बैतूल: आधुनिक समाज में जहां वृद्ध माता-पिता को घर से बाहर किए जाने की घटनाएं आम होती जा रही हैं, वहीं बैतूल की लोक अदालत में रिश्तों की अहमियत को पुनः स्थापित करने वाला एक अनोखा मामला सामने आया। 2025 की अंतिम लोक अदालत में मां और बेटे के बीच चल रहा लंबे समय से विवाद आपसी समझदारी और संवाद से समाप्त हो गया।
यह मामला प्रथम श्रेणी न्यायिक दंडाधिकारी बैतूल की अदालत से संबंधित था। पति की मृत्यु के उपरांत मिलने वाली अनुकंपा नियुक्ति में मां ने स्वयं की जगह बेटे को नौकरी दिए जाने की सहमति दी थी। इसके बावजूद घरेलू कारणों और छोटी-छोटी बातों को लेकर मां-बेटे के बीच विवाद बढ़ गया, जिसके चलते मां को अपने दूसरे बेटे और बेटियों के यहां रहने जाना पड़ा।
इस स्थिति में मां ने बेटे के खिलाफ भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 144 के तहत भरण-पोषण का आवेदन बैतूल न्यायालय में प्रस्तुत किया। बेटे की ओर से युवा अधिवक्ता रोशन मगरदे प्रकरण में उपस्थित हुए। अधिवक्ता मगरदे ने बताया कि प्रकरण के उनके संज्ञान में आते ही उन्होंने आवेदिका मां के अधिवक्ता संतोष मगरदे से चर्चा कर मामले को आपसी बातचीत के माध्यम से सुलझाने का प्रयास किया। दोनों पक्षों के अधिवक्ताओं के सहयोग और न्यायालय की समझाइश के बाद मां-बेटे के बीच सहमति बनी और तीसरी पेशी में ही राजीनामा होकर प्रकरण समाप्त हो गया।
अधिवक्ता श्री मगरदे ने कहा कि इससे पहले भी वे कई घरेलू विवादों में राजीनामा कराकर प्रकरणों का निराकरण करवा चुके हैं। उन्होंने कहा कि समाज संगठन, विशेषकर कुनबी समाज संगठन के वरिष्ठजनों की भूमिका ऐसे मामलों में अहम रहती है। परिवारों को आपस में बैठकर संवाद के माध्यम से विवाद सुलझाने चाहिए।
निष्कर्ष: धन-दौलत और मान-अपमान जीवन में आते-जाते रहते हैं, लेकिन परिवार ही हर परिस्थिति में साथ देता है। स्वस्थ समाज की पहचान मजबूत पारिवारिक रिश्तों से होती है और भारत की सबसे बड़ी ताकत उसके संयुक्त परिवार हैं, जिन्हें बचाना हम सभी की जिम्मेदारी है।
Continue With Google
Comments (0)