शहडोल जिले के ब्यौहारी जनपद अंतर्गत ग्राम पंचायत नौढीया के ग्राम खड़हुली में सामने आए करीब 200 करोड़ रुपये के कथित शासकीय जमीन घोटाले ने अब बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक रूप ले लिया है। एक साल तक अधिकारियों के दफ्तरों में शिकायतों की फाइल घूमती रही, लेकिन कार्रवाई नहीं हुई। आखिरकार जब शिकायतकर्ता मुकेश मिश्रा न्यायालय पहुंचे, तब पूरे मामले में ऐसा मोड़ आया कि एसडीएम, तहसीलदार, पटवारी समेत 13 लोगों पर मामला दर्ज करना पड़ा।
आरोप है कि ग्राम खड़हुली की चरनोई और शासकीय जमीन को नियमों के विपरीत निजी भूमि में बदलकर गैर हकदारों के नाम दर्ज किया गया। इसके बाद करोड़ों रुपये की जमीन की खरीद-फरोख्त कर दी गई। इतना ही नहीं, सरकारी जमीन पर कब्जा और अतिक्रमण भी कराया गया। शिकायतकर्ता का दावा है कि यह पूरा खेल बिना प्रशासनिक संरक्षण के संभव नहीं था।
शिकायतकर्ता मुकेश मिश्रा पिछले एक साल से इस कथित घोटाले के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे थे। उन्होंने राजस्व विभाग, कलेक्टर कार्यालय, जनप्रतिनिधियों और शासन स्तर तक शिकायतें भेजीं। विधायक, सांसद और मंत्रियों तक दस्तावेज पहुंचाए गए, लेकिन कार्रवाई के नाम पर सिर्फ आश्वासन मिलता रहा।
मुकेश मिश्रा का आरोप है कि मामले को दबाने की कोशिश की जाती रही और प्रभावशाली लोगों के दबाव में जिम्मेदार अधिकारी कार्रवाई से बचते रहे। जब हर दरवाजा बंद हो गया तो उन्होंने न्यायालय की शरण ली।
न्यायालय ने मामले को गंभीर मानते हुए ब्यौहारी थाना प्रभारी को जांच कर प्रतिवेदन पेश करने के निर्देश दिए। पुलिस ने दस्तावेजों और राजस्व रिकॉर्ड की जांच के बाद न्यायालय में प्रतिवेदन प्रस्तुत किया, जिसमें एसडीएम, तहसीलदार, पटवारी समेत 13 लोगों के खिलाफ विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज किए जाने की जानकारी दी गई।
मामला दर्ज होने के बाद प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मचा हुआ है। जिस जमीन को वर्षों से शासकीय और चरनोई बताया जाता रहा, वह आखिर निजी हाथों में कैसे पहुंच गई, यह अब बड़ा सवाल बन गया है।
वहीं शिकायतकर्ता मुकेश मिश्रा ने एक और सनसनीखेज आरोप लगाया है। उनका कहना है कि मामला दर्ज होने के बाद उन्हें लगातार धमकी भरे फोन कॉल और मैसेज मिल रहे हैं। उन्हें शिकायत वापस लेने और चुप रहने की धमकियां दी जा रही हैं।
मुकेश मिश्रा ने मीडिया के सामने कहा कि उन्हें अपनी जान का खतरा महसूस हो रहा है, लेकिन वह पीछे हटने वाले नहीं हैं। उन्होंने कहा कि अगर इस मामले की निष्पक्ष जांच हो जाए तो कई बड़े नाम बेनकाब हो सकते हैं।
अब सवाल यह उठ रहा है कि आखिर करोड़ों रुपये की शासकीय जमीन का यह खेल किसके संरक्षण में चलता रहा? और क्या एफआईआर के बाद इस पूरे नेटवर्क पर बड़ी कार्रवाई होगी या मामला फिर फाइलों में दब जाएगा?
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