मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले के पुष्पराजगढ़ विकासखंड का गोंदा गांव आज भी विकास की मुख्यधारा से कटा हुआ है। यहां के 'पकरी पानी' टोले के हालात सरकारी दावों की पोल खोल रहे हैं। इस टोले में लगभग 50 परिवार बैगा जनजाति से ताल्लुक रखते हैं, जिन्हें सरकार ने 'संरक्षित जनजाति' घोषित किया है। परंतु, इनके लिए गांव की ऊबड़-खाबड़ और कीचड़ भरी राहें ही नियति बन चुकी हैं।
सड़क नहीं, तो संपर्क नहीं
ग्रामीणों ने जनसुनवाई में कलेक्टर को पत्र सौंपकर अपनी व्यथा व्यक्त की है। अपर कलेक्टर दिलीप पांडे ने जल्द ही सुविधाओं में विस्तार का भरोसा दिया है।
- अधूरी कनेक्टिविटी: मुख्य मार्ग से महज 0.5 किलोमीटर दूर होने के बावजूद पकरी पानी टोला पूरी तरह कटा हुआ है। ग्रामीणों का कहना है कि आखिरी बार साल 1994-95 में यहां मिट्टी-पत्थर (ग्रेवल) का काम हुआ था। तीन दशकों से इस सड़क ने डामर का चेहरा तक नहीं देखा है।
- शिक्षा और स्वास्थ्य पर संकट: बारिश के मौसम में यह मार्ग दलदल में बदल जाता है। ऐसे में गर्भवती महिलाओं को अस्पताल ले जाना हो या बच्चों को स्कूल भेजना, ग्रामीणों को जान जोखिम में डालनी पड़ती है।
संरक्षित जनजाति का दर्जा, फिर भी विकास से दूरी
बैगा जनजाति मध्य प्रदेश की उन तीन जनजातियों में शामिल है जिन्हें 'विशेष पिछड़ी जनजाति' का दर्जा प्राप्त है। भारतीय संविधान और सरकारी नीतियों के तहत इन जनजातियों के विकास के लिए विशेष अनुदान दिया जाता है। लेकिन गोंदा गांव की स्थिति बताती है कि जमीनी हकीकत कागजों से कोसों दूर है।
ग्रामीणों की गुहार: "हमें भी चाहिए सम्मान का मार्ग"
ग्रामीणों ने कलेक्टर से आग्रह किया है कि प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के माध्यम से इस मार्ग का डामरीकरण किया जाए। उन्होंने प्रशासन को चेतावनी भरे लहजे में यह भी याद दिलाया कि वे भी इस देश के नागरिक हैं और अपनी बुनियादी सुविधाओं के लिए दशकों का इंतजार अब उनकी सहनशक्ति से बाहर हो रहा है।
निष्कर्ष और प्रशासनिक जवाबदेही
जहां सरकार आदिवासी गौरव दिवस मनाती है, वहीं 'संरक्षित' कहे जाने वाले बैगा परिवार आधे किलोमीटर की सड़क के लिए दफ्तरों के चक्कर लगा रहे हैं। अब गेंद प्रशासन के पाले में है। क्या प्रशासन बैगाओं की इस मांग पर संज्ञान लेकर "पकरी पानी" के बैगा परिवारों को विकास की मुख्य सड़क से जोड़ेगा?
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