October 10, 2026 03:22 PM
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भगवान की भक्ति का उद्देश्य आत्मकल्याण, केवल भौतिक सुख पाना नहीं : मुनिश्री सुप्रभ सागर
देवली से मुकेश कुमार जैन।
देवली। धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनिश्री सुप्रभ सागर जी महाराज ने कहा कि भगवान ने आत्मा के जिन गुणों का वर्णन किया है, उन्हें प्राप्त करने के लिए पुरुषार्थ करना चाहिए। आत्मा के गुणों की प्राप्ति के लिए भगवान द्वारा बताए गए मार्ग पर चलना आवश्यक है। भगवान की भक्ति का वास्तविक उद्देश्य आत्मकल्याण होना चाहिए, न कि केवल सांसारिक सुखों की प्राप्ति।
मुनिश्री ने कहा कि मिथ्यादृष्टि जीव भगवान की भक्ति भौतिक सुखों की प्राप्ति के लिए करता है, जबकि सम्यग्दृष्टि जीव आत्मिक सुख प्राप्त करने के उद्देश्य से आराधना करता है। धर्म कल्पवृक्ष से भी बढ़कर है, क्योंकि कल्पवृक्ष से मनुष्य अपनी इच्छानुसार सांसारिक वस्तुएं मांगता है, लेकिन धर्म आत्मा के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है। जो व्यक्ति भगवान की भक्ति अंतरंग श्रद्धा और समर्पण के साथ करता है, उसके जीवन में आध्यात्मिक परिवर्तन आता है।
मुनिश्री ने भगवान के नाम-स्मरण और स्तवन की महिमा बताते हुए कहा कि भगवान का नाम श्रद्धापूर्वक स्मरण करने से संसार के दुखों से उबरने की प्रेरणा मिलती है। भगवान के नाम का एक अक्षर भी मनुष्य के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने का माध्यम बन सकता है। भगवान का स्मरण मन, वचन और विचारों को शुद्ध करने में सहायक होता है तथा आत्मिक शांति की अनुभूति कराता है।
उन्होंने कहा कि भगवान का स्तवन करते रहने से जीव को संसार के बंधनों से मुक्त होने की प्रेरणा मिलती है। जिस प्रकार तपती गर्मी में कमल सरोवर की शीतलता सुकून देती है, उसी प्रकार भगवान का नाम-स्मरण जीवन की कठिनाइयों के बीच मन को शांति प्रदान करता है।
मुनिश्री ने कहा कि जीवन की अंतिम घड़ी में भी भगवान का नाम स्मरण में आना अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसके लिए आवश्यक है कि हम नियमित रूप से भगवान की आराधना करें और उनके बताए मार्ग पर चलें। भगवान का नाम केवल शब्दों का उच्चारण नहीं, बल्कि श्रद्धा, समर्पण और आत्मकल्याण की भावना से जुड़ा होना चाहिए। सच्ची भक्ति वही है, जो मनुष्य को राग-द्वेष से दूर कर आत्मिक सुख और शांति की ओर अग्रसर करे।