*पनपथा में बाघ का बढ़ता आतंक: चन्सुरा में अन्नू रजक की मौत, डेढ़ महीने में 10 किलोमीटर के दायरे में 6 जनहानि से गहराया संकट*

पनपथा वन परिक्षेत्र अंतर्गत ग्राम चन्सुरा में गुरुवार सुबह 60 वर्षीय अन्नू रजक की बाघ के हमले में मृत्यु हो गई। प्राप्त जानकारी के अनुसार अन्नू रजक सुबह अपने घर के समीप जंगल में महुआ फूल एवं डोरी बीनने गए थे। इसी दौरान उन पर बाघ ने हमला कर दिया। गश्त के दौरान वनकर्मियों को घटनास्थल के पास मृतक का जूता एवं घसीटने के निशान मिले। तलाश करने पर शव बरामद हुआ। स्थानीय लोगों के अनुसार घटनास्थल के आसपास बाघ भी मौजूद था। बाद में वन विभाग ने हाथियों की सहायता से स्थिति को नियंत्रित कर शव को कब्जे में लिया और पोस्टमार्टम के लिए भेजा।
इस घटना के साथ ही पनपथा क्षेत्र में मानव-वन्यजीव संघर्ष को लेकर चिंता और गहरा गई है। स्थानीय स्तर पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार बीते लगभग डेढ़ महीने में लगभग 10 किलोमीटर के दायरे में छह लोगों की मृत्यु वन्यजीव हमलों से हुई है। इनमें कुदरी निवासी रज्जू कोल, ममता यादव, खेरवा टोला की फूलबाई पाल, झलवार के फूलबाई गौड़, कल्याण सिंह तथा अब चन्सुरा के अन्नू रजक शामिल हैं।
*ज्ञापन हुए, प्रदर्शन हुए, लेकिन ग्रामीणों की चिंता बरकरार*
क्षेत्र में लगातार हो रही घटनाओं के बाद विभिन्न जनप्रतिनिधियों, सामाजिक संगठनों एवं राजनीतिक दलों द्वारा कई बार ज्ञापन सौंपे गए। मई माह में हुई घटनाओं के बाद स्थानीय स्तर पर धरना-प्रदर्शन कर प्रभावित क्षेत्र में सक्रिय बाघ के संबंध में आवश्यक कार्रवाई और ग्रामीण सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग उठाई गई थी। इसके बाद जून माह में भी जनहानि की घटनाओं के पश्चात पुनः ज्ञापन सौंपकर वन विभाग एवं प्रशासन का ध्यान इस गंभीर विषय की ओर आकर्षित किया गया।
हालांकि, ग्रामीणों का कहना है कि घटनाओं का सिलसिला थम नहीं पाया है, जिससे क्षेत्र में भय और असुरक्षा की भावना लगातार बढ़ रही है।
*वन विभाग और प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती*
वन्यजीव संरक्षण और मानव सुरक्षा के बीच संतुलन बनाना एक जटिल विषय है, लेकिन लगातार हो रही घटनाओं के बाद स्थानीय लोगों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि प्रभावित क्षेत्र में जोखिम कम करने के लिए उठाए गए उपायों की प्रभावशीलता की समीक्षा की जानी चाहिए। ग्रामीणों का कहना है कि जंगल से लगे गांवों में रहने वाले लोग आजीविका के लिए प्रतिदिन जंगलों पर निर्भर रहते हैं, ऐसे में सुरक्षा उपायों को और मजबूत किए जाने की आवश्यकता है।
साथ ही क्षेत्रवासियों के बीच यह मांग भी उठ रही है कि जिला प्रशासन, वन विभाग और अन्य संबंधित एजेंसियां संयुक्त रूप से स्थिति की समीक्षा कर प्रभावित गांवों के लिए विशेष सुरक्षा योजना तैयार करें, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सके।
*क्षेत्र की सबसे बड़ी मांग: हमलों से जुड़े बाघ पर तत्काल निर्णय*
लगातार छह जनहानि की घटनाओं के बाद क्षेत्र की सबसे प्रमुख मांग यह बनकर सामने आई है कि प्रभावित क्षेत्र में सक्रिय हमलों से जुड़े बाघ की गतिविधियों का विशेषज्ञों द्वारा तत्काल आकलन कराया जाए। ग्रामीणों, जनप्रतिनिधियों और विभिन्न संगठनों का कहना है कि यदि जांच और वैज्ञानिक मूल्यांकन में किसी विशेष बाघ की संलिप्तता स्थापित होती है, तो वन्यजीव संरक्षण नियमों एवं निर्धारित प्रोटोकॉल के तहत उसके रेस्क्यू, स्थानांतरण अथवा अन्य उपयुक्त प्रबंधन उपायों पर शीघ्र निर्णय लिया जाना चाहिए।
स्थानीय लोगों का कहना है कि वे वन्यजीव संरक्षण के महत्व को समझते हैं, लेकिन लगातार हो रही मौतों के कारण क्षेत्र में भय का माहौल है। उनका मानना है कि मानव जीवन की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए प्रभावी और समयबद्ध कदम उठाए जाने चाहिए।
*सबसे बड़ा सवाल*
डेढ़ महीने में छह जनहानि और वह भी लगभग 10 किलोमीटर के दायरे में—यह स्थिति अब केवल वन्यजीव गतिविधियों का विषय नहीं रह गई है, बल्कि ग्रामीण सुरक्षा और प्रशासनिक चुनौती का गंभीर मुद्दा बन चुकी है।
आज पनपथा, कुदरी, झलवार, चन्सुरा और आसपास के गांवों के लोग पूछ रहे हैं कि आखिर उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आगे क्या कदम उठाए जाएंगे? क्या प्रभावित क्षेत्र में विशेष रणनीति बनाई जाएगी? और क्या लगातार उठ रही मांगों पर ठोस कार्रवाई देखने को मिलेगी?
फिलहाल क्षेत्र की जनता की निगाहें वन विभाग और जिला प्रशासन पर टिकी हैं, जिनसे लोग सुरक्षा, स्पष्ट कार्ययोजना और भविष्य में ऐसी घटनाओं की रोकथाम को लेकर ठोस पहल की अपेक्षा कर रहे हैं।