बुधनी: भूमि अधिग्रहण के विरोध में आदिवासी समाज और विभिन्न संगठनों ने तहसील कार्यालय के सामने टेंट लगाकर अनिश्चितकालीन धरना शुरू कर दिया है। सीहोर और देवास जिलों में रेलवे लाइन और राष्ट्रीय राजमार्ग निर्माण के लिए अधिग्रहित की गई भूमि के बदले में वैधानिक पुनर्वास और उचित मुआवजा नहीं मिलने से आदिवासी किसानों में असंतोष बढ़ता जा रहा है।

धरनारत संगठनों ने बताया कि 12 दिसंबर को उन्होंने राज्यपाल के नाम एक विस्तृत आवेदन सौंपा था, जिसमें भारतीय रेलवे और राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण द्वारा भूमि अर्जन, पुनर्वास और पुनर्व्यवस्थापन अधिकार अधिनियम 2013 के उल्लंघन की शिकायत की गई थी। प्रशासन से मौखिक आश्वासन मिलने के बावजूद अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है, जिससे आंदोलन की स्थिति उत्पन्न हो गई है।

धरने का नेतृत्व जय जवान युवा शक्ति (जयस) और पीलिकार संगठन के पदाधिकारी कर रहे हैं। आंदोलन में बड़ी संख्या में आदिवासी किसान शामिल हैं, जिन्होंने स्पष्ट किया कि यह आंदोलन शांतिपूर्ण रहेगा, लेकिन किसानों के अधिकारों से कोई समझौता नहीं किया जाएगा।

आदिवासी नेताओं का आरोप है कि रेलवे अधिनियम 1989 और राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम 1956 के तहत भूमि अधिग्रहण के बावजूद भूमि अर्जन, पुनर्वास और पुनर्व्यवस्थापन अधिकार अधिनियम 2013 की अनुसूचियों और धाराओं का पालन नहीं किया गया। प्रभावित किसानों को न तो पूरा मुआवजा मिला और न ही वैधानिक पुनर्वास की प्रक्रिया अपनाई गई।

  • अधिग्रहित भूमि के लिए कानून के अनुसार पूरा मुआवजा दिया जाए।
  • प्रभावित किसानों को धारा 31 के तहत पुनर्वास एवं पुनर्व्यवस्थापन का लाभ मिले।
  • किसानों की सहमति के बिना भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया रोकी जाए।
  • दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई की जाए।

आदिवासी संगठनों ने चेतावनी दी है कि जब तक उनकी मांगें पूरी नहीं होंगी, धरना जारी रहेगा और आंदोलन को जिला व संभाग स्तर तक बढ़ाया जा सकता है।