स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ स्वच्छंदता नहीं, बल्कि अनुशासित जीवन जीना है

 

देवली(संवाददाता मुकेश कुमार जैन )महावीर दिगंबर जैन मंदिर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनिश्री सुप्रभसागर महाराज ने कहा कि जो धर्म के बंधन में रहते हैं, वे महान पद को प्राप्त कर लेते हैं। धर्म व्यक्ति को अनुशासन, संयम और आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ाता है।

 

मुनिश्री ने कहा कि प्रत्येक भगवान का जन्म संसार से स्वतंत्र होने का मार्ग प्रशस्त करता है। यह स्वतंत्र आत्मा को सच्चे सुख और शांति की प्राप्ति कराती है। स्वतंत्रता का अर्थ स्वच्छंदता नहीं है। आज व्यक्ति का जीवन अनुशासन से रहित होने के कारण कष्टमय होता जा रहा है। स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए अनुशासन में रहना आवश्यक है।

 

उन्होंने कहा कि अनुशासन में रहने वाली नदी महासागर बन जाती है, जबकि अनुशासनहीन नदी स्वयं बर्बाद हो जाती है और दूसरों के जीवन में भी परेशानी उत्पन्न करती है। इसी प्रकार अनुशासन में रहने वाला व्यक्ति महान बन जाता है, जबकि अनुशासनहीन व्यक्ति अपने जीवन को संकट में डाल लेता है। भगवान के चरणों में आने से पतित व्यक्ति भी पावन बन सकता है।

 

धर्मसभा में मुनिश्री ने आत्मसाधना का महत्व समझाते हुए कहा कि कठिन आत्मसाधना के लिए व्यक्ति को त्याग और तपस्या का मार्ग अपनाना पड़ता है। जो व्यक्ति छह माह में एक बार आहार का त्याग करता है, उसे भी उसके अनुरूप पुण्य फल की प्राप्ति होती है। शरीर को कष्ट देने मात्र से कुछ प्राप्त नहीं होता, बल्कि शरीर और मन को धर्म तथा साधना में लगाने से आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है।

 

मुनिश्री ने उदाहरण देते हुए कहा कि गन्ने को खेत में बोने पर वह बड़ा होकर मीठा रस प्रदान करता है। इसी प्रकार मनुष्य जब अपने जीवन को संयम, अनुशासन और धर्म के मार्ग पर लगाता है, तो उसे भी सुख, शांति और आत्मिक उन्नति की प्राप्ति होती है।