अंतर की निर्मलता ही वास्तविक पवित्रता — आचार्य श्री सुरत्न सागराचार्य
उत्तम शौच धर्म का संदेश : लोभ और मलिनता का त्याग ही सच्ची शुचिता
(संवाददाता मुकेश कुमार जैन)।
दशलक्षण महापर्व के पावन अवसर पर उत्तम शौच धर्म की आराधना करते हुए परम पूज्य स्थविर संत श्री 108 सुरत्न सागराचार्य जी महाराज ने धर्मसभा में शुचिता एवं आत्मनिर्मलता का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि सच्ची शुचिता केवल बाहरी स्वच्छता में नहीं, बल्कि मन के भीतर व्याप्त लोभ, मलिनता एवं विकारों को दूर करने में है।
आचार्य श्री ने कहा कि मनुष्य बाहरी रूप से कितना भी स्वच्छ क्यों न हो, यदि उसके मन में लोभ और मलिन भाव बने हुए हैं तो वास्तविक पवित्रता प्राप्त नहीं हो सकती। अंतर की निर्मलता ही वास्तविक पवित्रता है। उत्तम शौच धर्म हमें अपने भावों को निर्मल करने और आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।
उन्होंने कहा कि जीवन में त्याग, संतोष और पवित्र भावों को अपनाने से आत्मा की शुद्धि होती है। लोभ एवं परिग्रह की भावना मनुष्य को भीतर से अशांत करती है, जबकि निर्मल भाव जीवन में शांति और मंगल का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
धर्मसभा में श्रद्धालुओं ने भक्तिभाव के साथ दशलक्षण धर्म की आराधना की तथा उत्तम शौच धर्म के संदेश को जीवन में आत्मसात करने का संकल्प लिया।
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