एक चौंकाने वाले मामले में, जिले के करकेली जनपद पंचायत के बड़ागांव में सरकारी दस्तावेजों में जिंदा लोगों को मृत घोषित कर दिया गया है। यह घटना न केवल प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करती है, बल्कि प्रभावित लोगों के संघर्ष की कहानी भी बयां करती है।
इस मामले के केंद्र में पंचायत सचिव की मनमानी है, जिन्होंने कुछ लोगों को गरीबी रेखा सूची से बाहर कर दिया, कुछ को अपात्र घोषित किया और दो व्यक्तियों को तो कागजों में मृत ही बता दिया।
जिंदा होकर भी मृत घोषित
सबसे दिलचस्प और चिंताजनक पहलू यह है कि जिन व्यक्तियों को मृत घोषित किया गया, वे खुद जिला पंचायत सीईओ के कार्यालय पहुंचे। अशोक द्विवेदी, जिनका नाम बीपीएल सूची से हटा दिया गया, ने बताया कि उन्हें शासकीय कर्मचारी का परिवार मान लिया गया, जबकि वे मजदूरी करके गुजर-बसर करते हैं।
जुगराज सिंह गोंड़, जिन्हें कागजों में मृत बताया गया, ने अपनी निराशा व्यक्त करते हुए कहा, "मैं आदिवासी हूं, गरीब हूं... अब अगर कागजों में मर गया हूं तो जाऊं कहां?"
सचिव पर लगे गंभीर आरोप
गांव के अन्य लोगों ने भी पंचायत सचिव पर योजनाओं से बाहर करने का आरोप लगाया है। आरोप है कि सचिव ने मनमाने तरीके से लोगों के नाम के आगे 'सरकारी नौकरी' या 'वाहन मालिक' जैसी फर्जी वजहें जोड़ दीं।
यह सचिव पहले भी विवादों में घिरे रहे हैं। 24 दिसंबर 2024 को उन्हें लोकायुक्त टीम ने रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़ा था। हालांकि, निलंबन के बाद भी उन्हें दूसरी पंचायत में जिम्मेदारी दे दी गई।
प्रशासनिक कार्रवाई का आश्वासन
मामले की गंभीरता को देखते हुए जिला पंचायत सीईओ अभय सिंह ओहरिया ने जांच का आश्वासन दिया है। उन्होंने कहा कि मामले की पूरी जांच कराई जाएगी और गड़बड़ी पाए जाने पर कार्रवाई की जाएगी।
ग्रामीणों का दर्द स्पष्ट है। वे कहते हैं कि योजनाओं का लाभ तो दूर, अब उन्हें अपने जिंदा होने का प्रमाण देना पड़ रहा है। इस घटना ने प्रशासनिक व्यवस्था पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं।
फिलहाल गांव में चर्चा है कि यहां जीते जी मरने का सर्टिफिकेट मिल रहा है, और जिंदा रहने के लिए दफ्तर के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं।

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