मध्य प्रदेश के छतरपुर से हाल ही में कुछ ऐसी तस्वीरें सामने आई हैं, जो किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को झकझोर कर रख देंगी। एक तरफ महिलाओं के गले में फांसी का फंदा है, तो दूसरी तरफ पुरुषों ने खुद को सूली पर बांध रखा है। कुछ किसान कमर तक पानी में डूबकर जल सत्याग्रह कर रहे हैं, तो कुछ अपनी ही चिताओं पर लेटे हुए हैं। यह कोई नुक्कड़ नाटक नहीं है, बल्कि यह उन आदिवासी किसानों का दर्द और खौफ है, जो देश की सबसे बड़ी नदी जोड़ो परियोजना'केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट'के कारण अपने जल, जंगल और जमीन छिन जाने का विरोध कर रहे हैं।
बीते कई दिनों से छतरपुर में चल रहा यह आंदोलन अब एक गंभीर रूप ले चुका है। जय किसान संगठन के नेता अमित भटनागर आमरण अनशन पर बैठे हैं, लेकिन प्रशासन और किसानों के बीच गतिरोध जस का तस बना हुआ है। आइए, इस पूरी खबर के हर पहलू, परियोजना के इतिहास, किसानों के दर्द, प्रशासन के दावों और इस प्रोजेक्ट में हो रहे नियमों के उल्लंघन को विस्तार से समझते हैं।
केन-बेतवा लिंक परियोजना: क्या है इसका आधार और इतिहास?
केन-बेतवा लिंक परियोजना भारत की पहली राष्ट्रीय नदी जोड़ो परियोजना है। इसका मुख्य उद्देश्य मध्य प्रदेश की केन नदी के अधिशेष पानी को बेतवा नदी में भेजना है, ताकि बुंदेलखंड के भीषण सूखा प्रभावित क्षेत्रों में पानी की किल्लत को हमेशा के लिए खत्म किया जा सके।
परियोजना का भौगोलिक महत्व:
केन नदी:
यह मध्य प्रदेश के कटनी से निकलती है और पन्ना, छतरपुर होते हुए उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में यमुना में मिल जाती है।
बेतवा नदी:
यह मध्य प्रदेश के रायसेन जिले से निकलती है, विदिशा, सागर, टीकमगढ़ होते हुए यूपी के झांसी, हमीरपुर से बहकर अंततः यमुना में मिलती है।
प्रोजेक्ट का दायरा और लागत:
नींव और योजना:
इस परियोजना की नींव दशकों पुरानी है। वर्ष 1980 में आई 'नेशनल पर्सपेक्टिव प्लान' के तहत यह पहली परियोजना है जिसे धरातल पर उतारा जा रहा है।
बजट और मंजूरी:
दिसंबर 2021 में केंद्र सरकार ने इस विशालकाय प्रोजेक्ट के लिए 44,605 करोड़ रुपये मंजूर किए थे।
शिलान्यास:
25 दिसंबर 2024 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस परियोजना के तहत बनने वाले 'दौधन बांध' की आधारशिला रखी थी। यह बांध 2031 मीटर लंबा और 77 मीटर ऊंचा होगा।
इंफ्रास्ट्रक्चर:
दोनों नदियों को जोड़ने के लिए 221 किलोमीटर लंबी लिंक नहर बनाई जाएगी, जिसमें 2 किलोमीटर लंबी सुरंग भी शामिल है।
सरकार के दावे और फायदे:
सरकार का दावा है कि इस परियोजना से हर साल लगभग 10.62 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई होगी (8.11 लाख हेक्टेयर एमपी में और 2.51 लाख हेक्टेयर यूपी में)। इसके अलावा, करीब 62 लाख लोगों को पीने का साफ पानी मिलेगा। इस प्रोजेक्ट से 103 मेगावाट हाइड्रोइलेक्ट्रिक और 27 मेगावाट सोलर एनर्जी पैदा करने का भी लक्ष्य रखा गया है। इससे मध्य प्रदेश (पन्ना, छतरपुर, टीकमगढ़, सागर, दमोह, दतिया, विदिशा, शिवपुरी, रायसेन) और उत्तर प्रदेश (बांदा, महोबा, झांसी, ललितपुर) के जिलों को सीधा फायदा होगा।
किसानों और आदिवासियों का दर्द: आखिर विरोध क्यों?
विकास के इस सुनहरे दावों के बीच एक स्याह सच भी है, जो छतरपुर के आंदोलनकारी किसानों के रूप में सामने आ रहा है। प्रदर्शन कर रहे लोगों का कहना है कि केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट के नाम पर उनकी पुश्तैनी जमीनें तो ले ली गईं, लेकिन उन्हें इसका कोई लाभ या उचित मुआवजा नहीं मिला।
किसानों के प्रमुख आरोप:
अपर्याप्त और मनमाना मुआवजा:
किसानों का आरोप है कि जमीन के एवज में जो पैसा दिया जा रहा है, वह इतना कम है कि उससे नई जगह पर जमीन खरीदना, घर बनाना और परिवार पालना पूरी तरह असंभव है।
भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद:
यह आंदोलन का सबसे गंभीर बिंदु है। ग्रामीणों का आरोप है कि प्रशासन ने लगभग 400 करोड़ रुपये का भारी भ्रष्टाचार किया है। जिन लोगों की आजीविका पूरी तरह जमीन पर निर्भर थी और जिनके पास इकलौता मकान था, उन्हें दर-दर भटकने छोड़ दिया गया। इसके विपरीत, ऐसे कई अपात्र लोगों को मोटी रकम दे दी गई, जो न तो वहां रहते हैं और न ही वहां उनकी कोई जमीन है।
बिना नोटिस के बुलडोजर कार्रवाई:
बारिश के मौसम में कई लोगों के कुएं और मकान बिना कोई पूर्व नोटिस दिए गिरा दिए गए। किसानों का दावा है कि लगभग 5000 से ज्यादा लोग बेघर हो गए हैं और उनके सामने रोजी-रोटी का गहरा संकट खड़ा हो गया है।
कानून का उल्लंघन:
भूमि अधिग्रहण अधिनियम 2013 का पालन नहीं किया गया। इसके साथ ही, विस्थापित लोगों को जहां भेजा जा रहा है, वहां बुनियादी सुविधाओं का भारी अभाव है।
दमन और पुलिस बर्बरता:
शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे लोगों पर पुलिस द्वारा डराने-धमकाने, महिलाओं पर लाठीचार्ज करने और फर्जी मुकदमे थोपने के भी गंभीर आरोप लगाए गए हैं। मध्य प्रदेश के नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने भी धरना स्थल पर पहुंचकर 80 साल की बुजुर्ग महिला पर हुए लाठीचार्ज का जिक्र करते हुए सरकार की इस कार्रवाई को अमानवीय बताया।
प्रशासन का पक्ष: कलेक्टर ने क्या कहा?
एक तरफ किसान अपनी मांगों पर अड़े हैं, तो दूसरी तरफ प्रशासन इस पूरे आंदोलन को गुमराह करने वाला बता रहा है। छतरपुर के कलेक्टर पार्थ जायसवाल ने अंग्रेजी अखबार 'द हिंदू' को दिए एक इंटरव्यू में प्रशासन का पक्ष स्पष्ट किया।
प्रशासन के मुख्य दावे:
मुआवजा पूरा बंट चुका है:
कलेक्टर का दावा है कि केन-बेतवा परियोजना से प्रभावित 100% किसानों को मुआवजा दिया जा चुका है और अब मुआवजे को लेकर कोई भी गुंजाइश बाकी नहीं है।
प्रदर्शनकारियों की असलियत:
कलेक्टर के मुताबिक, जो लोग प्रदर्शन कर रहे हैं (करीब 100 लोग), वे दरअसल केन-बेतवा परियोजना से प्रभावित ही ব্যথা नहीं हैं। वे सभी पन्ना जिले के हैं और दूसरी दो सिंचाई परियोजनाओं'मझगवां' और 'रुंझ' से प्रभावित हैं।
मांगों में बदलाव और मुआवजे में बढ़ोतरी:
प्रशासन का कहना है कि ये किसान मांग कर रहे हैं कि उन्हें भी केन-बेतवा परियोजना जैसा बड़ा पुनर्वास पैकेज दिया जाए। कलेक्टर ने जानकारी दी कि राज्य कैबिनेट ने हाल ही में मझगवां और रुंझ परियोजनाओं के पुनर्वास पैकेज में करीब 300 करोड़ रुपये बढ़ाने का फैसला किया है। इसके तहत मुआवजे की राशि को 5 लाख रुपये से बढ़ाकर 12.5 लाख रुपये कर दिया गया है।
गुमराह करने का आरोप:
प्रशासन का स्पष्ट आरोप है कि कुछ स्थानीय कार्यकर्ता ग्रामीणों को भड़का रहे हैं और केन-बेतवा परियोजना की जगह का इस्तेमाल अपने प्रदर्शन को चमकाने के लिए कर रहे हैं।
दैनिक भास्कर की रिपोर्ट: पर्यावरण और वन नियमों की अनदेखी
किसानों के प्रदर्शन के अलावा, इस परियोजना पर पर्यावरण नियमों की धज्जियां उड़ाने के भी गंभीर आरोप लग रहे हैं। दैनिक भास्कर की एक इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि फॉरेस्ट क्लीयरेंस (वन मंजूरी) के दौरान जो शर्तें रखी गई थीं, उनका खुलेआम उल्लंघन हो रहा है। मई 2017 (स्टेज 1) और अक्टूबर 2023 (स्टेज 2) में मिली फॉरेस्ट क्लीयरेंस में पर्यावरण संरक्षण और वन्यजीव सुरक्षा को लेकर कई सख्त शर्तें थीं, जो पूरी नहीं की गईं:
वृक्षारोपण और भूमि हस्तांतरण में नाकामी:
शर्त थी कि काटे गए पेड़ों के बदले पन्ना टाइगर रिजर्व के पश्चिम में 6809 हेक्टेयर गैर-वन भूमि वन विभाग को सौंपी जाएगी। 29 मार्च से 14 जून 2024 के बीच गजट नोटिफिकेशन और कागजी म्यूटेशन तो हो गया, लेकिन वन विभाग को अब तक उस जमीन का कब्जा नहीं मिला है। कारण? उस जगह पर रहने वाले परिवारों का पुनर्वास अब तक पूरा ही नहीं हो सका है।
पन्ना टाइगर रिजर्व में पावर प्लांट का प्रस्ताव:
क्लीयरेंस की सबसे प्रमुख शर्तों में से एक थी कि मुख्य वन क्षेत्र के भीतर किसी भी प्रकार का पावर हाउस या पावर प्लांट नहीं बनाया जाएगा। लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक, केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट प्राधिकरण प्रतिबंध के बावजूद पन्ना टाइगर रिजर्व के भीतर 78 मेगावाट क्षमता का पावर प्लांट लगाने का प्रस्ताव आगे बढ़ा रहा है। पर्यावरणविद् हिमांशु ठक्कर के अनुसार, आधिकारिक नक्शों में आज भी यह पावर प्लांट दर्ज है।
गांवों को सौंपने में देरी:
एक शर्त यह भी थी कि मंजूरी मिलने के 12 महीने के भीतर प्रोजेक्ट एरिया के सभी गांव वन विभाग को सौंप दिए जाएंगे। लेकिन बिना उचित विस्थापन के यह प्रक्रिया तय समय में पूरी नहीं हो पाई।
निष्कर्ष: इस पूरी तस्वीर से क्या समझ आता है?
केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट का यह पूरा विवाद भारत में 'विकास बनाम विस्थापन' की उसी पुरानी और दुखद कहानी को दोहरा रहा है। इस पूरी रिपोर्ट और घटनाक्रम से कुछ अहम निष्कर्ष निकलते हैं:
1
संवादहीनता और अविश्वास की खाई:
प्रशासन भले ही 100% मुआवजा देने का दावा कर रहा हो, लेकिन 5000 लोगों के बेघर होने के आरोप और जल सत्याग्रह जैसी तस्वीरें बताती हैं कि प्रशासन और प्रभावित आदिवासियों के बीच भारी अविश्वास है। कागजी दावों और जमीनी हकीकत में जमीन-आसमान का फर्क है।
2
पुनर्वास पहले, विस्थापन बाद में:
बिना वैकल्पिक व्यवस्था किए बारिश के मौसम में लोगों के घर तोड़ना अमानवीय है। विकास परियोजनाएं तब तक सफल नहीं हो सकतीं, जब तक प्रभावित लोगों के अधिकारों और उनके पुनर्वास को प्राथमिकता न दी जाए।
3
भ्रष्टाचार की निष्पक्ष जांच जरूरी:
अपात्र लोगों को मुआवजा मिलने और असली हकदारों को दरकिनार किए जाने के जो आरोप (400 करोड़ के घोटाले) लग रहे हैं, वह बेहद गंभीर हैं। सरकार को इसकी एक उच्च स्तरीय और पारदर्शी जांच करानी चाहिए।
4
पारिस्थितिकी के साथ खिलवाड़:
पन्ना टाइगर रिजर्व जैसे संवेदनशील इलाके में वन नियमों और फॉरेस्ट क्लीयरेंस की शर्तों का उल्लंघन भविष्य के लिए एक बड़ी पर्यावरणीय आपदा को न्योता देना है। कोर एरिया में पावर प्लांट बनाने की जिद पर्यावरण से ज्यादा ठेकेदारों के मुनाफे की तरफ इशारा करती है।
अंततः:
बुंदेलखंड की प्यास बुझाना एक नेक और जरूरी कदम है, लेकिन इसकी कीमत वहां के मूल निवासियों को बेघर करके या टाइगर रिजर्व के जंगलों को उजाड़कर नहीं चुकाई जा सकती। विकास का अर्थ केवल नहरें और बांध बनाना नहीं है, बल्कि उस विकास में अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति की सहमति और समृद्धि भी शामिल होनी चाहिए। जब तक सरकार किसानों के साथ मेज पर बैठकर इस गतिरोध को नहीं सुलझाती, तब तक पानी में डूबे ये किसान और उनकी चिताएं हमारे 'सिस्टम' पर एक बड़ा सवालिया निशान बने रहेंगे।
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