आलोट। त्योहार आता है तो खाद्य सुरक्षा विभाग की टीम बाजारों में निकलती है। मावा, दूध, घी, मिठाई और अन्य खाद्य पदार्थों के नमूने लिए जाते हैं। उन्हें जांच के लिए प्रयोगशाला भेज दिया जाता है और फिर शुरू होता है रिपोर्ट का इंतजार। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब तक जांच रिपोर्ट आएगी, तब तक वह खाद्य सामग्री दुकानों से बिककर लोगों की थाली और पेट तक पहुंच चुकी होगी तो फिर बाद में होने वाली कार्रवाई किस काम आएगी? क्या प्रशासन किसी बड़ी अनहोनी के बाद ही जागेगा?

दीपावली जैसे बड़े त्योहार पर यह सवाल और गंभीर हो जाता है। हर परिवार बाजार से मिठाई, दूध, मावा और अन्य खाद्य सामग्री खरीदता है। उपभोक्ता को यह भरोसा होना चाहिए कि वह जो खा रहा है, वह शुद्ध और सुरक्षित है। लेकिन खाद्य सुरक्षा विभाग की कार्रवाई का परिणाम आम जनता के सामने नहीं आने से लोगों के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है।

आलोट में नमूने लिए, अब रिपोर्ट और कार्रवाई का इंतजार

3 नवंबर को खाद्य सुरक्षा अधिकारी कमलेश जामरा ने आलोट क्षेत्र में खाद्य प्रतिष्ठानों का निरीक्षण कर खाद्य पदार्थों के नमूने लिए। ग्राम खजूरी देवड़ा स्थित राधेकृष्ण किराना से मैदा, विट्ठल मंदिर चौराहा स्थित पाटीदार मिल्क डेयरी से मिश्रित दूध एवं घी तथा राजेंद्र चौक स्थित पुरोहित मिल्क डेयरी से दूध का नमूना लिया गया। इन नमूनों को जांच के लिए राज्य खाद्य प्रयोगशाला भोपाल भेजा जाएगा। विभाग के अनुसार जांच रिपोर्ट आने के बाद नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।

नमूने लेना निश्चित रूप से जरूरी है, लेकिन सवाल यह है कि रिपोर्ट आने तक संबंधित खाद्य सामग्री की बिक्री पर क्या निगरानी रहेगी? यदि किसी खाद्य पदार्थ को लेकर गंभीर आशंका है तो उपभोक्ताओं को उससे बचाने के लिए तत्काल क्या कदम उठाए जाएंगे? केवल नमूना लेकर रिपोर्ट का इंतजार करना पर्याप्त नहीं हो सकता। खाद्य सुरक्षा कानून के तहत उचित आधार और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार संदिग्ध खाद्य सामग्री की जब्ती तथा बिक्री रोकने जैसी कार्रवाई के अधिकार भी उपलब्ध हैं।

जावरा की घटना से भी सबक नहीं?

जावरा में पूर्व में सामने आई एक दर्दनाक घटना आज भी खाद्य सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है। मिठाई खाने के बाद एक मासूम बच्चे की मौत हो गई थी, जबकि उसके माता-पिता भी गंभीर रूप से बीमार हुए थे। इस घटना के बाद जांच और कार्रवाई की प्रक्रिया भी चली, लेकिन जिस परिवार ने अपनी संतान खो दी, उसके लिए बाद की कार्रवाई उस नुकसान की भरपाई नहीं कर सकती थी।

ऐसी घटनाएं बताती हैं कि खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता की जांच केवल कागजों और प्रयोगशाला की रिपोर्ट तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। असली जिम्मेदारी यह है कि असुरक्षित खाद्य सामग्री लोगों तक पहुंचे ही नहीं। यदि हर बार पहले नमूना लिया जाए, फिर रिपोर्ट का इंतजार हो और उसके बाद कार्रवाई की जाए तो आम उपभोक्ता की सुरक्षा का सवाल अधूरा ही रह जाएगा।

हर साल सैंपलिंग होती है, फिर जनता को नतीजे क्यों नहीं बताए जाते?

खाद्य सुरक्षा विभाग से सीधे सवाल हैं कि आलोट क्षेत्र में पिछले दो वर्षों के दौरान खाद्य पदार्थों के कितने नमूने लिए गए? उनमें कितने नमूने मानक के अनुरूप नहीं पाए गए? कितने नमूने असुरक्षित घोषित हुए? जिन प्रतिष्ठानों के नमूने फेल हुए, उनके विरुद्ध क्या कार्रवाई की गई? कितनों पर जुर्माना लगाया गया, कितनों की बिक्री पर रोक लगी और कितने मामलों में न्यायालयीन कार्रवाई हुई?

सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि इन कार्रवाई का विवरण आम जनता के सामने क्यों नहीं रखा जाता? जिन प्रतिष्ठानों के खाद्य नमूने अमानक या असुरक्षित पाए गए हैं, उनके नाम, जांच रिपोर्ट और की गई कार्रवाई का विवरण नियमानुसार सार्वजनिक होना चाहिए। इससे उपभोक्ताओं को जागरूक रहने में मदद मिलेगी और खाद्य कारोबारियों में भी नियमों के पालन का संदेश जाएगा।

कलेक्टर अजय कटेसरिया से जनहित में सीधी मांग

जिला कलेक्टर अजय कटेसरिया से अपेक्षा है कि वे इस मामले को तत्काल संज्ञान में लेकर आलोट की खाद्य सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा करें। खाद्य सुरक्षा विभाग से पिछले दो वर्षों का पूरा रिकॉर्ड तलब किया जाए। लिए गए नमूनों, प्रयोगशाला की रिपोर्ट, अमानक और असुरक्षित पाए गए खाद्य पदार्थों तथा संबंधित प्रतिष्ठानों पर की गई कार्रवाई का ब्योरा सार्वजनिक कराया जाए।

दीपावली से पहले आलोट में विशेष जांच अभियान चलाया जाए। मावा, मिठाई, दूध, घी और अन्य खाद्य पदार्थों की नियमित जांच हो। जहां मिलावट या खाद्य पदार्थों के असुरक्षित होने की पुष्टि हो, वहां कानून के तहत तत्काल और प्रभावी कार्रवाई की जाए। गंभीर मामलों में जब्ती, बिक्री पर रोक तथा नियमानुसार अन्य कठोर कदम उठाए जाएं।

यदि खाद्य सुरक्षा अधिकारी की कार्यप्रणाली में लापरवाही या उदासीनता सामने आती है तो उसकी जिम्मेदारी तय की जाए। आवश्यकता पड़ने पर आलोट क्षेत्र की खाद्य सुरक्षा व्यवस्था किसी सक्रिय और जवाबदेह अधिकारी को सौंपी जाए। प्रशासन को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि कार्रवाई केवल त्योहारों के समय दिखावे के लिए न हो, बल्कि पूरे वर्ष नियमित रूप से जारी रहे।

जनता को नमूनों की संख्या नहीं, शुद्धता का भरोसा चाहिए

आखिर आम आदमी कब तक इस इंतजार में रहे कि खाद्य पदार्थ का नमूना लिया गया है और रिपोर्ट आने के बाद कार्रवाई होगी? यदि जांच रिपोर्ट आने से पहले ही खाद्य सामग्री बिक गई या लोगों के सेवन में आ गई तो उस रिपोर्ट का जनस्वास्थ्य की दृष्टि से तत्काल लाभ क्या रह जाएगा? बीमारी और नुकसान होने के बाद कार्रवाई करने से बेहतर है कि समय रहते मिलावट पर रोक लगाई जाए।

कलेक्टर साहब! यह किसी एक दुकानदार या अधिकारी के खिलाफ अभियान नहीं, बल्कि आलोट की जनता के स्वास्थ्य और विश्वास का सवाल है। आप स्वयं इस मामले की निगरानी कीजिए। खाद्य विभाग से पिछले वर्षों की जांच रिपोर्ट और कार्रवाई का पूरा हिसाब सार्वजनिक करवाइए। दीपावली से पहले मिलावट के विरुद्ध प्रभावी अभियान चलाकर दोषियों पर कठोर कार्रवाई सुनिश्चित कीजिए। जरूरत पड़े तो लापरवाह अधिकारियों की जिम्मेदारी भी तय कीजिए।

क्योंकि मिलावट का पता रिपोर्ट आने के बाद चलना और मिलावट को लोगों की थाली तक पहुंचने से पहले रोकना—इन दोनों में बहुत बड़ा अंतर है। किसी परिवार की खुशियां उजड़ने के बाद कार्रवाई करने से बेहतर है कि प्रशासन पहले ही जाग जाए।

दीपावली पर हर घर में मिठास पहुंचे, मिलावट का जहर नहीं!