इंदौर में हाल ही में दूषित पानी पीने से हुई दर्दनाक मौतों ने पूरे मध्यप्रदेश को झकझोर कर रख दिया है। इस घटना के बाद बैतूल में दो वर्ष पूर्व दी गई एक गंभीर चेतावनी दोबारा सुर्खियों में है, जो आज प्रशासनिक लापरवाही का प्रतीक बनकर सामने आ रही है।
30 मई 2023 को समाजसेवी हेमंत चन्द्र दुबे द्वारा जिला कलेक्टर बैतूल को सौंपा गया आवेदन अब यह सवाल खड़ा करता है कि यदि समय रहते कार्रवाई की जाती, तो क्या इंदौर जैसी भयावह स्थिति से बचा जा सकता था।
आवेदन में माचना नदी और भूमिगत जल की प्रयोगशाला जांच की स्पष्ट मांग की गई थी, जिसे प्रशासन ने नजरअंदाज कर दिया।
चार नमूने, एक गंभीर संदेश
हेमंत चन्द्र दुबे ने जल प्रदूषण की गंभीरता को प्रमाणित करने के लिए चार अलग-अलग जल एवं तरल नमूने प्रस्तुत किए थे।
- माचना नदी किनारे स्थित हैंडपंप का पानी
- करबला घाट का नदी जल
- बाजार से खरीदी गई बिसलेरी पानी की बोतल
- दुकान से खरीदी गई शराब की बोतल
इन नमूनों के माध्यम से उन्होंने यह स्पष्ट करने का प्रयास किया कि आम नागरिक के पीने के पानी और व्यावसायिक उत्पादों की गुणवत्ता में कितना बड़ा अंतर है।
75 कदम अभियान की चेतावनी
“पॉलीथिन, प्लास्टिक और रासायनिक खादों के अत्यधिक उपयोग से नदी और भूमिगत जल तेजी से जहरीला होता जा रहा है।”
“75 कदम अभियान” के तहत हेमंत चन्द्र दुबे लगातार यह चेतावनी देते रहे हैं कि जल स्रोतों के संरक्षण को लेकर गंभीरता नहीं दिखाई गई, तो इसके परिणाम जानलेवा साबित होंगे।
उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि जब शराब जैसे उत्पादों की शुद्धता के लिए सख्त मानक तय हैं, तो आम जनता के पीने के पानी के लिए ऐसी कोई कठोर व्यवस्था क्यों नहीं है।
जनसुनवाई में भी अनदेखी
समाजसेवी के अनुसार, जनसुनवाई के दौरान भी जल गुणवत्ता जांच की मांग रखी गई थी, लेकिन प्रशासन की ओर से कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
उनका मानना है कि यदि उस समय नदी और भूमिगत जल की नियमित जांच और सुधार किया गया होता, तो आज इंदौर जैसी घटनाओं को रोका जा सकता था।
आरओ और बोतलबंद पानी पर निर्भर होती जनता
इंदौर की घटना ने यह कड़वा सच उजागर कर दिया है कि सुरक्षित पेयजल अब सरकारी व्यवस्था से हटकर आरओ और बोतलबंद पानी पर निर्भर हो गया है।
गरीब और मध्यम वर्ग के लोग आज भी असुरक्षित जल पीने को मजबूर हैं, जिससे गंभीर बीमारियां और असमय मौतें सामने आ रही हैं।
सुरक्षित पेयजल अब सुविधा नहीं, बल्कि जीवन-मरण का प्रश्न बन चुका है।
सरकार और नागरिक – दोनों की जिम्मेदारी
हेमंत चन्द्र दुबे का कहना है कि जल शुद्धता को लेकर सरकार और नागरिक दोनों ही अपनी जिम्मेदारी से बच रहे हैं।
जहां सरकार योजनाओं और प्रचार में व्यस्त है, वहीं नागरिक भी प्रकृति संरक्षण के प्रति उदासीन बने हुए हैं। केवल स्वच्छता पुरस्कार जीतना समाधान नहीं, बल्कि नदियों और धरती की सतत सेवा ही स्थायी समाधान है।
भविष्य के लिए सख्त चेतावनी
समाजसेवी ने चेताया कि यदि समय रहते नदी और भूमिगत जल की नियमित जांच, निगरानी और शुद्धिकरण नहीं किया गया, तो इंदौर जैसी घटनाएं अन्य शहरों और कस्बों में भी दोहराई जा सकती हैं।
दो वर्ष पुराना यह आवेदन आज और भी प्रासंगिक हो गया है, जो यह साबित करता है कि अनसुनी चेतावनियों की कीमत समाज को भारी चुकानी पड़ती है।
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