दिन में रोक, रात में रेत का खेल! बमुरी बीट में सोन नदी से कथित अवैध उत्खनन पर बड़े सवाल
STATE NEWS AI JOURNALIST SURAJ KUMAR
₹300 प्रति गाड़ी की कथित सेटिंग? एक बाइक पर चार बोरी, रात में सैकड़ों चक्कर—आखिर किसके संरक्षण में चल रहा है रेत का कारोबार?
सीधी जिले के बमुरी बीट क्षेत्र में सोन नदी से रात के अंधेरे में मोटरसाइकिलों के जरिए कथित तौर पर रेत निकालने का मामला सामने आने के बाद वन विभाग और जिम्मेदार अधिकारियों की निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
स्थानीय स्तर पर ₹300 प्रति गाड़ी की कथित सेटिंग की चर्चा है। बताया जा रहा है कि एक मोटरसाइकिल पर करीब चार बोरी रेत ले जाई जाती है और रातभर ऐसी सैकड़ों मोटरसाइकिलों की आवाजाही होती है। यदि यह दावा सही है तो एक रात में नदी से कितनी रेत निकाली जा रही होगी, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।
अगर रेत अवैध है तो रात में रास्ता कौन खोल रहा है?
सबसे बड़ा सवाल यही है—यदि सोन नदी से रेत निकालना प्रतिबंधित है, तो रात के अंधेरे में इतनी बड़ी संख्या में मोटरसाइकिलें नदी तक पहुंच कैसे रही हैं?
सोन घड़ियाल संरक्षण के लिए स्थापित है और इसके रेतीले तट एवं नदी-द्वीप घड़ियाल समेत संकटग्रस्त जलीय जीवों के महत्वपूर्ण आवास हैं।
वहीं, हाल ही में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के समक्ष सीधी जिले में सोन नदी के आसपास अवैध रेत खनन के आरोपों पर भी मामला सामने आया था।
200 मीटर से 1200 मीटर की बात—फिर बमुरी में यह खेल कैसे?
स्थानीय लोगों का सवाल है कि यदि विभागीय स्तर पर अभयारण्य की प्रतिबंधित दूरी को लेकर अलग-अलग दूरी बताई जा रही है, तो बमुरी बीट में वास्तविक सीमा, इको-सेंसिटिव जोन और लागू नियम आखिर क्या हैं?
सरकारी दस्तावेजों में अलग-अलग रेत खनन प्रस्तावों के लिए सोन घड़ियाल अभयारण्य और उसके इको-सेंसिटिव जोन से अलग-अलग दूरियां दर्ज हैं। इसलिए बमुरी बीट में लागू वास्तविक सीमा और नियमों को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया जाना जरूरी है।
डिप्टी रेंजर से लेकर चौकीदार तक—रात की निगरानी कहां है?
सवाल केवल रेत निकालने वालों पर नहीं, बल्कि निगरानी व्यवस्था पर भी है।
डिप्टी रेंजर कहां हैं?
एसडीओ कहां हैं?
बीट प्रभारी और मुंशी कहां हैं?
रात में तैनात चौकीदारों की निगरानी व्यवस्था कहां है?
अगर रातभर सैकड़ों मोटरसाइकिलें सोन नदी की ओर जा रही हैं, तो जिम्मेदार अमला इससे अनजान कैसे रह सकता है?
क्या वास्तव में किसी की मिलीभगत है? क्या किसी स्तर पर कथित संरक्षण दिया जा रहा है? या फिर निगरानी तंत्र पूरी तरह विफल है?
इन सवालों का जवाब जांच के बाद ही सामने आ सकता है, लेकिन अब पूरे मामले की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच जरूरी है।
सवाल सोन नदी की रेत का नहीं, सोन घड़ियाल के भविष्य का है
सोन नदी केवल रेत का स्रोत नहीं है। यह घड़ियाल और अन्य जलीय जीवों का प्राकृतिक आवास है। ऐसे में यदि रात के अंधेरे में बड़े पैमाने पर रेत निकाली जा रही है, तो इसके पर्यावरणीय प्रभाव की भी जांच होनी चाहिए।
दिन में कानून की दुहाई और रात में कथित रेत का खेल—यह दोहरा रवैया कब तक चलेगा?
प्रशासन और वन विभाग को चाहिए कि बमुरी बीट में रात के समय होने वाली गतिविधियों की जांच करे, कथित ₹300 प्रति गाड़ी की वसूली के आरोपों की पड़ताल करे, सीसीटीवी/मोबाइल वीडियो/वाहनों की आवाजाही जैसे साक्ष्यों की जांच करे और यदि अवैध उत्खनन प्रमाणित होता है तो जिम्मेदार लोगों पर कठोर कार्रवाई करे।
क्योंकि सवाल सिर्फ रेत का नहीं है—सवाल सोन नदी, घड़ियाल और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के भविष्य का है।
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