State News | संस्कृति विशेष Amit Shrivastava
नवरात्रि आते ही मध्य प्रदेश का माहौल बदल जाता है। शहरों में बड़े-बड़े पंडाल सजते हैं, मंदिरों में घंटियां देर रात तक बजती हैं और बाजारों में रोशनी दिखाई देने लगती है। लेकिन मध्य प्रदेश की नवरात्रि की असली आत्मा अगर कहीं सबसे गहराई से सुनाई देती है, तो वह गांवों और कस्बों की उन गलियों में है, जहां मां की आरती के बाद कोई लोकगायक ढोलक, मंजीरा या नगाड़े की संगत में ऐसा देवी गीत छेड़ देता है कि पूरा माहौल भक्ति में डूब जाता है।
यहां नवरात्रि सिर्फ नौ दिनों का धार्मिक आयोजन नहीं है। यह लोकभाषा, लोकसंगीत और पीढ़ियों से चली आ रही स्मृतियों का उत्सव भी है।
मध्य प्रदेश की खासियत यह है कि यहां नवरात्रि के भजन का कोई एक स्वरूप नहीं है। बुंदेलखंड में मां की स्तुति अचरी के रूप में सुनाई देती है, चंबल और भदावर क्षेत्र में लांगुरिया की अपनी पहचान है, महाकौशल में देवी जस की परंपरा दिखाई देती है, बघेलखंड में भगत और देवी गीत गांवों की रातों को भक्तिमय बनाते हैं, जबकि मालवा और निमाड़ में गरबा-गरबी और क्षेत्रीय देवी गायन नवरात्रि की रौनक बढ़ाते हैं।
यही विविधता मध्य प्रदेश की नवरात्रि को बाकी जगहों से अलग बनाती है।
बुंदेलखंड: जहां अचरी में गूंजती है मां की आराधना
अगर मध्य प्रदेश के नवरात्रि लोकगीतों की बात हो और बुंदेलखंड का नाम न आए, तो कहानी अधूरी रह जाएगी।
छतरपुर, टीकमगढ़, निवाड़ी, पन्ना, दमोह और आसपास के बुंदेली अंचल में नवरात्रि के दौरान देवी गीतों की अचरी परंपरा विशेष रूप से लोकप्रिय है। स्थानीय परंपरा में अचरी को देवी गीतों के रूप में गाया जाता है और नवरात्रि में गांवों के देवी पंडालों, मंदिरों और घरों में इसका गायन लंबे समय से होता आया है। अचरी की भी अपनी दुनिया है। इसके प्रमुख रूपों में ढर्रा, लहचारी और झूला का उल्लेख मिलता है। इनमें लहचारी का गायन अधिक प्रचलित बताया जाता है, जबकि झूला अपेक्षाकृत धीमी और कठिन गायन शैली मानी जाती है।
बुंदेलखंड के लोकप्रिय नवरात्रि लोकगीत
अचरी देवी गीत
यह बुंदेलखंड की सबसे खास नवरात्रि परंपराओं में से एक है। 'पंडा को लग गई चुड़ेलन'
हाल के वर्षों में फिर से चर्चा में आया यह बुंदेली लोकगीत नवरात्रि के जागरण और स्थानीय देवी भक्ति की दुनिया से जुड़ा हुआ है। इसकी भाषा और कथा इसे सामान्य देवी भजनों से अलग पहचान देती है।
'विनती सुनो शारदा माई' जैसे बुंदेली देवी गीत
मां शारदा और शक्ति की आराधना से जुड़े ऐसे गीत बुंदेली क्षेत्र की लोकभक्ति का हिस्सा हैं।
और फिर आता है आल्हा
बुंदेलखंड का नाम आते ही आल्हा गायन याद आना स्वाभाविक है। आल्हा बुंदेलखंड की प्रसिद्ध वीरगाथा गायन परंपरा है। इसमें आल्हा-ऊदल की वीरता और बुंदेलखंड की ऐतिहासिक-सांस्कृतिक स्मृतियां गाई जाती हैं। लेकिन यहां एक अंतर समझना जरूरी है। आल्हा मूल रूप से नवरात्रि का देवी भजन नहीं है। हां, बुंदेलखंड की लोकगायन शैली में आल्हा जैसी ऊर्जावान गायकी का प्रभाव देवी जागरण और धार्मिक आयोजनों के प्रस्तुतीकरण में दिखाई दे सकता है। इसलिए इसे नवरात्रि के "देवी भजन" की सूची में रखने के बजाय बुंदेलखंड की व्यापक लोकगायन परंपरा के रूप में देखना ज्यादा सही होगा। यही बात बुंदेलखंड की खूबसूरती है। यहां भक्ति और वीरता दोनों की आवाज बहुत ऊंची है।
चंबल और भदावर: लांगुरिया में माता की मस्ती
मध्य प्रदेश का चंबल अंचल अपनी बोली, स्वभाव और लोकजीवन के लिए अलग पहचान रखता है। यहां नवरात्रि और देवी आराधना से जुड़ी लोकधुनों में लांगुरिया का नाम खास तौर पर लिया जाता है। लांगुरिया की परंपरा भदावर क्षेत्र में विशेष रूप से लोकप्रिय रही है और इसका संबंध करौली की कैला देवी की भक्ति से भी जुड़ा हुआ है। लोक परंपरा में लांगुर को कैला देवी के गण काल-भैरव से जोड़ा जाता है। लांगुरिया की सबसे खास बात यह है कि इसमें भक्ति के साथ लोकजीवन की सहजता भी दिखाई देती है। कहीं मन्नत है, कहीं मां से शिकायत, कहीं यात्रा का उत्साह और कहीं भक्त और देवी के बीच अपनापन। यानी यह ऐसा भजन नहीं है जिसमें भक्त केवल दूर खड़े होकर देवी की स्तुति करता है। इसमें भक्त मां से बातचीत करता हुआ महसूस होता है। चंबल के गांवों में जब ढोलक और मंजीरे के साथ लांगुरिया शुरू होता है तो माहौल में एक अलग ही ऊर्जा पैदा हो जाती है।
महाकौशल: देवी जस में भक्ति का गंभीर स्वर
जबलपुर और आसपास के महाकौशल अंचल की लोकभक्ति की अपनी विशिष्ट पहचान है। यहां देवी जस की परंपरा विशेष उल्लेखनीय है। 'जस' का अर्थ ही यश या स्तुति से जुड़ा है। देवी जस में मां की महिमा, शक्ति, स्वरूप और भक्त की प्रार्थना को स्थानीय भाषा और देशज धुनों में व्यक्त किया जाता है। उपलब्ध लोकसंगीत स्रोत मालवा और महाकौशल दोनों क्षेत्रों में देवी उपासना के लिए देवी जस गीतों की परंपरा का उल्लेख करते हैं। महाकौशल में नवरात्रि के दौरान मंदिरों और देवी स्थलों के आसपास ऐसे गीतों की विशेष गूंज सुनाई देती है। यहां की भक्ति में एक खास ठहराव दिखाई देता है। तेज संगीत की जगह शब्दों और भावों का महत्व अधिक महसूस होता है।
जबलपुर की देवी भक्ति
जबलपुर क्षेत्र में देवी जस गायन को स्थानीय सांस्कृतिक परंपरा के रूप में भी रेखांकित किया गया है। इस तरह महाकौशल की नवरात्रि हमें बताती है कि भक्ति हमेशा तेज आवाज में ही नहीं होती। कभी वह धीमी धुन में भी उतनी ही गहराई से मन तक पहुंचती है।
बघेलखंड: भगत में मां की कथा और गांव की आस्था
रीवा, सतना, मैहर, सीधी, शहडोल और आसपास का बघेलखंड भी देवी आराधना की मजबूत लोक परंपरा रखता है। नवरात्रि के दौरान यहां बघेली भगत और देवी गीत विशेष आकर्षण रखते हैं। 2026 की चैत्र नवरात्रि से जुड़े स्थानीय प्रस्तुतियों में बघेलखंड के गांवों में जवारे बोने, देवी की मढ़िया तक सामूहिक रूप से जाने और गीत, नृत्य तथा 'काली खप्पर' जैसे लोक प्रदर्शन का उल्लेख मिलता है। यहां नवरात्रि केवल मंदिर में पूजा करने तक सीमित नहीं रहती। पूरा गांव एक धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजन में बदल जाता है।
मैहर की शारदा माई
बघेलखंड की चर्चा मैहर की मां शारदा के बिना अधूरी है। मैहर की देवी भक्ति ने बघेली और आसपास के लोकसंगीत को अपनी अलग पहचान दी है। लोक परंपरा में शारदा की स्तुति से जुड़े देवी गीत और यात्रियों के सामूहिक गायन की परंपरा का उल्लेख मिलता है। नवरात्रि में जब मैहर की पहाड़ियों की ओर भक्तों का प्रवाह बढ़ता है, तब रास्तों और मंदिर परिसर में गूंजते देवी गीत इस यात्रा को सिर्फ धार्मिक यात्रा नहीं रहने देते। वह एक सांस्कृतिक अनुभव बन जाती है।
मालवा: गरबा, देवी गीत और सामूहिक उत्सव
इंदौर, उज्जैन, देवास, रतलाम, मंदसौर, नीमच और आसपास का मालवा अपनी जीवंत लोकसंस्कृति के लिए जाना जाता है। मालवा में गरबा की अपनी मजबूत परंपरा है। लोकसंगीत के स्रोतों में भी मालवा के गरबा को महिलाओं द्वारा समूह में गाए जाने वाले पारंपरिक लोकगीत के रूप में दर्ज किया गया है। आज शहरी मध्य प्रदेश में गरबा बड़े मंचों, डीजे और आधुनिक संगीत के साथ दिखाई देता है। लेकिन गांवों और पुराने मोहल्लों में इसका मूल भाव अभी भी सामूहिक भक्ति और देवी आराधना से जुड़ा है। मालवा की खासियत यह है कि यहां नवरात्रि में भक्ति और उत्सव एक साथ चलते हैं। दीये की रोशनी, रंग-बिरंगे कपड़े, तालियों की लय और गोल घेरा बनाकर घूमते लोग, यह दृश्य मालवा की नवरात्रि को अपनी अलग पहचान देता है।
निमाड़: गरबी की ताल और देवी भक्ति
खंडवा, खरगोन, बड़वानी और आसपास के निमाड़ अंचल में भी नवरात्रि का अपना लोक रंग है। निमाड़ में गरबा और गरबी की परंपरा विशेष रूप से उल्लेखनीय है। लोकसंगीत संबंधी स्रोत नवरात्रि में निमाड़ में देवी शक्ति को समर्पित गरबा गीतों और नृत्य की परंपरा का उल्लेख करते हैं। गरबी को पारंपरिक रूप से पुरुषों से जुड़ी प्रस्तुति के रूप में भी वर्णित किया गया है, जबकि गरबा की सामूहिक प्रस्तुति में महिलाओं की भागीदारी प्रमुख रही है। यानी निमाड़ की नवरात्रि में भी सिर्फ भजन नहीं, बल्कि गीत, ताल, नृत्य और सामूहिक आस्था एक साथ दिखाई देते हैं।
तो मध्य प्रदेश के Top Navratri Folk Bhajans कौन से हैं?
अगर State News के पाठकों के लिए इसे एक आसान सूची में समझें, तो मध्य प्रदेश के अलग-अलग अंचलों में नवरात्रि से जुड़े प्रमुख लोकभक्ति रूप इस तरह देखे जा सकते हैं:
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क्षेत्र |
प्रमुख नवरात्रि लोकभक्ति/गायन |
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बुंदेलखंड |
अचरी, देवी गीत, लहचारी, झूला |
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बुंदेलखंड |
'पंडा को लग गई चुड़ेलन' जैसे लोक जागरण गीत |
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बुंदेलखंड |
शारदा और जगदंबा के बुंदेली देवी गीत |
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चंबल-भदावर |
लांगुरिया, कैला देवी से जुड़े गीत |
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महाकौशल |
देवी जस, देवी स्तुति |
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बघेलखंड |
बघेली भगत, देवी गीत |
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मैहर-बघेलखंड |
मां शारदा के देवी गीत |
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मालवा |
गरबा, देवी गीत, सामूहिक भक्ति गायन |
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निमाड़ |
गरबा-गरबी और देवी आराधना |
क्यों खास हैं ये लोक भजन?
आज YouTube और सोशल मीडिया पर हजारों नए देवी भजन मिल जाते हैं। बड़े कलाकारों की आवाज में रिकॉर्ड किए गए भजन लाखों लोगों तक पहुंचते हैं। लेकिन लोकगीतों की खूबसूरती कुछ और है। इन गीतों को किसी बड़े स्टूडियो की जरूरत नहीं होती। एक ढोलक चाहिए। एक मंजीरा चाहिए। कभी हारमोनियम। और सबसे जरूरी, कुछ ऐसे लोग चाहिए जिन्हें गीत याद हो। बाकी काम गांव की स्मृति कर देती है। दादी से पोती तक, मां से बेटी तक, एक गायक से दूसरे गायक तक, गीत चलते रहते हैं। कई बार गीत का कोई निश्चित लेखक नहीं होता। उसकी सबसे बड़ी पहचान यही होती है कि लोग उसे अपना मानते हैं। यही लोकगीत की ताकत है।
नवरात्रि के बहाने अपनी बोली को भी बचा रहा है मध्य प्रदेश
मध्य प्रदेश के इन देवी गीतों की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इनमें सिर्फ देवी की स्तुति नहीं होती, बल्कि क्षेत्र की बोली भी जीवित रहती है। बुंदेलखंडी अचरी में बुंदेली सुनाई देती है। चंबल के लांगुरिया में भदावरी और आसपास की लोकभाषा की मिठास मिलती है। बघेली भगत में बघेली का रंग आता है। निमाड़ में निमाड़ी और मालवा में मालवी का स्वाद मिलता है। यानी जब कोई गांव का बुजुर्ग नवरात्रि की रात देवी गीत गाता है, तो वह सिर्फ भजन नहीं गा रहा होता। वह अपनी अगली पीढ़ी को भाषा, इतिहास, आस्था और संस्कृति, चारों एक साथ सौंप रहा होता है।
आखिर में, नवरात्रि का असली संगीत
मध्य प्रदेश की नवरात्रि को अगर केवल बड़े शहरों के गरबा पंडालों से देखा जाए, तो तस्वीर अधूरी रह जाएगी। इस तस्वीर में बुंदेलखंड की अचरी भी होनी चाहिए। चंबल का लांगुरिया भी। महाकौशल का देवी जस भी। बघेलखंड की भगत भी। मैहर की शारदा भक्ति भी। मालवा का गरबा भी। और निमाड़ की गरबी भी। कहीं मां से मन्नत मांगी जा रही है, कहीं बेटी के सुख की प्रार्थना है, कहीं खेत और परिवार की खुशहाली की कामना है और कहीं सिर्फ इतना कहा जा रहा है कि "मां, हमारे गांव पर अपनी कृपा बनाए रखना।"
यही मध्य प्रदेश की नवरात्रि है।
यहां देवी के भजन सिर्फ सुने नहीं जाते, जिए जाते हैं।
और शायद यही वजह है कि पीढ़ियां बदलती रहती हैं, संगीत के साधन बदल जाते हैं, मोबाइल और इंटरनेट आ जाते हैं, लेकिन नवरात्रि की रात जब किसी गांव की गली से दूर तक ढोलक की थाप और देवी गीत की आवाज सुनाई देती है, तो मन आज भी उसी पुराने मध्य प्रदेश में लौट जाता है, जहां भक्ति का मतलब था साथ बैठना, गाना और मां को याद करना।
जय माता दी।
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