विकास की बड़ी-बड़ी बातें और जमीनी हकीकत में कितना फासला होता है, इसकी एक बानगी आज हम आपको दिखाने जा रहे हैं। एक तरफ जहां बड़े उद्योगपतियों की परियोजनाओं के लिए प्रशासन रातों-रात करोड़ों रुपयों की चमचमाती सड़कें तैयार कर देता है, वहीं दूसरी तरफ मात्र 15 फीट की दूरी पर रहने वाली आम जनता नारकीय जीवन जीने को मजबूर है। सरकारी तंत्र की इस दोहरी नीति के खिलाफ अब स्थानीय लोगों का गुस्सा फूट पड़ा है। देखिए गुना से हमारी यह विशेष ग्राउंड रिपोर्ट।
गुना में अदाणी ग्रुप की सीमेंट फैक्ट्री के लिए प्रशासन ने तत्परता दिखाते हुए करोड़ों रुपए की लागत से शानदार सड़क का निर्माण करवा दिया। यह वो रास्ता है जहां से वीआईपी गाड़ियां और भारी वाहन बिना किसी बाधा के गुजर रहे हैं।
लेकिन इस चमचमाती सड़क से महज 15 फीट की दूरी पर गुना का पटेल नगर और गुलाबगंज इलाका स्थित है। इस मुख्य मार्ग की नाली और सड़क की हालत पिछले लंबे समय से जर्जर है। प्रशासन के पास इस नाली को दुरुस्त कराने का न तो समय है और न ही बजट
बदइंतजामी का आलम यह है कि आए दिन इस अधूरी और टूटी नाली में सैकड़ों वाहन फंस रहे हैं। बाइक सवार गिरकर चोटिल हो रहे हैं, तो वहीं ऑटो और कारें इस कीचड़ नुमा नाली में फंसकर घंटों जाम का कारण बन रही हैं। स्थानीय निवासियों का कहना है कि उन्होंने कई बार जिला प्रशासन और नगर पालिका को इस समस्या से अवगत कराया, लेकिन अधिकारियों के कान पर जूं तक नहीं रेंगी।
"एक तरफ फैक्ट्री के लिए तुरंत करोड़ों की सड़क बन जाती है, लेकिन हमारी नाली ठीक करने के लिए प्रशासन के पास पैसे नहीं हैं। आए दिन बच्चे और बुजुर्ग इस नाली में गिरकर घायल हो रहे हैं। क्या हम टैक्स नहीं देते??
इस विरोधाभास ने प्रशासन की प्राथमिकता पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। सवाल यह है कि जो मुस्तैदी और बजट कॉर्पोरेट घरानों की सहूलियत के लिए दिखाया जाता है, वही मुस्तैदी जनता की बुनियादी समस्याओं को हल करने में क्यों गायब हो जाती है? क्या पटेल नगर और गुलाबगंज के लोगों को इस नरक से मुक्ति मिलेगी या प्रशासन इसी तरह आंखें मूंदे बैठा रहेगा?
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