नवरात्रि में ध्यान रखने योग्य 5 स्वर्णिम नियम
केसली (मप्र): ऋतु परिवर्तन के इस संधि काल में, जब शीतकाल विदा हो रहा है और ग्रीष्मकाल दस्तक दे रहा है, बसंत ऋतु का मनमोहक वातावरण चारों ओर बिखरा हुआ है। इस सकारात्मक ऊर्जा से भरे समय में 'नवरात्रि' का आध्यात्मिक पर्व शक्ति संचय का सबसे उत्तम अवसर होता है।
प्रसिद्ध पंडित आनंद दुबे के अनुसार, नवरात्रि केवल उपवास का नाम नहीं, बल्कि देवी शक्तियों को अपने भीतर समाहित करने का विधान है। इन नौ पवित्र दिनों में माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों की सच्ची श्रद्धा से पूजा करने वाले भक्तों के जीवन से सभी बाधाएं दूर हो जाती हैं। हालांकि, इस साधना का पूर्ण फल तभी मिलता है जब हम कुछ विशेष सावधानियों और नियमों का पालन करें।
साधना को सफल बनाने के 5 स्वर्णिम नियम
यदि आप नवरात्रि में कलश स्थापना या व्रत कर रहे हैं, तो इन पांच बातों का ध्यान रखना अनिवार्य माना गया है:
- घर के साथ मन की शुद्धि भी है आवश्यक: नवरात्रि स्वच्छता का पर्व है। पंडित जी बताते हैं कि पूजा शुरू होने से पहले घर के कोने-कोने की सफाई कर लेनी चाहिए। भौतिक सफाई के साथ-साथ मन की सफाई भी उतनी ही जरूरी है। ईर्ष्या, द्वेष और लोभ को त्याग कर ही देवी की कृपा प्राप्त की जा सकती है।
- तामसिक भोजन और व्यसनों का पूर्ण त्याग: इन नौ दिनों में खान-पान पर नियंत्रण रखना अनिवार्य है। लहसुन और प्याज जैसी तामसिक चीजों से परहेज करें। मांस और मदिरा का विचार करना भी धार्मिक दृष्टि से वर्जित है। सात्विक आहार न केवल शरीर को ऊर्जावान बनाता है, बल्कि ध्यान लगाने में भी मदद करता है।
- क्षौर कर्म (बाल और नाखून काटना) पर रोक: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नवरात्रि की अवधि में बाल कटवाना, दाढ़ी बनाना या नाखून काटना शुभ नहीं माना जाता है। इसे 'क्षौर कर्म' कहा जाता है, जिसका इन पवित्र दिनों में पूर्णतः निषेध है।
- चमड़े की वस्तुओं का प्रयोग न करें: चूंकि चमड़ा (लेदर) जानवरों की खाल से बनता है, इसलिए पूजा-अर्चना के दौरान बेल्ट, पर्स, जूते या जैकेट जैसी वस्तुओं का उपयोग वर्जित है। सात्विक साधना के लिए सूती या प्राकृतिक रेशों से बने वस्त्रों को प्राथमिकता देना उत्तम है।
- कलह से दूरी और ब्रह्मचर्य का पालन: नवरात्रि भक्ति, शांति और एकाग्रता का समय है। ऐसे में किसी से वाद-विवाद, झूठ बोलना या कटु शब्दों का प्रयोग करने से देवी रुष्ट हो सकती हैं। ऊर्जा के संचय के लिए ब्रह्मचर्य का पालन करना और अपनी वाणी पर नियंत्रण रखना साधक के लिए परम आवश्यक है।
निष्कर्ष: यदि हम इन नियमों का पालन करते हुए आत्म-अनुशासन के साथ माँ दुर्गा की उपासना करते हैं, तो यह नवरात्रि हमारे शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक शांति के लिए मील का पत्थर साबित होगी।

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