### भगवान की भक्ति से दूर होते हैं रोग और कष्ट, जीवन में आती है निर्मलता : मुनिश्री सुप्रभसागर जी

भगवान के चरणों की पूजा से मिलती है आत्मशांति, पापों से बचने के लिए मन की निर्मलता आवश्यक

(देवली से मुकेश जैन।) कमलकारी दिगंबर जैन मंदिर में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनिश्री सुप्रभसागर महाराज ने भगवान की भक्ति, कर्मों की निर्जरा और मन की निर्मलता के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भगवान ने भव्य जीवों के लिए मुक्ति का मार्ग सरल और सुगम बनाया है। व्यक्ति को कर्मों से रहित होकर आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ना चाहिए।

मुनिश्री ने कहा कि भगवान के चरणकमलों की पूजा-अर्चना करने से श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक शांति मिलती है। पुराणों में अनेक महापुरुषों और सती-साध्वियों के उदाहरण मिलते हैं, जिन्होंने भगवान की आराधना के माध्यम से अपने जीवन के संकटों पर विजय प्राप्त की। सोम, सती, चंदना सती और मनोरमा सती जैसे उदाहरण भक्ति की शक्ति को दर्शाते हैं। उन्होंने बताया कि भगवान की भक्ति व्यक्ति को विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य और सकारात्मकता प्रदान करती है।

मुनिश्री ने कहा कि व्यक्ति अपने पापों के कारण ही दुखों का भागी बनता है। प्रतिकूलता आने पर क्रोध और अनुकूलता मिलने पर अत्यधिक प्रसन्नता में बहने के बजाय मन को स्थिर रखना चाहिए। व्यक्ति का मन स्थिर नहीं रहता, इसलिए वह बार-बार कर्मबंध करता है। मन, वचन और काय से होने वाली प्रवृत्तियों का प्रभाव आत्मा पर पड़ता है।

उन्होंने कहा कि मन में हिंसा आदि के विचार आने से भी पाप का आश्रव होता है। इसलिए व्यक्ति को अपने विचारों और आचरण पर नियंत्रण रखना चाहिए। आत्मकल्याण के लिए मन की निर्मलता, भगवान की आराधना और पाप प्रवृत्तियों से दूरी आवश्यक है। यही जीवन को सुखमय बनाने और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग है।