मनुष्य भव का सदुपयोग कर आत्मकल्याण के मार्ग पर बढ़ें : मुनि श्री वैराग्यसागर महाराज
देवली। (संवाददाता मुकेश कुमार जैन)
महावीर दिगंबर जैन मंदिर में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनि श्री वैराग्यसागर महाराज ने कहा कि मनुष्य को अपने जीवन में पाप कर्मों से बचने का प्रयास करना चाहिए, क्योंकि पाप कर्मों का उदय होने पर व्यक्ति को उसका फल भोगना पड़ता है। मनुष्य जीवन अत्यंत दुर्लभ है, इसलिए इसका सदुपयोग आत्मकल्याण और परोपकार के कार्यों में करना चाहिए।
मुनि श्री ने कहा कि संसार में कोई वस्तु अपने आप में अच्छी या बुरी नहीं होती, बल्कि व्यक्ति के विचार और दृष्टिकोण उसे अच्छा या बुरा बनाते हैं। मनुष्य देह एक ओर मोह-माया और विषय-वासनाओं में उलझकर आत्मा को संसार में भटकाने का कारण बन सकती है, वहीं दूसरी ओर यही देह आत्मज्ञान प्राप्त करने और मोक्ष मार्ग पर आगे बढ़ने का श्रेष्ठ माध्यम भी है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपने विचारों को शुद्ध रखते हुए जीवन में सदाचार, संयम और धर्म को अपनाना चाहिए। मनुष्य भव की सार्थकता तभी है, जब व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप को पहचाने और आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़े।
भगवान की शरण और समर्पण से सार्थक होता है जीवन : मुनि श्री सुप्रभसागर महाराज
मुनि श्री सुप्रभसागर महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि जिसने भगवान की शरण प्राप्त कर ली, उसके लिए कल्पवृक्ष, चिंतामणि रत्न और पारस मणि जैसी सांसारिक वस्तुओं का भी विशेष प्रयोजन नहीं रह जाता। भगवान की शरण में जाने वाला व्यक्ति अपने जीवन को सही दिशा प्रदान करता है। सच्ची भक्ति व्यक्ति के भीतर श्रद्धा, समर्पण और आत्मविश्वास के भाव जागृत करती है।
मुनि श्री ने कहा कि भगवान की महिमा और स्तुति का पूर्ण वर्णन करना देवों के लिए भी सहज नहीं है। ऐसे में साधारण मनुष्य की सामर्थ्य का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। भगवान के उपदेश जीवों को सही मार्ग दिखाते हैं, लेकिन मनुष्य अक्सर उन्हें अपने जीवन में आत्मसात नहीं कर पाता। केवल भगवान का स्मरण करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके बताए मार्ग पर चलना भी आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि भगवान की दृष्टि उसी जीव पर पड़ती है, जो उनके चरणों में नमन करता है और स्वयं को समर्पित कर देता है। इसलिए मनुष्य को अहंकार का त्याग कर श्रद्धा, विनम्रता और समर्पण भाव के साथ धर्म मार्ग पर चलना चाहिए।
मुनि श्री ने संदेश दिया कि मनुष्य भव अत्यंत दुर्लभ है। इसे मोह-माया और सांसारिक आकर्षणों में व्यर्थ गंवाने के बजाय धर्म साधना, आत्मचिंतन और सदाचार में लगाना चाहिए। भगवान के उपदेशों को जीवन में अपनाकर ही आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ा जा सकता है।
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