे खनिजों के स्तर को मापना।

जलजनित बीमारियों से बचाव और मानसून की तैयारी

महिला एवं बाल विकास परियोजना बालाघाट की पर्यवेक्षक मोहिनी मिश्रा ने प्रशिक्षण के दौरान कार्यकर्ताओं को विशेष निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि मानसून का मौसम जलजनित बीमारियों जैसे हैजा, टाइफाइड और पेचिश के प्रसार का खतरा बढ़ा देता है। इसलिए, यह अत्यंत आवश्यक है कि मानसून के आगमन से पूर्व सभी कार्यकर्ता अपने आवंटित क्षेत्रों के कुओं, हैंडपंपों और नल-जल योजनाओं के पानी का परीक्षण अनिवार्य रूप से करें।

इसके साथ ही, लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग बालाघाट खंड के पीएमयू सदस्य हरीश झा ने कार्य की निरंतरता पर बल दिया। उन्होंने कार्यकर्ताओं को निर्देशित किया कि पेयजल स्रोतों की जांच वर्ष में कम से कम दो बार—एक बार मानसून के पहले और दूसरी बार मानसून के पश्चात—अवश्य की जानी चाहिए। यह सुनिश्चित करेगा कि जल स्रोत पूरे वर्ष सुरक्षित और उपयोग योग्य बने रहें।

ग्राम स्तर पर निगरानी का सशक्त तंत्र

प्रशिक्षण के अंतिम चरण में आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं ने स्वयं रुचि दिखाते हुए किट का संचालन किया और अपने-अपने क्षेत्रों से लाए गए जल नमूनों का परीक्षण किया। इस अनुभव ने उनमें आत्मविश्वास भरा है। अधिकारियों का मानना है कि इस पहल से ग्राम स्तर पर जल गुणवत्ता की निगरानी का एक सशक्त तंत्र विकसित होगा। अब आंगनवाड़ी केंद्रों, स्कूलों और गांवों में शुद्ध पेयजल की निरंतर आपूर्ति को प्राथमिकता दी जा सकेगी।

कार्यक्रम में उपस्थित प्रमुख अधिकारी एवं सहभागिता

इस महत्वपूर्ण प्रशिक्षण कार्यक्रम को सफल बनाने में विभिन्न विभागों का सराहनीय समन्वय देखने को मिला। कार्यक्रम में लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग खंड कार्यालय बालाघाट से जिला समन्वयक पीएमयू शीतल मिश्रा एवं हरीश झा की उपस्थिति रही। उपखंड स्तर से ब्लॉक समन्वयक रानी सिंह राजपूत, मोहिनी पटले, श्रुति डहाटे और फनीश रंगारे ने प्रशिक्षण प्रदान किया। महिला एवं बाल विकास विभाग से पर्यवेक्षक मोहिनी पटले एवं श्रीमती गीता बारमाटे ने भी अपनी भागीदारी निभाई। संपूर्ण कार्यक्रम को सफल बनाने में महिला एवं बाल विकास परियोजना अधिकारी बालाघाट श्री शैलेन्द्र चौकसे का विशेष सहयोग और मार्गदर्शन प्राप्त हुआ।

यह प्रशिक्षण कार्यक्रम न केवल सरकारी योजनाओं को धरातल पर लाने का एक प्रयास है, बल्कि यह सामुदायिक स्वास्थ्य के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को भी दर्शाता है। बालाघाट जिले में इस तरह के प्रयासों से आने वाले समय में जलजनित बीमारियों में कमी आएगी और ग्रामीण बच्चों का स्वास्थ्य स्तर बेहतर होगा।

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