मप्र में शिक्षा का बदहाल ढर्रा : 40 प्रतिशत शिक्षकों के
पद रिक्त, 1895 स्कूल शिक्षक विहीन, 3400 स्कूल में शौचालय नहीं, तो 10 हजार स्कूलों में बिजली नहीं
सामाजिक कार्यकर्ता ने उठाई शैक्षणिक सुधार की मांग, सीएम व शिक्षा मंत्री को पत्र किया प्रेषित ।

बड़वानी -मध्यप्रदेश में 1 अप्रैल से नवीन शैक्षणिक सत्र प्रारंभ हो चुका है, लेकिन मूलभूत सुविधाओं के अभाव में प्रदेश के नौनिहालों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त नहीं हो रही है। वर्तमान में प्रदेश में 40 प्रतिशत शिक्षकों के पद रिक्त है। 5 हजार से अधिक स्कूल भवन असुरक्षित होकर जर्जर है। 3400 स्कूलों में तो शौचालय ही नहीं है। 1895 स्कूले शिक्षक विहीन है। 10 हजार स्कूलों में बिजली की सुविधा भी उपलब्ध नहीं है। ऐसे में कैसे नौनिहालों का सुरक्षित भविष्य गढ़ा जा सकता है।
इस संबंध में सामाजिक कार्यकर्ता एवं अधिवक्ता बीएल जैन (सेंधवा) ने प्रदेश की बदहाल शैक्षणिक व्यवस्था में सुधार लाने के लिए प्रदेश के मुख्यमंत्री, स्कूल शिक्षा मंत्री उदय प्रतापसिंह, जनजातीय कार्यमंत्री विजय शाह, प्रमुख सचिव जनजातीय कार्य विभाग और सचिव स्कूल शिक्षा विभाग व आयुक्त जनजातीय कार्य विभाग को पत्र प्रेषित कर अवगत कराया है। उन्होंने कहा कि देश की आजादी के 79 वर्षों के बाद भी प्रदेश की शैक्षणिक व्यवस्था बिगड़ी हुई है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 45 के तहत 14 वर्ष तक के सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा शिक्षा देने का लक्ष्य तय किया था, लेकिन प्रदेश सरकार इन लक्ष्यों तक नहीं पहुंच पाई है। जैन ने बताया कि भारत के नियत्रंक और महालेखा परीक्षक (कैग) की वर्ष 2026 की रिपोर्ट जो मप्र विधानसभा में प्रस्तुत की गई। उसमे प्रदेश की शिक्षा की गुणवत्ता बिगड़ने के साथ बुनियादी ढांचा भी ध्वस्त नजर आया।

*सुविधा तो दूर, शुद्ध पेयजल तक नहीं मिल पा रहा*
प्रस्तुत रिपोर्ट अनुसार प्रदेश में 2 लाख 89 हजार शिक्षकों के पद स्वीकृत है, इसमे 1 लाख 15 हजार 678 पद रिक्त है। प्रदेश के 83 हजार 514 स्कूलों में से 5 हजार स्कूल के भवन जर्जर होकर बच्चों के लिए सुरक्षित नहीं हैं। जबकि 3400 स्कूल में शौचालय नहीं हैं, तो 40 हजार स्कूलों में बाउंड्रीवाल नहीं है। 1895 स्कूल ऐसे हैं, जहां एक भी शिक्षक नहीं है। साथ ही हजारों स्कूलों में शुद्ध पेय जल भी उपलब्ध नहीं है। कई जगह तो तबेलों व झोपड़ियों में स्कूल संचालन हो रहा हैं।

*एक दशक में 22 लाख से अधिक विद्यार्थियों की कमी*
रिपोर्ट बताती हैं कि डिजीटल इंडिया की बात करने वाले प्रदेश के 59 हजार स्कूलों में कम्प्यूटर की सुविधा नहीं हैं। गत 10 वर्ष में कक्षा 1 से 12वीं तक 22 लाख 3 हजार विद्यार्थियों की कमी शासकीय स्कूलों में दर्ज की गई है। जबकि इन 10 वर्षों में जनसख्या मे
बढ़ोतरी हुई है। जैन के अनुसार यह आंकड़े दर्शाते हैं कि प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था में जबदस्त गिरावट आई है।
देश की सर्वोच्च अदालत ने जनवरी 2026 में प्रत्येक शासकीय व निजी स्कूल में बालिकाओं के लिए मुफ्त सेनेटरी पेड और छात्र-छात्राओं के लिए अलग-अलग शौचालय सुविधा होने के निर्देश दिए हैं। साथ ही इनका पालन नहीं करने पर कार्रवाई की बात कही है। बावजूद प्रदेश के 3400 स्कूलों में शौचालय सुविधा ही नहीं है।

*मुफ्त योजनाओं में लुट रहा बजट, शिक्षा सुविधाओं के लिए हाथ खाली*

अधिवक्ता जैन ने बड़वानी जिले का जिक्र करते हुए कहा कि इस जिले की 2 हजार 547 स्कूलों में प्रथम श्रेणी प्राचार्य के शत प्रतिशत पद और उमावि के 90 प्रतिशत प्राचायों के पद के अलावा शिक्षकों की भारी कमी हैं। साथ ही बुनियादी सुविधाओं की भी कमी है। दरअसल प्रदेश सरकार के बजट की 16 प्रतिशत राशि यानी 50 हजार लाख करोड़ की राशि मुफ्त की योजनाओं में खर्च कर व्यक्ति को श्रम से दूर कर रही है। जबकि शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत व बुनियादी सुविधाओं पर खर्च करने के लिए खजाना खाली नजर आता है।

*कमिशनखोरी-भ्रष्टाचार भी बड़ा कारण*
जैन ने कहा कि कमीशनखोरी के कारण मरम्मत और नवीन निर्माण कार्यों में भ्रष्टाचार की जड़े गहरी होने के कारण करोड़ों रुपए की शासकीय निधि का दुरूपयोग हो रहा है। दिखावे के लिए कुछ लोगों के खिलाफ निलबंन की कार्रवाई कर दी जाती हैं, लेकिन ठोस कार्रवाई के अभाव में भ्रष्टाचार की यह बेल निरंतर फल फूल रही है। उन्होंने प्रदेश के नौनिहालों के सुनहरे भविष्य के लिए तथा संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों की प्राप्ति के लिए उक्त समस्याओं का त्वरित निराकरण करने की मांग की है।