न्याय के इंतज़ार में भटकती भूरीबाई: 45 साल बाद भी नहीं मिला जमीन का हक

सागर, मध्य प्रदेश: न्याय मिलने में देरी भी एक प्रकार का अन्याय है। मध्य प्रदेश के सागर जिले में एक ऐसा मामला सामने आया है, जो इस कथन को सच साबित करता है। केसली तहसील के महुआखेड़ा गांव की बुजुर्ग महिला भूरीबाई घोषी अदालत से केस जीतने के बाद भी सरकारी तंत्र के चक्कर काटने को मजबूर है।

भूरीबाई हर मंगलवार को कलेक्ट्रेट पहुंचती हैं, जहां उन्होंने जनसुनवाई में अपनी आपबीती सुनाई और अधिकारियों को आवेदन सौंपा, न्याय की गुहार लगाई।

पांच दशकों पुराना जमीन विवाद

पीड़ित महिला भूरीबाई ने बताया कि उनके पति कपूर सिंह घोषी ने 1977-78 में महुआखेड़ा में करीब 25 एकड़ जमीन खरीदी थी। पति की मृत्यु के बाद इस जमीन पर पारिवारिक और स्थानीय विवाद शुरू हो गया। यह कानूनी मामला वर्षों तक अदालत की चौखट पर पड़ा रहा।

"मेरे पति ने खून-पसीने की कमाई से यह जमीन खरीदी थी। उनके जाने के बाद दबंगों और विरोधियों की नजर इस पर टिक गई। सालों तक मैंने अदालत के चक्कर काटे ताकि अपने हक की रक्षा कर सकूं।" — भूरीबाई घोषी, पीड़िता

अदालत से मिला हक, तहसील में अटका सीमांकन

लंबी कानूनी लड़ाई के बाद, 24 अगस्त 2023 को जिला एवं सत्र न्यायालय सागर ने भूरीबाई के पक्ष में फैसला सुनाया। लेकिन तहसील कार्यालय में सीमांकन और पैमाइश की प्रक्रिया अब भी रुकी हुई है। भूरीबाई का आरोप है कि तहसीलदार के निर्देश पर उन्होंने 500 रुपए की सरकारी फीस भी जमा कर दी, फिर भी राजस्व अमले ने जमीन नापने में दिलचस्पी नहीं दिखाई।

35 बार तहसील के चक्कर, सिर्फ मिला आश्वासन

भूरीबाई ने करीब 35 बार तहसील का चक्कर काटा, लेकिन उन्हें सिर्फ आश्वासन ही मिला। पटवारी से लेकर तहसील के अन्य अधिकारी जमीन का सीमांकन करने नहीं पहुंचे। थक-हारकर भूरीबाई ने सागर जिला मुख्यालय का रुख किया और कलेक्ट्रेट की जनसुनवाई में अधिकारियों के सामने अपनी फाइल रखी।

अधिकारियों की प्रतिक्रिया

जनसुनवाई में भूरीबाई की पीड़ा सुनकर वरिष्ठ अधिकारियों ने मामले को गंभीरता से लिया है। कलेक्ट्रेट प्रबंधन ने जल्द से जल्द जमीन का सीमांकन कराने का आश्वासन दिया है। अब देखना यह है कि इस बुजुर्ग महिला को कब तक अपनी ही जमीन का हक मिल पाता है।