दूसरों के दोष देखने के बजाय स्वयं के भीतर झांकें, आत्मचिंतन से ही आध्यात्मिक उन्नति संभव

नेमी नगर जैन कॉलोनी, इंदौर(संवाददाता मुकेश कुमार जैन )परम पूज्य ज्येष्ठाचार्य श्री 108 सुनीलसागर जी महाराज ने आत्मकल्याण के मार्ग में बाधा बनने वाली मानवीय प्रवृत्तियों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि दूसरों को नीचा दिखाना, उनकी कमियां उजागर करना और उन्हें कमतर साबित करने का प्रयास करना आत्मिक उन्नति में बाधक है।

उन्होंने कहा कि संसार में मनुष्य के भटकने का एक प्रमुख कारण यह है कि वह स्वयं के भीतर झांकने के बजाय दूसरों के दोष खोजने में लगा रहता है। साजिशें रचना और शिकायतें करना उसकी दिनचर्या का हिस्सा बन जाता है। ऐसे में व्यक्ति बाहरी उलझनों में ही फंसा रहता है, जबकि वास्तविक आवश्यकता आत्मचिंतन करने और अपने दोषों को पहचानने की है।

आचार्य श्री ने कहा कि प्रत्येक आत्मा में परमात्मा बनने की क्षमता विद्यमान है। इस अंतर्निहित शक्ति को पहचानने के लिए व्यक्ति को अपनी दृष्टि दूसरों की कमियों से हटाकर स्वयं के सुधार पर केंद्रित करनी चाहिए। दूसरों को बदलने की अपेक्षा स्वयं में परिवर्तन लाने का प्रयास ही जीवन को सही दिशा प्रदान करता है।

उन्होंने प्रेरणा दी कि मनुष्य को दूसरों को छोटा दिखाने के बजाय स्वयं को बेहतर बनाने का प्रयास करना चाहिए। आत्मनिरीक्षण, सद्भावना और अपने दोषों को दूर करने की भावना से ही आत्मकल्याण तथा आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है।