उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म से आत्मपवित्रता की ओर बढ़ने का संदेश

दसलक्षण पर्व के अंतिम दिन आचार्य आर्जवसागर महाराज ने बताया ब्रह्मचर्य का आध्यात्मिक महत्व

 

बड़ौत। (संवाददाता मुकेश जैन)।

दसलक्षण महापर्व के अंतिम एवं अत्यंत महत्वपूर्ण दिन उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म की आराधना श्रद्धा, भक्ति एवं आध्यात्मिक भावनाओं के साथ की गई। धर्मसभा में आचार्य श्री आर्जवसागर जी महाराज ने ब्रह्मचर्य धर्म की महिमा बताते हुए कहा कि इन्द्रिय-विजय, मर्यादित दृष्टि और आत्म-साधना के माध्यम से मनुष्य अपने जीवन को पवित्रता की दिशा में ले जा सकता है।

 

आचार्य श्री ने कहा कि ब्रह्मचर्य केवल इन्द्रियों के संयम तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मन, वचन और कर्म की शुद्धता का मार्ग है। उन्होंने कहा कि ब्रह्मचर्य व्रत धारण करने वाला व्यक्ति पर-स्त्री को माता, भगिनी अथवा पुत्री के समान तथा महिला पर-पुरुष को पिता, पुत्र अथवा भाई के समान सम्मान की दृष्टि से देखे। जीवन में सात व्यसनों का त्याग करते हुए संयमित आचरण अपनाना ब्रह्मचर्य की साधना को सार्थक बनाता है।

 

उन्होंने प्रेरणादायी पंक्तियों के माध्यम से कहा—

 

“सप्त-व्यसन का त्याग करे फिर, ब्रह्मचर्य-व्रत लेता जो।

पर-स्त्री को माता, भगिनी, पुत्री-सम ही समझे वो॥

महिला भी वह पर-पुरुषों को, पिता, पुत्र, सुत-सम माने।

कहा ब्रह्मचर्य-व्रतधारी, आगम ऐसा शुभ जाने॥”

 

आचार्य श्री ने दसलक्षण धर्म की संपूर्ण साधना को आत्मशुद्धि से जोड़ते हुए कहा कि क्षमा से क्रोध मिटता है, मार्दव से मान समाप्त होता है, आर्जव से छल दूर होता है, शौच से लोभ का क्षय होता है, सत्य से जीवन निखरता है, संयम से हिंसा रुकती है, तप से कर्म झड़ते हैं, त्याग से आसक्ति छूटती है, आकिञ्चन्य से ममता मिटती है और ब्रह्मचर्य से आत्मा पवित्र बनती है।

 

उन्होंने कहा कि दसलक्षण पर्व की सार्थकता तभी है, जब इन धर्मों को केवल पर्व के दिनों तक सीमित न रखकर अपने दैनिक जीवन और आचरण का हिस्सा बनाया जाए। सरलता, निष्कपटता, इन्द्रिय-संयम और आत्मचिंतन के माध्यम से व्यक्ति अपने भीतर की अशुद्धियों को दूर कर आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ सकता है।

 

धर्मसभा में उपस्थित श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री के मंगल प्रवचनों का श्रवण कर धर्मलाभ लिया। वातावरण में भक्ति, संयम और आत्मशुद्धि की भावना दिखाई दी।

 

🌿 सरलता • निष्कपटता • आत्मशुद्धि 🌿