दिगम्बर सरोवर के राजहंस, संत शिरोमणि आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज के 59वें दीक्षा दिवस पर कोटि-कोटि नमोस्तु

आज का दिन समस्त जैन समाज के लिए असीम श्रद्धा, भक्ति और आत्मचिंतन का पावन पर्व है। दिगम्बर जैन परम्परा के युगपुरुष, संत शिरोमणि, तपोनिष्ठ आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज के 59वें दीक्षा दिवस पर हम सभी श्रद्धापूर्वक उनके पावन श्रीचरणों में कोटि-कोटि नमोस्तु अर्पित करते हैं।

आचार्य श्री का संपूर्ण जीवन त्याग, तप, संयम, करुणा और आत्मकल्याण की अद्वितीय साधना का जीवंत उदाहरण रहा। उन्होंने अपने ज्ञान, तप और निष्कलंक आचरण से न केवल जैन समाज, बल्कि सम्पूर्ण राष्ट्र को नैतिकता, संस्कार, सेवा, स्वावलम्बन और आध्यात्मिक जीवन का अमूल्य संदेश दिया। उनके सान्निध्य में असंख्य आत्माओं ने धर्ममार्ग अपनाया और अपने जीवन को सार्थक बनाया।

इस युग का सबसे बड़ा सौभाग्य यह रहा कि गुरुवर इस धरा पर अवतरित हुए, और हमारा परम सौभाग्य यह है कि हमें उनके युग में जन्म लेने, उनके दिव्य दर्शन करने, उनकी अमृतवाणी सुनने तथा उनके तपमय जीवन से प्रेरणा प्राप्त करने का अवसर मिला।

आचार्य श्री केवल एक संत नहीं, बल्कि इस युग के युगपुरुष थे। उनकी शिष्य परम्परा आज भी उसी तेज, तप और त्याग के साथ निर्बाध रूप से धर्मध्वजा को आगे बढ़ा रही है। यह परम्परा आने वाली पीढ़ियों के लिए भी संयम और साधना का अमिट प्रकाशस्तंभ बनी रहेगी।

कहा जाता है—"हमने भगवान महावीर को प्रत्यक्ष नहीं देखा, लेकिन जब आचार्य श्री विद्यासागर जी को देखा, तब अनुभव हुआ कि भगवान महावीर का जीवन और उनका तप कैसा रहा होगा।" यही उनके व्यक्तित्व की महानता और आध्यात्मिक ऊँचाई का प्रमाण है।

आज उनके 59वें दीक्षा दिवस पर हम सभी मंगल भावना करते हैं कि गुरुवर द्वारा प्रदर्शित संयम, सदाचार, अहिंसा, तप और आत्मकल्याण का मार्ग सदैव मानवता का पथप्रदर्शक बना रहे तथा उनके आदर्शों से प्रेरित होकर प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन को धर्ममय, संस्कारमय और मूल्यवान बनाए।

परम पूज्य आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज के 59वें दीक्षा दिवस पर पुनः कोटि-कोटि नमोस्तु।

"इस युग का सौभाग्य रहा—गुरुवर इस युग में जन्मे,
हमारा भी सौभाग्य रहा—हम गुरुवर के युग में जन्मे।
नमोस्तु भगवन्! कोटि-कोटि वंदन।"