🌸 दशलक्षण पर्व के तृतीय दिवस गूंजा सरलता और निष्कपटता का संदेश
उत्तम आर्जव धर्म की आराधना में श्रद्धालुओं ने लिया आत्मशुद्धि का संकल्प
बड़ौत, उत्तर प्रदेश। संवाददाता मुकेश कुमार जैन।
दशलक्षण महापर्व के पावन अवसर पर बड़ौत में धर्म और अध्यात्म की अनुपम छटा देखने को मिल रही है। महापर्व के तृतीय दिवस उत्तम आर्जव धर्म की श्रद्धा एवं भक्तिभाव के साथ आराधना की जा रही है। अजितनाथ सभागार में आयोजित धार्मिक कार्यक्रम में आचार्य श्री आर्जवसागर जी महाराज की मंगलमयी वाणी से श्रद्धालुओं को सरलता, निष्कपटता और आत्मशुद्धि का संदेश प्राप्त हुआ।
आचार्य श्री ने उत्तम आर्जव धर्म की भावना को स्पष्ट करते हुए बताया कि मन, वचन और कर्म में एकरूपता ही आर्जव धर्म का मूल स्वरूप है। जहां हृदय में कपट, छल और मायाचार का त्याग होता है, वहीं जीवन में सहजता और सरलता का प्रादुर्भाव होता है।
धर्म संदेश में कहा गया—
“सरलता और निष्कपटता से भरा हृदय ही सच्चे आर्जव धर्म का स्वरूप है।”
आर्जव धर्म मनुष्य को यह प्रेरणा देता है कि वह देश, समाज, परिवार और अपने प्रियजनों के प्रति निश्छल एवं ईमानदार व्यवहार करे। मन में कुछ और, वाणी में कुछ और तथा व्यवहार में कुछ और—यह मायाचार है। इसके विपरीत मन, वचन और कर्म की एकरूपता जीवन को धर्ममय बनाती है।
दशलक्षण महापर्व आत्मशुद्धि और आत्मचिंतन का पावन अवसर है। इन दस दिनों में धर्म के दस उत्तम गुणों की आराधना के माध्यम से श्रद्धालु अपने भीतर के विकारों को दूर करने और जीवन को संयम, सदाचार एवं अध्यात्म से जोड़ने का प्रयास करते हैं।
महापर्व की भावना को अभिव्यक्त करते हुए कहा गया—
“दशलक्षण है महापर्व ये, मन में खुशियाँ भरता है।
त्याग, तपों से आत्मशुद्ध कर, जीवन सुखमय करता है॥
तीर्थंकर के धर्म-मार्ग की, प्रभावना नित होती है।
गुरु-सेवा, गुरुओं की वाणी, पाप-कर्म को धोती है॥”
कार्यक्रम के दौरान श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री आर्जवसागर जी महाराज के पावन प्रवचनों का लाभ लेते हुए सरलता, निष्कपटता और आत्मशुद्धि को अपने जीवन में उतारने की भावना व्यक्त की।
दशलक्षण पर्व का यह तीसरा दिन श्रद्धालुओं को यही संदेश दे रहा है कि बाहरी आडंबर से नहीं, बल्कि मन की सरलता और व्यवहार की निष्कपटता से आत्मा का उत्थान होता है।
स्थान — अजितनाथ सभागार, बड़ौत, उत्तर प्रदेश।
आर्जव वाणी — गुरु आर्जव वाणी, जन-जन की कल्याणी।
Continue With Google