मध्य प्रदेश के विदिशा जिले में ग्रामीण विकास की धुरी मानी जाने वाली ग्राम पंचायतों को आर्थिक रूप से सशक्त और स्वावलंबी बनाने की दिशा में प्रशासन ने एक ठोस पहल की है। जिले की कुरवाई तहसील के भ्रमण के दौरान कलेक्टर श्री अंशुल गुप्ता ने ग्राम पंचायतों के कामकाज, अभिलेखों के संधारण और उनकी आर्थिक स्थिति का गहन जायजा लिया। इस दौरान उन्होंने पंचायत प्रतिनिधियों और संबंधित अधिकारियों को यह स्पष्ट निर्देश दिए कि ग्राम पंचायतें केवल सरकारी अनुदानों की मोहताज न रहें, बल्कि अपने स्थानीय संसाधनों का बुद्धिमत्तापूर्ण उपयोग कर आय के नवीन स्रोत विकसित करें।

आर्थिक स्वावलंबन: नवाचार और व्यवहारिक विकल्प

कलेक्टर श्री अंशुल गुप्ता ने पंचायतों के निरीक्षण के दौरान इस बात पर बल दिया कि ग्राम पंचायतें तब तक पूर्णतः विकास नहीं कर सकतीं जब तक कि वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर न हों। उन्होंने पंचायत प्रतिनिधियों को संबोधित करते हुए कहा कि स्थानीय स्तर पर उपलब्ध परिसंपत्तियों का सही प्रबंधन ही आय बढ़ाने की कुंजी है।

इस दिशा में कलेक्टर ने निम्नलिखित महत्वपूर्ण निर्देश दिए:

  • परिसंपत्तियों का सर्वे: पंचायतों में मौजूद वेयरहाउस, सामुदायिक केंद्रों, बहुउपयोगी भवनों और अन्य व्यावसायिक परिसंपत्तियों का तत्काल प्रभाव से व्यापक सर्वे किया जाए।

  • संपत्ति कर का निर्धारण: सर्वे के पश्चात इन संपत्तियों पर नियमानुसार संपत्ति कर का निर्धारण सुनिश्चित किया जाए, ताकि पंचायत के खजाने में नियमित राजस्व प्राप्त हो सके।

  • नवीन स्रोतों की खोज: कलेक्टर ने कहा कि पंचायतें अपनी भौगोलिक स्थिति के अनुसार आय के नए और व्यवहारिक विकल्प तलाशें, जिससे विकास कार्यों के लिए किसी पर निर्भर न रहना पड़े।

स्वच्छता से आमदनी: एक अनूठा मॉडल

इस भ्रमण की सबसे बड़ी विशेषता कलेक्टर का 'स्वच्छता को आय के माध्यम के रूप में देखने' का नवाचारी दृष्टिकोण रहा। उन्होंने ग्राम पंचायतों में स्वच्छता को केवल एक अभियान तक सीमित न रखकर उसे एक आर्थिक गतिविधि में बदलने का सुझाव दिया।

कलेक्टर ने विस्तार से समझाया कि कैसे स्वच्छता से आय अर्जित की जा सकती है:

  1. अपशिष्ट प्रबंधन: यदि पंचायतें अपने स्तर पर ठोस एवं तरल अपशिष्ट प्रबंधन (Solid and Liquid Waste Management) को व्यवस्थित तरीके से संचालित करें, तो इससे न केवल गांव स्वच्छ होगा बल्कि आर्थिक लाभ भी होगा।

  2. जैविक खाद का उत्पादन: उन्होंने निर्देश दिए कि गांवों के जैविक कचरे को एकत्रित कर उसका प्रसंस्करण किया जाए और उससे उच्च गुणवत्ता वाली जैविक खाद तैयार की जाए।

  3. बाजार में विक्रय: तैयार की गई इस जैविक खाद को बाजार में बेचकर पंचायतें अपनी आय में वृद्धि कर सकती हैं। इससे किसानों को किफायती दर पर बेहतर खाद उपलब्ध होगी और गांवों में एक स्वस्थ वातावरण निर्मित होगा।

पंजियों का संधारण और पारदर्शिता

पंचायतें केवल राजस्व बढ़ाने पर ही नहीं, बल्कि अपने अभिलेखों के रखरखाव में भी अनुकरणीय बनें, यह कलेक्टर की प्राथमिकता रही है। उन्होंने कुरवाई तहसील की विभिन्न पंचायतों में संधारित पंजियों और सरकारी रिकॉर्ड्स का बारीकी से निरीक्षण किया।

  • पारदर्शिता: प्रशासन का मानना है कि यदि रिकॉर्ड्स पारदर्शी होंगे, तो जनभागीदारी बढ़ेगी और गांव के विकास में पारदर्शिता आएगी।

  • अभिलेखों का अद्यतन: पंचायत प्रतिनिधियों को निर्देश दिए गए कि सभी पंजियों को अद्यतन रखा जाए और समय-समय पर ऑडिट कराया जाए ताकि शासकीय धन का सदुपयोग सुनिश्चित हो सके।

जनभागीदारी और स्वावलंबन का मंत्र

कलेक्टर श्री अंशुल गुप्ता ने अंत में पंचायत प्रतिनिधियों को प्रेरित करते हुए कहा कि गांवों को स्वावलंबी बनाने के लिए जनभागीदारी सबसे अनिवार्य तत्व है। उन्होंने कहा कि जब गांववासी स्वयं स्वच्छता और पंचायत की आय बढ़ाने की गतिविधियों में जुड़ेंगे, तो विकास की गति स्वतः बढ़ जाएगी।

विदिशा जिले के कुरवाई क्षेत्र की पंचायतों में अब इस नए विजन के साथ काम करने की तैयारी शुरू हो गई है। कलेक्टर के इन निर्देशों ने पंचायत प्रतिनिधियों के लिए एक नई दिशा प्रदान की है। उम्मीद है कि यदि इन नवाचारी उपायों को पूरी ईमानदारी के साथ लागू किया गया, तो आने वाले समय में विदिशा जिले की ग्राम पंचायतें प्रदेश के लिए विकास और स्वावलंबन का एक बेहतरीन मॉडल साबित होंगी। यह पहल ग्रामीण भारत को आत्मनिर्भर बनाने के प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के संकल्प को पूरा करने में महत्वपूर्ण योगदान देगी।

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