सम्यग्दृष्टि जीव भगवान की भक्ति में लीन रहता है, मिथ्यात्व से बचना जरूरी

 : मुनिश्री सुप्रभसागर महाराज

आत्मशांति के बिना बाहरी वैभव व्यर्थ, स्वामीपन का भाव ही अशांति का कारण

देवली से मुकेश कुमार जैन।

देवली। श्री महावीर दिगंबर जैन मंदिर में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनिश्री सुप्रभसागर जी महाराज ने कहा कि आत्मशांति के बिना ज्ञान और चारित्र भी व्यर्थ हो जाते हैं। जब तक आत्मा को वास्तविक शांति प्राप्त नहीं होती, तब तक बाहरी विभूतियां भी बेकार हैं। मोह और मिथ्यात्व के कारण जीव संसार में भटकता रहता है और अनंत काल तक जन्म-मरण के चक्र में उलझा रहता है।

मुनिश्री ने कहा कि मिथ्यात्व से मुक्त होकर सम्यग्दृष्टि जीव भगवान की भक्ति, देव-शास्त्र-गुरु के प्रति श्रद्धा तथा आत्मकल्याण की भावना में लीन रहता है। सच्ची भक्ति का अर्थ केवल बाहरी पूजा-पाठ करना नहीं, बल्कि अपने परिणामों को निर्मल बनाना और आत्मा की शुद्धता की ओर अग्रसर होना है। भगवान की भक्ति से जीवन में धर्म के प्रति आस्था जागृत होती है तथा व्यक्ति को सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है।

स्वामीपन का भाव अशांति का कारण

धर्मसभा में मुनिश्री ने उदाहरण देते हुए समझाया कि आज प्रत्येक व्यक्ति दूसरों पर अपना स्वामित्व स्थापित करना चाहता है, जबकि स्वयं का स्वामी बनना नहीं चाहता। यही स्वामीपन का भाव जीवन में संघर्ष और अशांति को जन्म देता है। व्यक्ति दूसरों को अपने अनुसार चलाना चाहता है, लेकिन स्वयं के विचारों और व्यवहार को सुधारने का प्रयास नहीं करता। दूसरों पर अधिकार जताने की प्रवृत्ति के बजाय स्वयं पर नियंत्रण रखना ही सच्चे आत्मकल्याण का मार्ग है।

उन्होंने कहा कि स्वामीपन मानने वाला व्यक्ति छोटी-छोटी बातों में भी आकुल-व्याकुल हो जाता है। परिवार में भी यदि व्यक्ति अपने स्वामित्व का भाव छोड़कर सहयोग, समझदारी और सद्भाव से व्यवहार करे, तो अनेक समस्याओं का समाधान सहज ही हो सकता है। परिजनों को अपने अधीन मानने के बजाय उनका सहयोगी बनकर रहना चाहिए और उन्हें उचित सलाह देकर सही मार्ग दिखाना चाहिए।

मुनिश्री ने कहा कि भगवान को अपने जीवन का आदर्श बनाकर आत्मिक गुणों को विकसित करना चाहिए। जब व्यक्ति अहंकार और अधिकार की भावना छोड़कर विनम्रता, संयम तथा समता को अपनाता है, तभी जीवन में वास्तविक शांति का अनुभव होता है। धर्म का उद्देश्य केवल बाहरी आडंबर नहीं, बल्कि आत्मा को विकारों से मुक्त कर शुद्धता की ओर ले जाना है।

धर्मसभा में उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं ने मुनिश्री के प्रवचनों का लाभ लेकर आत्मचिंतन और धर्ममय जीवन अपनाने की प्रेरणा प्राप्त की।

13 अक्टूबर 2026