सीहोर विजय मालवीय

सीहोर। सर्द हवाओं ने इस बार ग्रामीण अंचल के किसानों की रगों में ठंड नहीं, बल्कि चिंता उतार दी है। सुबह हो या दोपहर सूरज जैसे छुट्टी पर चला गया हो। दिन के एक बजे भी जब कंपकंपी न थमे, तो समझिए हालात कितने भयावह हैं। गांव-गांव, चौराहे-चौराहे पर लकड़ी के अलाव धधक रहे हैं, और उन्हीं अलावों के सहारे किसान, बुजुर्ग और ग्रामीण अपने हाथ सेंकते हुए भविष्य की फसल बचाने की जद्दोजहद में लगे हैं।

किसान व समाजसेवी एमएस मेवाड़ा बताते हैं कि इस कड़ाके की सर्दी ने खेतों में लहलहाती सब्जियों पर सीधा प्रहार किया है। लौकी, गिलकी और करेला जैसी नाजुक फसलें ठंड से झुलसने लगी हैं। किसान मजबूरी में खेतों में धुआं (फॉग स्मोकिंग) कर रहे हैं ताकि तापमान का असर कुछ कम किया जा सके। यह उपाय ही फिलहाल फसलों को बचाने का आख़िरी सहारा बना हुआ है। कृषि विभाग के अधिकारियों का कहना है कि ठंड से बचाव के लिए खेतों में धुआं करना और नमी बनाए रखना आवश्यक है, लेकिन मौसम की बेरुखी किसानों की परीक्षा ले रही है। हालात इतने कठिन हैं कि गांवों में दिन के समय भी लोग खुले में काम नहीं कर पा रहे। बुजुर्ग, मजदूर और किसान अलाव के पास बैठे हुए हैं, हाथ-पांव सुन्न हो चुके हैं।

गांवों के चौराहों पर जलते अलाव केवल सर्दी से लड़ने का साधन नहीं, बल्कि यह किसानों के जज़्बे की मशाल हैं। उनकी आंखों में डर भी है और उम्मीद भी। अगर यही सर्दी कुछ दिन और रही, तो किसानों की महीनों की मेहनत मिट्टी में मिल सकती है।