धर्मसभा में मुनि श्री सुधासागर जी महाराज का संदेश: पवित्रता और सम्मान को जीवन का आधार बनाएं

गुना। आचार्य श्री विद्या सागर जी महाराज के शिष्य मुनि पुगव श्री सुधासागर जी महाराज ने एक धर्मसभा को संबोधित करते हुए जीवन में पवित्रता और सम्मान की महत्ता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि मन, वचन और कर्म से स्वयं को इतना नियंत्रित कर लें कि आपके कार्य, विचार और वाणी सभी पवित्र बन जाएं।

मुनिश्री ने कहा, "अपने जीवन को इतना पवित्र बना लो कि जब आप पैरों से चलें तो धरती भी पवित्र हो जाए। जो बोलें वह वाणी पवित्र हो जाए, जहां जाएं वह रास्ता पवित्र हो जाए।" उन्होंने अयोध्या का उदाहरण देते हुए बताया कि कैसे श्रीराम के जन्म के कारण अयोध्या पावन हो गई और आज भी उसका नाम सम्मान से लिया जाता है।

उन्होंने कहा कि व्यक्ति का व्यक्तित्व ऐसा होना चाहिए कि उनके संपर्क में आने वाला भी सौभाग्यशाली महसूस करे। उदाहरण के तौर पर, उन्होंने श्रीराम और सीता के विवाह का जिक्र करते हुए कहा कि सीता और राजा जनक ही नहीं, बल्कि पूरी जनकपुरी भी धन्य हो गई थी।

मुनिश्री ने स्त्री पर्याय की महिमा का उल्लेख करते हुए कहा कि स्त्रियों ने जैन धर्म में विशेष सम्मान प्राप्त किया है। उन्होंने आदिनाथ की पुत्रियाँ ब्राह्मणी और सुंदरी का उदाहरण देते हुए बताया कि कैसे उन्होंने अपने पिताजी की याचना से बचने के लिए आजीवन अविवाहित रहने का निर्णय लिया और अमर हो गईं।

उन्होंने चेतावनी दी कि जीवन में एक चूक पूरी तपस्या को धूल में मिला सकती है, जैसे रावण के साथ हुआ। जैन धर्म की सत्यता का समर्थन करते हुए उन्होंने कहा कि धर्म कभी झूठ नहीं बोलता और जो भी मांगता है, उसे वही मिलता है।

निष्कर्ष: मुनिश्री ने कहा कि मनुष्य जीवन को सफल बनाने के लिए धर्म को कभी न छोड़ें, चाहे इसके लिए कितनी भी कठिनाइयों का सामना क्यों न करना पड़े।