श्री 1008 कल्पद्रुम महामंडल विधान एवं विश्वशांति महायज्ञ का भव्य समापन, पिच्छिका परिवर्तन एवं नगर भ्रमण रहा आकर्षण का केंद्र
पावागढ़, गुजरात | 31 मई 2026
सिद्धक्षेत्र पावागढ़ में पूज्य आचार्य श्री सुनील सागर जी गुरुदेव के पावन सानिध्य में आयोजित श्री 1008 कल्पद्रुम महामंडल विधान एवं विश्वशांति महायज्ञ का अंतिम दिवस अत्यंत श्रद्धा, भक्ति एवं भव्यता के साथ सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम में देशभर से आए श्रद्धालुओं ने उत्साहपूर्वक सहभागिता कर धर्मलाभ प्राप्त किया।
कार्यक्रम का शुभारंभ मंगलाचरण से हुआ। तत्पश्चात श्रद्धालु भक्तों द्वारा पूज्य आचार्य श्री का पादप्रक्षालन किया गया और जिनवाणी भेंट की गई तथा विधिवत गुरुपूजन सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर बांसवाड़ा एवं मूंगाणा (राजस्थान) से पधारे श्रावक-श्राविकाओं ने गुरुदेव के श्रीचरणों में श्रीफल समर्पित कर आगामी चातुर्मास हेतु विनम्र निवेदन किया तथा आशीर्वाद प्राप्त किया।
अंतिम दिवस पर संगीतमय पूजन एवं विश्वशांति महायज्ञ के अंतर्गत हवन का आयोजन बड़े ही भक्तिभाव के साथ सम्पन्न हुआ। इसके पश्चात भगवान का भव्य नगर भ्रमण हुआ, जिसमें बैंड-बाजों एवं जयघोषों के साथ श्रद्धालुओं ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की। नगर भ्रमण के दौरान संपूर्ण वातावरण धर्ममय एवं भक्तिमय बन गया।
कार्यक्रम का विशेष आकर्षण संसंघ का पिच्छिका परिवर्तन समारोह रहा। इस अवसर पर संघस्थ सभी मुनिराज एवं आर्यिका माताजी की पुरानी पिच्छिकाएँ श्रद्धालुओं को प्रदान की गईं तथा नवीन पिच्छिकाएँ मुनिराजों एवं माताजी को अर्पित की गईं। इस मंगलमय आयोजन को श्रद्धालुओं ने अत्यंत भाव-विभोर होकर देखा और संध्याकाल में गुरदेव के मुख से शंका समाधान हुआ गुरदेव की भक्तिमय आरती की गई।
अपने मंगलमय प्रवचन में पूज्य आचार्य श्री सुनील सागर जी गुरुदेव ने कहा कि "धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि आत्मा की शुद्धि और जीवन में संयम, सदाचार एवं करुणा के भावों को धारण करना ही सच्चा धर्म है। विधान, पूजन और यज्ञ तभी सार्थक होते हैं जब उनके माध्यम से हमारे जीवन में आत्मकल्याण और लोककल्याण की भावना जागृत हो। मनुष्य को अपने जीवन का प्रत्येक क्षण धर्म, सेवा और आत्मचिंतन में लगाना चाहिए।"
गुरुदेव के प्रेरणादायी प्रवचन से उपस्थित श्रद्धालुओं ने धर्ममार्ग पर अग्रसर होने की प्रेरणा प्राप्त की।
इस प्रकार नौ दिवसीय श्री 1008 कल्पद्रुम महामंडल विधान एवं विश्वशांति महायज्ञ का समापन अत्यंत हर्षोल्लास, भक्ति और आध्यात्मिक वातावरण के बीच सम्पन्न हुआ.

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