मऊगंज: भ्रष्टाचार अब कोई छिपी हुई बात नहीं रही; यह खुलेआम सड़कों पर अपनी धाक जमा रहा है। विकास की रफ्तार जहां शून्य पर है, वहीं लूट, अवैध खनन और अफसरशाही की साठगांठ रॉकेट की रफ्तार से आगे बढ़ रही है। जनता का प्रशासन और कानून से विश्वास टूटता जा रहा है।

जिले की धरती को पहले जंगल विभाग, फिर वन विभाग ने खोखला किया और अब खनिज विभाग व पुलिस की कथित मिलीभगत ने माफियाओं को बेलगाम कर दिया है। इसका सबसे ताजा उदाहरण है लौर थाना क्षेत्र के सीतापुर गांव, जहां किसान योगेंद्र सिंह की निजी जमीन पर दबंगों ने दिनदहाड़े डाका डाला।

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि नामजद शिकायत के 48 घंटे बाद भी लौर पुलिस ने एक भी आरोपी को गिरफ्तार नहीं किया।

  • आखिर अपराधियों को किसका संरक्षण हासिल है?
  • किसके फोन कॉल ने पुलिस के हाथ बांध रखे हैं?

मऊगंज में भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हैं, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि हजारों मामलों में फर्जी गवाही, अफसरों के तबादले और पुराने खुलासे भी सिस्टम को झकझोर नहीं पाए। जब रक्षक ही कागजों पर झूठी गवाही गढ़ने लगें, तो अपराधियों के हौसले बुलंद होना तय है।

सीतापुर में अवैध खनन कोई नई कहानी नहीं है। वर्षों से रात के अंधेरे में ट्रैक्टरों से पत्थरों की चोरी हो रही है। शिकायतें आती हैं, लेकिन कार्रवाई तब तक नहीं होती जब तक 'नोटों की गड्डियां' सही हाथों तक नहीं पहुँच जातीं। जैसे ही सौदा तय होता है, खदानें फिर से चालू हो जाती हैं—यहाँ कानून नहीं, कमीशन चलता है।

जब जागरूक पत्रकार इन काले कारनामों को उजागर करते हैं, तो कार्रवाई माफिया पर नहीं, बल्कि सच दिखाने वालों पर होती है। अधिकारी व्हाट्सएप ग्रुप छोड़कर भागते हैं, सवालों से बचते हैं—यह साफ संकेत है कि सच उन्हें चुभ रहा है।

कलेक्टर साहब, आपके मातहत अफसर माफियाओं के साथ बैठकर चाय पी रहे हैं और आपकी 'जीरो टॉलरेंस' नीति सीतापुर की धूल में दफन हो चुकी है।

अगर 24 घंटे के भीतर अवैध खदानों पर बुलडोजर नहीं चला और योगेंद्र सिंह के मामले में आरोपियों को जेल नहीं भेजा गया, तो यह मान लिया जाएगा कि मऊगंज जिला प्रशासन माफियाओं के आगे पूरी तरह सरेंडर कर चुका है।

अब सवाल यह नहीं है कि भ्रष्टाचार है या नहीं—सवाल यह है कि मऊगंज में कानून बचेगा या माफिया राज ही अंतिम सच बन जाएगा?