अलीराजपुर जिले के युगपुरुष डॉ. शिवनारायण सक्सेना का देवलोक गमन, एक प्रेरणादायी युग का अंत

गायत्री परिवार, शिक्षा जगत और समाजसेवा के क्षेत्र में छोड़ी अमिट छाप, नेत्र संकलन केंद्र के माध्यम से हजारों जीवनों में जगाई नई रोशनी

जोबट (राजेश जैन)

 

विधि का विधान है कि जो इस धरती पर जन्म लेता है, उसका एक दिन संसार से विदा होना निश्चित है। लेकिन कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जिनका जाना केवल एक व्यक्ति का निधन नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए अपूरणीय क्षति बन जाता है। डॉ. शिवनारायण सक्सेना का देवलोक गमन भी अलीराजपुर जिले के लिए ऐसी ही एक दुखद और अविस्मरणीय घटना है। उनके निधन का समाचार मिलते ही जोबट नगर सहित आसपास के क्षेत्र में शोक की लहर छा गई। शिक्षा, धर्म, संस्कार और समाजसेवा के क्षेत्र में उनके योगदान को याद कर हर आंख नम हो गई।

 

डॉ. सक्सेना का जीवन केवल व्यक्तिगत उपलब्धियों की कहानी नहीं, बल्कि समर्पण, संघर्ष, सेवा और संकल्प की एक प्रेरणादायी गाथा रहा। उन्होंने अपने जीवन की शुरुआत एक शिक्षक के रूप में की थी। शिक्षा को केवल रोजगार का माध्यम नहीं, बल्कि समाज और आने वाली पीढ़ियों के चरित्र निर्माण का सबसे बड़ा साधन माना। इसी सोच के साथ उन्होंने सीमित संसाधनों और अनेक कठिनाइयों के बीच जोबट में शिक्षा का ऐसा केंद्र खड़ा करने का संकल्प लिया, जो आज गायत्री मंदिर स्कूल के रूप में संस्कार और शिक्षा का महत्वपूर्ण केंद्र बना हुआ है।

 

सीमित संसाधनों में शिक्षा के क्षेत्र में खड़ा किया बड़ा संस्थान

डॉ. सक्सेना की दूरदर्शिता और अथक मेहनत का ही परिणाम रहा कि उन्होंने जोबट जैसे क्षेत्र में हिंदी माध्यम और अंग्रेजी माध्यम के हायर सेकेंडरी विद्यालयों की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मध्यप्रदेश में गायत्री शक्तिपीठों से जुड़े अनेक विद्यालय हाईस्कूल स्तर तक संचालित हैं, लेकिन जोबट में हिंदी और अंग्रेजी दोनों माध्यमों के हायर सेकेंडरी विद्यालयों को स्थापित करना उनकी विशेष उपलब्धियों में शामिल रहा।

 

यह उपलब्धि केवल भवन निर्माण या विद्यालय संचालन तक सीमित नहीं थी, बल्कि ग्रामीण और आदिवासी अंचल के विद्यार्थियों को अपने ही क्षेत्र में बेहतर शिक्षा और उच्चतर अध्ययन का अवसर उपलब्ध कराने की दूरगामी सोच का परिणाम थी। उन्होंने साबित किया कि यदि संकल्प मजबूत हो और उद्देश्य समाजहित का हो तो सीमित संसाधन भी बड़ी उपलब्धियों का रास्ता नहीं रोक सकते।

 

धर्म और गुरुसेवा के प्रति आजीवन समर्पण

शिक्षा के साथ-साथ उनका जीवन गायत्री परिवार की विचारधारा, आध्यात्मिकता और गुरुसेवा को समर्पित रहा। अत्यंत विषम स्वास्थ्य परिस्थितियों के बावजूद मौसम की परवाह किए बिना गायत्री शक्तिपीठ जोबट की व्यवस्थाओं और धार्मिक गतिविधियों में उनकी सक्रियता बनी रहती थी।

 

उनका समर्पण केवल पदों तक सीमित नहीं था, बल्कि वे स्वयं जिम्मेदारी निभाने और व्यवस्था को सुचारु रखने में विश्वास रखते थे। गायत्री शक्तिपीठ शिक्षण संस्था के अध्यक्ष, गायत्री मंदिर के ट्रस्टी एवं सहायक ट्रस्टी तथा गायत्री गोपाल गोशाला के व्यवस्थापक के रूप में उन्होंने अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन किया।

 

नेत्र संकलन केंद्र से हजारों लोगों के जीवन में आई रोशनी

उनके समाजसेवी व्यक्तित्व का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय जोबट गायत्री शक्तिपीठ में स्थापित नेत्र संकलन केंद्र रहा। इस केंद्र की स्थापना और संचालन में उनके विशेष सहयोग एवं मार्गदर्शन की महत्वपूर्ण भूमिका रही। नेत्रदान और नेत्र संकलन जैसे पुनीत कार्य के माध्यम से अनेक जरूरतमंद लोगों के जीवन में नई रोशनी पहुंचाने का मार्ग प्रशस्त हुआ।

 

उनका मानना था कि मनुष्य का जीवन तभी सार्थक है, जब उसके जाने के बाद भी उसके कार्य दूसरों के जीवन में खुशियां और उजाला भरते रहें। नेत्र संकलन केंद्र के माध्यम से किया गया यह परोपकारी कार्य उनके सेवाभावी व्यक्तित्व की पहचान बनकर हमेशा याद किया जाएगा।

 

पद नहीं, कर्म से बनाई पहचान

डॉ. शिवनारायण सक्सेना का व्यक्तित्व अनेक जिम्मेदारियों और उपलब्धियों से समृद्ध रहा। वे गायत्री शक्तिपीठ शिक्षण संस्था के अध्यक्ष, गायत्री मंदिर के ट्रस्टी एवं सहायक ट्रस्टी, गायत्री गोपाल गोशाला के व्यवस्थापक तथा जोबट नेत्र संकलन केंद्र के प्रभारी के रूप में समाज के विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय रहे।

 

उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने अपने जीवन को व्यक्तिगत सुविधाओं तक सीमित नहीं रखा। शिक्षा के माध्यम से बच्चों का भविष्य संवारना, धर्म के माध्यम से संस्कारों का प्रसार करना और सेवा के माध्यम से जरूरतमंदों के जीवन में बदलाव लाना ही उनके जीवन का मूल उद्देश्य रहा।

 

शरीर से विदा हुए, लेकिन कर्मों में हमेशा जीवित रहेंगे

आज डॉ. शिवनारायण सक्सेना हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके द्वारा स्थापित शैक्षणिक संस्थान, धार्मिक गतिविधियां, गोशाला और नेत्र संकलन केंद्र उनके विचारों एवं सेवा भावना को आगे बढ़ाते रहेंगे।

 

किसी व्यक्ति की महानता उसके पद, प्रतिष्ठा या संपत्ति से नहीं, बल्कि इस बात से तय होती है कि उसके जाने के बाद समाज उसे किस रूप में याद करता है। डॉ. सक्सेना ने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि सच्ची विरासत धन-दौलत नहीं, बल्कि शिक्षा, संस्कार और परोपकार के रूप में छोड़ी गई अमिट छाप होती है।

 

अलीराजपुर जिले ने एक ऐसे व्यक्तित्व को खो दिया है, जिसने अपना जीवन समाज के निर्माण और मानव सेवा के लिए समर्पित कर दिया। उनका जाना एक युग का अंत अवश्य है, लेकिन उनके विचार, उनके कार्य और उनकी प्रेरणा आने वाली पीढ़ियों को

सदैव मार्गदर्शन देते रहेंगे।