नाम का सिविल अस्पताल, काम शून्य-

 भेरूंदा में गर्भवती महिला को फर्श पर काटना पड़ा समय, केंद्रीय मंत्री के खिलाफ फूटा जनता का गुस्सा

भेरूंदा

। करोड़ों रुपए की चमचमाती इमारत,

 आधुनिक संसाधन और कागजों पर लिखी बड़ी-बड़ी स्वास्थ्य सुविधाएं—लेकिन धरातल की हकीकत इतनी शर्मनाक कि देखकर किसी का भी कलेजा कांप जाए। भैरूंदा सिविल अस्पताल की बदहाली एक बार फिर उजागर हुई है। यह अस्पताल अब मरीजों के इलाज का केंद्र नहीं, बल्कि केवल रेफर केंद्र बनकर रह गया है। डॉक्टरों की कमी और प्रशासनिक लापरवाही के कारण यहां आने वाले गरीब और बेबस मरीजों को भगवान भरोसे छोड़ दिया जाता है। ताजा मामला मानवता को शर्मसार करने वाला है। जिसने पूरे क्षेत्र की स्वास्थ्य व्यवस्थाओं के दावों की पोल खोलकर रख दी। बीती रविवार रात सिविल अस्पताल में संवेदनहीन नजारा देखने को मिला। जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है और जिसने पूरे प्रदेश के प्रशासनिक अमले में हड़कंप मचा दिया है।जानकारी के अनुसार बीती रात एक गर्भवती महिला को प्रसव पीड़ा और गंभीर स्थिति में सिविल अस्पताल लाया गया था। परिजनों को उम्मीद थी कि आपातकालीन स्थिति में महिला को तत्काल चिकित्सा सहायता और पलंग उपलब्ध कराया जाएगा। लेकिन गर्भवती महिला को एक पलंग तक नसीब नहीं हुआ। अस्पताल के बरामदे की धूलभरी फर्श पर महिला दर्द से कराहती हुई लेटने को मजबूर हो गई। इस दौरान उसके साथ मौजूद एक अन्य महिला फर्श पर बैठकर उसे संबल देती रही। जब महिला फर्श पर तड़प रही थी तब अस्पताल का पूरा स्टाफ और ड्यूटी डॉक्टर मौके से पूरी तरह नदारद थे। करीब आधे घंटे से भी अधिक समय तक पीड़िता और उसके परिजन चीखते-चिल्लाते रहे लेकिन उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं था। अस्पताल में कोई स्टाफ न देखकर और इलाज न मिलने की स्थिति में हताश होकर परिजनों ने अपनी मरीज की जान बचाने के लिए उसे शहर से बाहर किसी अन्य अस्पताल ले जाना ही उचित समझा। जब परिजन उसे ले जाने की तैयारी कर रहे थे तब जाकर देर से पहुंचे ड्यूटी डॉक्टर और नर्सों ने खानापूर्ति के लिए महिला की जांच की और अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते हुए उसे तत्काल रेफर कर दिया।

 

 करोड़ों का परिसर, लेकिन सुविधाएं नगण्य- कहां है जनप्रतिनिधि

 

भैरूंदा का सिविल अस्पताल केवल नाम का बड़ा अस्पताल है। तात्कालिक मुख्यमंत्री रहे शिवराज सिंह चौहान ने यहां करोड़ों रुपए खर्च कर शानदार परिसर और संसाधन तो उपलब्ध करा दिए। लेकिन डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ की कमी के कारण यह विशाल इमारत केवल एक सफेद हाथी साबित हो रही है। अस्पताल में डॉक्टरों का अभाव है, जिसका सीधा खामियाजा ग्रामीण और गरीब मरीजों को भुगतना पड़ रहा है। अस्पताल के अंदरूनी सूत्रों और स्थानीय नागरिकों की मानें तो यहां केवल इंफ्रास्ट्रक्चर की ही कमी नहीं है, बल्कि यहां का कार्य संस्कृति भी पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है। अस्पताल में पदस्थ कुछ कर्मचारियों और डॉक्टरों के बीच आपसी तालमेल का अभाव है, जिसके चलते अक्सर यहां विवाद की स्थितियां निर्मित होती रहती हैं। इसके अलावा रात के समय ड्यूटी पर तैनात कर्मचारियों का व्यवहार मरीजों और उनके परिजनों के प्रति बेहद अमर्यादित, संवेदनहीन और अभद्र रहता है। मरीज जब दर्द से कराहते हैं तो उन्हें सांत्वना देने के बजाय अपशब्दों और अमर्यादित भाषा का सामना करना पड़ता है।

अस्पताल में व्याप्त कुप्रबंधन और अव्यवस्थाओं के कारण क्षेत्र में निजी अस्पतालों और डॉक्टरों का बोलबाला तेजी से बढ़ रहा है। सरकारी अस्पताल में सोनोग्राफी जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं, जिसके कारण गर्भवती महिलाओं को भारी-भरकम फीस चुकाकर निजी सेंटरों पर निर्भर रहना पड़ता है। जो गरीब मरीज निजी अस्पतालों का खर्च उठाने में सक्षम नहीं हैं, वह सीधे तौर पर इस सरकारी तंत्र की वेदी पर चढ़ रहे हैं।

 केंद्रीय मंत्री चौहान के खिलाफ जनता में आक्रोश

 

इस घटना का वीडियो सोमवार को पूरे दिन सोशल मीडिया पर जमकर वायरल होता रहा। वीडियो के सामने आने के बाद स्थानीय नागरिकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और आम जनता का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया है। लोगों ने न केवल स्वास्थ्य महकमे के अधिकारियों को आड़े हाथों लिया, बल्कि क्षेत्र के स्थानीय जनप्रतिनिधि और वर्तमान केंद्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ अपना आक्रोश व्यक्त किया। स्थानीय निवासियों का कहना है कि भेरूंदा क्षेत्र की जनता ने हमेशा शिवराज सिंह चौहान और उनके परिवार पर आंख मूंदकर भरोसा किया है। उन्हें अपार प्यार, सम्मान और रिकॉर्ड मतों से जीत की सौगात दी है। लेकिन इसके बदले में क्षेत्र की जनता को क्या मिला? केवल बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्थाएं और फर्श पर तड़पती माताएं-बहनें। लोगों ने बेहद तीखे शब्दों में कहा कि क्षेत्र के प्रति जो जिम्मेदारी केंद्रीय मंत्री को निभानी चाहिए थी।उसमें वह और उनका प्रशासनिक अमला पूरी तरह विफल साबित हो रहा है। जनता का आरोप है कि इतने बड़े कद के नेता का गृह क्षेत्र होने के बावजूद यदि सिविल अस्पताल में एक गर्भवती महिला को फर्श पर लेटना पड़ रहा है तो यह स्थानीय जनप्रतिनिधियों की चुप्पी और उदासीनता पर बड़े सवाल खड़े करता है। लोगों ने सोशल मीडिया पर अभियान चलाकर पूछा है कि आखिर न्याय और विकास के झूठे बादे कब तक