Editor’s desk | State News | Amit Shrivastava

कुछ आवाजें केवल सुनाई नहीं देतीं, वे यादों का हिस्सा बन जाती हैं। कुछ चेहरे सिर्फ पर्दे पर दिखाई नहीं देते, वे परिवार के सदस्य जैसे लगने लगते हैं। और कुछ कलाकार ऐसे होते हैं, जिनके लिए उम्र का बढ़ना उनके प्रभाव को कम नहीं करता, बल्कि उनकी यात्रा को और अधिक अर्थपूर्ण बना देता है।

अमिताभ बच्चन ऐसे ही कलाकार हैं।

आज 11 अक्टूबर 2026 को हिंदी सिनेमा के महानायक अपना 84वां जन्मदिन मना रहे हैं। छह दशक के करीब फैले उनके फिल्मी सफर में सफलता के शिखर हैं, असफलताओं के लंबे दौर हैं, जिंदगी को हिला देने वाला हादसा है, आर्थिक संकट है और फिर ऐसी वापसी है, जिसने साबित किया कि किसी कलाकार की असली ताकत सिर्फ उसकी लोकप्रियता नहीं, बल्कि गिरकर फिर खड़े होने का साहस भी है।

आज जब उनके जन्मदिन पर देश और दुनिया से शुभकामनाएं मिल रही हैं, तो अमिताभ बच्चन को याद करना केवल एक सुपरस्टार का जन्मदिन मनाना नहीं है। यह उस व्यक्ति की यात्रा को समझना भी है, जिसने हर दौर में खुद को नए सिरे से साबित किया।

प्रयागराज से शुरू हुई कहानी

11 अक्टूबर 1942 को इलाहाबाद, जिसे आज प्रयागराज कहा जाता है, में जन्मे अमिताभ बच्चन का बचपन साहित्य और कला के वातावरण में बीता। उनके पिता डॉ. हरिवंश राय बच्चन हिंदी के प्रतिष्ठित कवि थे और मां तेजी बच्चन सामाजिक गतिविधियों में रुचि रखती थीं।

घर में शब्दों, कविताओं और विचारों का महत्व था। शायद इसी माहौल ने अमिताभ की भाषा और संवादों के प्रति समझ को मजबूत किया। उनकी आवाज में जो गहराई है और संवाद बोलने के अंदाज में जो ठहराव दिखाई देता है, वह आगे चलकर उनकी पहचान बन गया।

हालांकि, कवि के बेटे होने का अर्थ यह नहीं था कि फिल्मी दुनिया में उनके लिए सफलता का रास्ता आसान हो गया। मुंबई पहुंचने के बाद उन्हें भी संघर्ष करना पड़ा। उनकी लंबी कद-काठी और भारी आवाज, जो बाद में उनकी सबसे बड़ी पहचान बनीं, शुरुआती दिनों में उनके लिए बाधा मानी जाती थीं।

लेकिन जिंदगी कई बार उसी कमी को ताकत बना देती है, जिसे दुनिया शुरुआत में कमजोरी समझती है।

'सात हिंदुस्तानी' से 'जंजीर' तक, पहचान बनाने का संघर्ष

अमिताभ बच्चन ने 1969 में ख्वाजा अहमद अब्बास की फिल्म 'सात हिंदुस्तानी' से अभिनय की दुनिया में कदम रखा। यह कोई ऐसी शुरुआत नहीं थी, जिसने रातोंरात उन्हें सुपरस्टार बना दिया हो। शुरुआती फिल्मों में उन्हें अपेक्षित सफलता नहीं मिली और उन्हें अपनी जगह बनाने के लिए लगातार काम करना पड़ा।

फिर 1971 में ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्म 'आनंद' आई। इसमें उन्होंने डॉ. भास्कर बनर्जी का किरदार निभाया। राजेश खन्ना के मुख्य किरदार के बीच भी अमिताभ अपने गंभीर अभिनय से दर्शकों का ध्यान खींचने में सफल रहे।

लेकिन असली मोड़ 1973 में आया, जब प्रकाश मेहरा की फिल्म 'जंजीर' रिलीज हुई।

इंस्पेक्टर विजय खन्ना का उनका किरदार उस दौर के हिंदी सिनेमा के पारंपरिक रोमांटिक हीरो से बिल्कुल अलग था। वह कम बोलता था, गुस्सा करता था, अन्याय के खिलाफ खड़ा होता था और अपनी भावनाओं को शब्दों से ज्यादा आंखों में व्यक्त करता था।

यहीं से अमिताभ बच्चन की पहचान 'एंग्री यंग मैन' के रूप में बनने लगी।

'दीवार' और 'शोले' ने बनाया एक दौर का चेहरा

1975 हिंदी सिनेमा के इतिहास में खास स्थान रखता है। इसी साल 'दीवार' और 'शोले' जैसी फिल्में आईं।

'दीवार' में विजय का किरदार गरीबी, सामाजिक असमानता और व्यवस्था से उपजे आक्रोश का प्रतीक बन गया। दूसरी ओर, 'शोले' में जय के रूप में अमिताभ ने कम संवादों और सूक्ष्म भावों से दर्शकों के दिल में जगह बनाई।

'दीवार', 'शोले', 'डॉन', 'त्रिशूल', 'मुकद्दर का सिकंदर', 'काला पत्थर' और 'अमर अकबर एंथनी' जैसी फिल्मों ने उन्हें हिंदी सिनेमा के सबसे प्रभावशाली सितारों में शामिल कर दिया।

उनकी खासियत केवल गुस्से वाले किरदार निभाना नहीं थी। कॉमेडी में उनका समयबोध, भावुक दृश्यों में उनकी संवेदनशीलता और गंभीर भूमिकाओं में उनकी आवाज का इस्तेमाल भी उतना ही प्रभावशाली था।

'चुपके चुपके' में उनका हल्का-फुल्का अंदाज और 'कभी कभी' में उनकी शायरी से जुड़ी संवेदनशीलता बताती है कि अमिताभ को केवल एक तरह के किरदार में बांधना संभव नहीं था।

जब जिंदगी ने ली सबसे कठिन परीक्षा

1982 में फिल्म 'कुली' की शूटिंग के दौरान अमिताभ बच्चन गंभीर रूप से घायल हो गए। यह हादसा इतना गंभीर था कि देशभर में उनके प्रशंसक उनकी सलामती के लिए प्रार्थना करने लगे।

अस्पताल के बाहर लोगों की भीड़ और देशभर में हुई दुआएं उस रिश्ते का प्रमाण थीं, जो एक अभिनेता और उसके दर्शकों के बीच बन चुका था।

उनके ठीक होने की खबर केवल फिल्म जगत के लिए राहत नहीं थी। लाखों लोगों के लिए यह किसी अपने के वापस लौटने जैसी खुशी थी।

इस घटना ने अमिताभ की जिंदगी और लोकप्रियता दोनों को एक नई दृष्टि से देखने का अवसर दिया। पर्दे पर दूसरों को संकट से निकालने वाला नायक वास्तविक जीवन में खुद जिंदगी की सबसे कठिन लड़ाई लड़ रहा था।

लेकिन यह उनकी कहानी का अंत नहीं था।

सफलता के बाद असफलता, फिर वापसी का साहस

1990 के दशक में अमिताभ बच्चन के करियर को कठिन दौर का सामना करना पड़ा। उनकी कुछ फिल्मों को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। उन्होंने अमिताभ बच्चन कॉरपोरेशन लिमिटेड यानी ABCL के माध्यम से फिल्म निर्माण और मनोरंजन व्यवसाय में भी कदम रखा, लेकिन कंपनी को भारी आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा।

जिस व्यक्ति ने कभी बॉक्स ऑफिस पर लगातार सफलता देखी थी, उसके लिए यह दौर आसान नहीं रहा होगा।

लेकिन अमिताभ की कहानी की खूबसूरती यही है कि उन्होंने असफलताओं को अपनी अंतिम पहचान नहीं बनने दिया।

वर्ष 2000 में टेलीविजन पर 'कौन बनेगा करोड़पति' की शुरुआत हुई। अमिताभ ने इस कार्यक्रम के माध्यम से दर्शकों के सामने खुद का एक नया रूप प्रस्तुत किया। अब वह केवल पर्दे पर संवाद बोलने वाले महानायक नहीं थे। वह प्रतियोगियों से बात करने वाले, उनकी कहानियां सुनने वाले और उनके सपनों को समझने वाले मेजबान भी थे।

उनकी आवाज, सहज संवाद शैली और प्रतिभागियों के प्रति सम्मान ने कार्यक्रम को दर्शकों से जोड़ दिया।

'KBC' ने उनके करियर को नई दिशा दी और यह साबित किया कि किसी कलाकार की लोकप्रियता माध्यम बदलने से समाप्त नहीं होती। सही समय पर बदलाव को स्वीकार करना भी प्रतिभा का हिस्सा है।

'ब्लैक' से 'पीकू' तक, उम्र के साथ और गहरा होता अभिनय

अमिताभ बच्चन की दूसरी पारी की सबसे बड़ी खूबी यह रही कि उन्होंने खुद को केवल पुराने सुपरस्टार की छवि तक सीमित नहीं रखा।

'ब्लैक' में उन्होंने एक जटिल और संवेदनशील शिक्षक का किरदार निभाया। 'पा' में प्रोजेरिया से प्रभावित बच्चे की भूमिका ने उनके शारीरिक परिवर्तन और अभिनय क्षमता दोनों को सामने रखा।

'पीकू' में वह एक ऐसे बुजुर्ग पिता बने, जिनकी आदतें परिवार को परेशान भी करती हैं और जिनके बिना घर अधूरा भी लगता है।

'पिंक' में उनकी भूमिका ने सहमति और महिलाओं के अधिकारों से जुड़ी बहस को मुख्यधारा के दर्शकों तक पहुंचाने में मदद की। 'बदला', 'गुलाबो सिताबो', 'ऊंचाई' और 'कल्कि 2898 एडी' जैसी फिल्मों ने भी अलग-अलग शैलियों में उनकी निरंतर मौजूदगी दिखाई।

यही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है। उन्होंने उम्र को अपने अभिनय की सीमा नहीं बनने दिया। उन्होंने भूमिकाओं को उम्र के अनुसार बदलने और नई पीढ़ी के निर्देशकों के साथ काम करने की इच्छा बनाए रखी।

आज भी काम के प्रति वही समर्पण

84 वर्ष की उम्र में भी अमिताभ बच्चन काम से जुड़े हुए हैं। वह 'कौन बनेगा करोड़पति' के 18वें सीजन की मेजबानी कर रहे हैं। जन्मदिन के अवसर पर कार्यक्रम में उनसे जुड़ी भावनात्मक यादें भी साझा की गईं।

हालिया रिपोर्टों के अनुसार, जन्मदिन के विशेष आयोजन में उनकी मां तेजी बच्चन की आवाज सुनाई गई, जिसे सुनकर अमिताभ भावुक हो गए। यह दृश्य उनके व्यक्तित्व के उस पहलू को सामने लाता है, जो सुपरस्टार की छवि के पीछे मौजूद एक बेटे का है।

उनके बेटे अभिषेक बच्चन ने भी एक बातचीत में पिता के मानवीय पक्ष पर जोर दिया। उनके अनुसार, दुनिया के लिए अमिताभ बच्चन एक महानायक हो सकते हैं, लेकिन परिवार के लिए वह पिता और दादा भी हैं। यह बात याद दिलाती है कि लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचने वाला व्यक्ति भी रिश्तों, यादों और भावनाओं से बना होता है।

हरिवंश राय बच्चन की विरासत और अमिताभ की अपनी पहचान

अमिताभ बच्चन के जीवन में उनके पिता हरिवंश राय बच्चन की साहित्यिक विरासत का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। 'मधुशाला' के रचयिता हरिवंश राय बच्चन ने हिंदी कविता को व्यापक लोकप्रियता दिलाई। उनके घर में शब्दों और संवेदनाओं का जो वातावरण था, उसकी छाप अमिताभ के व्यक्तित्व में भी दिखाई देती है।

लेकिन अमिताभ ने अपने पिता की पहचान के सहारे जीवन नहीं बिताया। उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई, अपनी आवाज को अपना हस्ताक्षर बनाया और अपने अभिनय से ऐसी जगह हासिल की, जिसे किसी एक फिल्म या पुरस्कार से नहीं समझा जा सकता।

उन्हें पद्मश्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण जैसे नागरिक सम्मानों के साथ दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। उन्हें कई राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिले हैं।

फिर भी उनके करियर का मूल्यांकन केवल पुरस्कारों की सूची से नहीं किया जा सकता। उनके योगदान का बड़ा हिस्सा उन यादों में है, जो दर्शकों के साथ जुड़ी हुई हैं।

महानायक का जन्मदिन, लेकिन कहानी एक इंसान की भी

अमिताभ बच्चन की लोकप्रियता के पीछे उनका व्यक्तित्व और सार्वजनिक छवि है, लेकिन उनकी यात्रा का सबसे प्रेरक हिस्सा उनका लगातार सीखते रहना है।

उन्होंने सफलता देखी, लेकिन असफलता से मुंह नहीं मोड़ा। उन्होंने गंभीर भूमिकाएं निभाईं, लेकिन कॉमेडी से दूरी नहीं बनाई। उन्होंने सिनेमा में अपना मुकाम बनाया, लेकिन टेलीविजन जैसे नए माध्यम को भी अपनाया।

और शायद यही कारण है कि आज भी उनकी आवाज सुनते ही दर्शक ठहर जाते हैं।

किसी को 'दीवार' का विजय याद आता है। किसी को 'शोले' का जय। किसी के लिए वह 'ब्लैक' के शिक्षक हैं, तो किसी के लिए 'पीकू' के भास्कर बनर्जी। नई पीढ़ी के दर्शक उन्हें 'कल्कि 2898 एडी' के अश्वत्थामा के रूप में भी पहचानते हैं।

एक ही कलाकार की इतनी अलग-अलग छवियां उसके लंबे करियर का प्रमाण हैं।

आज अमिताभ बच्चन के 84वें जन्मदिन पर उन्हें शुभकामनाएं देने का अर्थ केवल उनकी फिल्मों को याद करना नहीं है। यह उस जिद, मेहनत और सीखते रहने की इच्छा को सलाम करना भी है, जिसने उन्हें इतने लंबे समय तक प्रासंगिक बनाए रखा।

उनकी जिंदगी हमें याद दिलाती है कि सफलता कोई स्थायी मंजिल नहीं है। हर दौर में खुद को फिर से साबित करना पड़ता है। कभी नए किरदार से, कभी नई चुनौती से और कभी अपनी ही असफलताओं का सामना करके।

जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं, अमिताभ बच्चन जी। आपकी आवाज, आपका अभिनय और आपका संघर्ष भारतीय सिनेमा की स्मृतियों में लंबे समय तक जीवित रहेंगे।

Image Source: IMDb & Wikipedia