पश्चिमी मध्यप्रदेश के झाबुआ और आलीराजपुर में दिवाली का मतलब सिर्फ लक्ष्मी पूजा नहीं है। भील बहुल इन गांवों में दिवाली की अगली सुबह गाय गौहरी होती है, जिसमें सजी हुई गायों को दौड़ाया जाता है और मन्नत वाले लोग उनके रास्ते में जमीन पर लेट जाते हैं।
MP टूरिज्म के अनुसार यह गायों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता की परंपरा है। पंचांग गणना के अनुसार इस साल लक्ष्मी पूजा 8 नवंबर को है, इसलिए गोवर्धन पूजा और गाय गौहरी की तारीख स्थानीय पंचांग और गांव की परंपरा से तय होगी।
आज जानेंगे कि-
- गाय गौहरी क्या है और कैसे मनाई जाती है?
- भील समाज में इसकी कथा क्या है?
- 2026 में यह कब होगी और देखने जाएं तो क्या ध्यान रखें?

सवाल- गाय गौहरी क्या है?
जवाब- MP टूरिज्म के गोवर्धन पूजा पेज के अनुसार झाबुआ के भील समुदाय गोवर्धन पूजा को गाय गौहरी के रूप में मनाते हैं। सबसे खास रस्म में मन्नत पूरी करने के लिए लोग जमीन पर लेट जाते हैं और गायें उनके ऊपर से गुजरती हैं। इसे श्रद्धा और आभार का प्रतीक माना जाता है।
सवाल- भील समाज के लिए गाय इतनी अहम क्यों है?
जवाब- MP टूरिज्म के अनुसार गाय और पशुपालन भील जीवन का केंद्र हैं और गायों को सिर्फ पशु नहीं, परिवार का सदस्य माना जाता है।

सवाल- गाय गौहरी कैसे होती है?
जवाब- Folklore जर्नल में 2010 में छपे सरिता सहाय के शोध और समाचार एजेंसी UNI की 2008 की रिपोर्ट के आधार पर रस्मों का क्रम समझिए…
- 1. दिवाली की सुबह पशुओं को रंग, मोर पंख और फूलों से सजाते हैं।
- 2. अगले दिन पशुओं पर पानी और चावल छिड़ककर कुमकुम लगाया जाता है।
- 3. ढोल की आवाज पर गायों को दौड़ाया जाता है और मन्नत वाले लोग हाथों से आंखें ढंककर रास्ते में लेट जाते हैं।
सवाल- भील समाज में इसकी कथा क्या है?
जवाब- सरिता सहाय के शोध में भीलों की रूपण गाय की कथा दर्ज है। कथा के अनुसार धर्मी राजा को शादी में रूपण नाम की लंगड़ी गाय मिली थी, जिसे बाद में एक गड्ढे में भेज दिया गया। सपने के बाद राजा उसी जगह पहुंचे और वहां से पशुधन निकला। राजा ने जल्दी पीछे मुड़कर देख लिया, इसलिए सिर्फ एक बैल बचा।
सवाल- झाबुआ और आलीराजपुर का रिश्ता क्या है?
जवाब- Wikipedia के अनुसार आलीराजपुर जिला 17 मई 2008 को झाबुआ से अलग होकर बना। 2011 की जनगणना के अनुसार यहां की करीब 89% आबादी अनुसूचित जनजाति की है। UNI की 2008 की रिपोर्ट झाबुआ और धार में गाय गौहरी का जिक्र करती है, तब आलीराजपुर झाबुआ का ही हिस्सा था।

सवाल- 2026 में गाय गौहरी कब होगी?
जवाब- पंचांग गणना के अनुसार इंदौर और उज्जैन क्षेत्र में गोवर्धन पूजा 9 नवंबर को दोपहर 3:31 से 5:45 बजे तक के मुहूर्त में है, जबकि भोपाल में 10 नवंबर को। झाबुआ-आलीराजपुर में गाय गौहरी दिवाली की अगली सुबह होती है, पर हर गांव अपनी परंपरा से दिन तय करता है। इसलिए जाने से पहले स्थानीय लोगों या प्रशासन से पता कर लें।
सवाल- देखने जाएं तो किन बातों का ध्यान रखें?
जवाब- यह आस्था का आयोजन है और इसमें चोट का खतरा भी रहता है। सहाय के शोध में गंभीर चोटों का जिक्र है। UNI के मुताबिक हादसों के कारण झाबुआ प्रशासन ने पशुओं को भगाने के लिए पटाखों पर रोक लगाई थी। दर्शक दूर से देखें और पटाखे न चलाएं।

गाय गौहरी की रस्में हर गांव और परिवार में अलग होती हैं, इसे उसी सम्मान से देखें।
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1. गाय गौहरी किस समुदाय का पर्व है?
सही जवाब- भील समुदाय का।
2. गाय गौहरी कब होती है?
सही जवाब- दिवाली की अगली सुबह।
3. भील कथा में गाय का नाम क्या है?
सही जवाब- रूपण।
4. आलीराजपुर जिला कब बना?
सही जवाब- 17 मई 2008, झाबुआ से अलग होकर।
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WhatsApp पर शेयर करेंयह जानकारी MP टूरिज्म, शोध पत्र, समाचार रिपोर्ट और पंचांग गणना पर आधारित है, StateNews ऐसी किसी रस्म को करने की सलाह नहीं देता।
कुछ कॉमन सवाल जवाब
गाय गौहरी क्या है?
झाबुआ के भील समुदाय का गोवर्धन पूजा पर्व, जिसमें सजी गायें मन्नत वाले लोगों के ऊपर से गुजरती हैं।
यह कब होती है?
दिवाली की अगली सुबह, गांव की परंपरा के अनुसार।
लोग गायों के आगे क्यों लेटते हैं?
MP टूरिज्म के अनुसार मन्नत पूरी करने के लिए।
क्या आलीराजपुर भी झाबुआ का हिस्सा था?
हां, आलीराजपुर 2008 में झाबुआ से अलग होकर जिला बना।
स्रोत, MP टूरिज्म (mptourism.com, Govardhan Puja in Madhya Pradesh), सरिता सहाय, Folklore Electronic Journal of Folklore, अंक 45, 2010, UNI रिपोर्ट 27 अक्टूबर 2008 (oneindia.com), Wikipedia (Alirajpur district), पंचांग गणना (Drik Panchang)। मुख्य फोटो साभार Wikimedia Commons / Ravinasharma22, CC BY-SA 4.0।
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