दशलक्षण पर्व के आठवें दिन उत्तम त्याग धर्म की आराधना, आचार्य आर्जवसागर महाराज ने बताया त्याग का महत्व
त्याग से बढ़ती है आत्मविशुद्धि, आसक्ति का त्याग ही सच्चे धर्म का आधार : आचार्य श्री
बड़ौत। (संवाददाता मुकेश कुमार जैन)।
धर्मनगरी बड़ौत में दशलक्षण महापर्व के आठवें दिन उत्तम त्याग धर्म की आराधना श्रद्धा, भक्ति एवं आध्यात्मिक उल्लास के साथ की गई। इस पावन अवसर पर आचार्य श्री आर्जवसागर जी महाराज ने अपने मंगल प्रवचनों में त्याग धर्म का महत्व बताते हुए कहा कि त्याग केवल बाहरी वस्तुओं का नहीं, बल्कि मन में बसी आसक्ति, राग-द्वेष और मोह का होना चाहिए। आसक्ति का त्याग होने से आत्मा की विशुद्धि बढ़ती है और साधक आध्यात्मिक उन्नति की ओर अग्रसर होता है।
आचार्य श्री ने कहा कि “त्याग वस्तुओं का नहीं, आसक्ति का होना चाहिए; क्योंकि आसक्ति छूटते ही आत्मा की विशुद्धि बढ़ती है।” त्याग धर्म व्यक्ति को लोभ, मोह और संग्रह की प्रवृत्ति से दूर कर आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। जीवन में अल्प त्याग भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि त्याग की भावना से ही संयम और आत्मशुद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है।
गुरु आर्जव वाणी में वर्णित त्याग धर्म की महिमा साधकों को व्रत, संयम और आत्मचिंतन की प्रेरणा देती है। त्याग के माध्यम से कर्मों की निर्जरा होती है तथा सम्यक् ध्यान और आत्मविशुद्धि की दिशा में साधक की आध्यात्मिक यात्रा आगे बढ़ती है।
इस अवसर पर त्याग धर्म के संदेश को आत्मसात करते हुए श्रद्धालुओं ने जीवन में आसक्ति कम करने, संयम अपनाने और आत्मकल्याण के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया।
त्याग की महिमा
अल्प-त्याग भी स्वर्गिक सुख को, देता भविजन पहचानो। निर्भय होकर व्रत, संयम को, धारो होय सुगति जानो॥ कर्म-निर्जरा संख्य-गुणित हो, आत्म-विशुद्धि जब होती। बढ़े ध्यान सम्यक् वह यति का, विधि अञ्जन को जो धोती॥
दशलक्षण महापर्व का आठवां दिन उत्तम त्याग धर्म के पावन संदेश के साथ श्रद्धालुओं को त्याग, संयम और आत्मशुद्धि की प्रेरणा प्रदान कर रहा है।
त्याग की जय हो! तप की जय हो! संयम की जय हो! 🙏
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