Editorial Desk | State News | Amit Shrivastava
कभी-कभी कोई फिल्म box office पर सफल होती है और कभी-कभी कोई फिल्म box office के साथ-साथ फिल्म इंडस्ट्री को एक सवाल भी दे जाती है।
‘हनुमान अंश’ फिलहाल इसी दूसरी श्रेणी की फिल्म दिखाई देती है।
नीम करोली बाबा के जीवन और आध्यात्मिक व्यक्तित्व से प्रेरित इस फिल्म ने जिस तरह से दर्शकों के बीच अपनी जगह बनाई है, उसने सबसे पहले सबका ध्यान अपने budget और box office collection की ओर खींचा। लगभग ₹2 करोड़ के reported budget में बनी इस फिल्म का worldwide gross अब लगभग ₹366 करोड़ तक पहुंच चुका है। Sacnilk के ताजा आंकड़ों में भारत का net collection ₹280.93 करोड़ और worldwide gross ₹366.45 करोड़ बताया गया है। यानी reported production budget की तुलना में worldwide gross करीब 183 गुना है।
लेकिन यहां एक बात समझना जरूरी है। यह ratio budget बनाम gross collection का है, profit का नहीं। थिएटर revenue में distributor और exhibitor shares, taxes, marketing, distribution और दूसरे खर्च शामिल होते हैं। इसलिए ₹2 करोड़ से ₹366 करोड़ को सीधे ₹364 करोड़ के मुनाफे के रूप में देखना सही नहीं होगा।
फिर भी सवाल बहुत बड़ा है।
इतने छोटे budget की फिल्म, बिना किसी बड़े Bollywood star के, शुरुआत में बेहद सीमित दर्शकों के साथ और कम promotional noise के बावजूद इतनी दूर कैसे पहुंच गई?
और शायद इससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या ‘हनुमान अंश’ की सफलता सिर्फ एक फिल्म की सफलता है, या यह भारतीय सिनेमा में बदलती दर्शक पसंद का संकेत भी है?
मेरे लिए इस फिल्म की असली कहानी यहीं से शुरू होती है।
₹2 करोड़ से ₹366 करोड़ तक की कहानी में सबसे दिलचस्प बात सिर्फ आंकड़ा नहीं है
‘हनुमान अंश’ की शुरुआत blockbuster जैसी नहीं थी।
फिल्म ने लगभग ₹10 लाख की opening की और पहले दो सप्ताह में इसकी कमाई बहुत सीमित रही। पहले सप्ताह में करीब ₹1.08 करोड़ और दूसरे सप्ताह में लगभग ₹40 लाख की कमाई हुई। इसके बाद तीसरे सप्ताह में फिल्म ने अचानक momentum पकड़ा और collections में बड़ा jump आया।
यही बदलाव इस कहानी का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
आज जब cinema marketing में बड़े stars, बड़े trailers, करोड़ों रुपये के promotional campaigns और massive digital campaigns की चर्चा होती है, वहां ‘हनुमान अंश’ की journey बताती है कि कभी-कभी audience खुद marketing बन जाती है।
Social media पर चर्चा बढ़ी, लोगों ने अपने अनुभव साझा किए, word of mouth मजबूत हुआ और film के shows बढ़ने लगे। यानी इस फिल्म की marketing का एक बड़ा हिस्सा वह दर्शक बना जिसने फिल्म देखने के बाद दूसरे दर्शक को उसके बारे में बताया।
यह बदलाव Bollywood के लिए शायद box office number से ज्यादा महत्वपूर्ण है।
लेकिन ‘हनुमान अंश’ की सबसे खूबसूरत कहानी शायद उसके गानों में छिपी है
अगर कोई मुझसे पूछे कि इस फिल्म में ऐसा क्या है जिस पर ज्यादा चर्चा होनी चाहिए, तो मैं box office के बाद सीधे उसके लोकसंगीत की बात करूंगा।
विशेषकर वह गीत: “मैंने तेरे ही भरोसे हनुमान…”
इस गीत को Suneel Lodhi ने गाया है और इसके credits में traditional lyrics का उल्लेख मिलता है। (LyricsMINT) लेकिन मेरे लिए यह केवल एक devotional song नहीं है। मैं बुंदेलखंड से हूं। इसलिए जब किसी बड़े cinematic platform पर बुंदेली मिट्टी की आवाज सुनाई देती है, तो उसका अनुभव कुछ अलग होता है। बुंदेलखंड के गांवों में भक्ति और लोकगीत कोई नई चीज नहीं हैं। यहां मंदिरों, चौपालों, विवाह समारोहों, धार्मिक आयोजनों और पारिवारिक अवसरों पर पीढ़ियों से ऐसे गीत गाए जाते रहे हैं जिनके पीछे किसी बड़े music label का नाम नहीं था। इन गीतों की अपनी भाषा है। अपना rhythm है। अपना हास्य है। अपना दर्द है। और सबसे महत्वपूर्ण, अपनी जमीन है। यही कारण है कि ‘मैंने तेरे ही भरोसे हनुमान’ जैसा गीत सुनते हुए बुंदेलखंड के किसी व्यक्ति को केवल फिल्म का soundtrack नहीं सुनाई देता। उसे अपनी मिट्टी की आवाज सुनाई देती है। रिपोर्टों के अनुसार Suneel Lodhi एक Bundeli folk और devotional singer हैं, जिन्होंने कम उम्र से भजन गाना शुरू किया और स्थानीय प्रस्तुतियों तथा digital platforms के जरिए अपनी पहचान बनाई। उनका एक पारंपरिक भजन viral होने के बाद फिल्म के संगीत से उनका जुड़ाव हुआ। (YouTube)
यही वह कहानी है जिसे commercial cinema को आगे और तलाशना चाहिए।
बुंदेली सिर्फ भाषा नहीं, पूरा cultural universe है
‘हनुमान अंश’ के बहाने एक बड़ा सवाल उठता है।
अगर बुंदेली लोकधुनें और लोकभाषा दर्शकों को आकर्षित कर सकती हैं, तो फिर हमारे बाकी regional folk traditions cinema में क्यों नहीं आ सकते? बुंदेलखंड के गांवों में आज भी ऐसे असंख्य लोकगीत हैं जिन्हें शायद देश के बड़े हिस्से ने कभी सुना तक नहीं।
राई की अपनी दुनिया है। आल्हा की अपनी वीरगाथा है। दादरा की अपनी मिठास है। विवाह गीत, देवी गीत, सावन गीत, फाग, कजरी और भक्ति परंपराओं की अपनी अलग-अलग धुनें हैं। बुंदेली लोकगीतों पर हालिया coverage में भी दादरा शैली के उदाहरणों के साथ यह बताया गया है कि इन गीतों में प्रेम, पारिवारिक संबंध, उत्सव, उलाहना और भक्ति जैसी अनेक भावनाएं मौजूद हैं। और यही बात भारत के दूसरे हिस्सों पर भी लागू होती है। राजस्थान की लोकधुनें। मालवा का लोकसंगीत। निमाड़ की आवाज। मिथिला की परंपरा। भोजपुरी लोकगीत। गढ़वाली और कुमाऊंनी संगीत। असम की लोक परंपराएं। बंगाल का बाउल। महाराष्ट्र का पोवाड़ा। दक्षिण भारत की अनेक स्थानीय संगीत और नृत्य परंपराएं।
भारत के पास cinema के लिए तैयार एक बहुत बड़ा cultural archive है। बस उसे commercial cinema में सिर्फ background flavour की तरह नहीं, बल्कि कहानी के genuine हिस्से के रूप में इस्तेमाल करने की जरूरत है।
“जब जिद पे आ गई पार्वती”: एक गीत, एक कथा और एक बोली
‘हनुमान अंश’ का दूसरा गीत “जब जिद पे आ गई पार्वती” इस दिशा में और भी दिलचस्प उदाहरण है।
गीत की शुरुआत होती है: “जब जिद पे आ गई पार्वती, समझाने पहुंचे सप्तऋषि…” यहां कहानी मूलतः शिव और पार्वती के विवाह से जुड़े उस लोकप्रिय धार्मिक आख्यान को लोकभाषा और लोकहास्य के अंदाज में प्रस्तुत करती है, जिसमें सप्तऋषि पार्वती को समझाने आते हैं कि वह जिस वर को चुन रही हैं, वह कैसा है। गीत में भोलेनाथ के स्वरूप का वर्णन बेहद देसी अंदाज में होता है। सिर पर गंगा, गले में सांप, जटाएं, भस्म और एक ऐसे तपस्वी का रूप जिसे देखकर सामान्य सामाजिक नजर से कोई भी पूछ सकता है कि आखिर पार्वती इसी वर पर क्यों अड़ी हुई हैं। यही इस गीत का charm है। यह किसी संस्कृत श्लोक की तरह कथा नहीं कहता। यह गांव की चौपाल की तरह कथा कहता है। गीत के credits में इसे Sadhu S. Tiwari द्वारा written, composed और sung बताया गया है। Official music-video credits में भी composition, lyrics और vocals का श्रेय उन्हें दिया गया है। (Zolotube) और गीत की भाषा में बुंदेली लोकबोली का जो flavour है, उसने इसे एक अलग पहचान दी है। हालिया coverage में भी इसे बुंदेली भाषा और लोकधुनों से जुड़ा गीत बताया गया है। यही वह point है जहां cinema और लोकसंस्कृति एक-दूसरे से मिलते हैं।
यहां कहानी केवल “लोकगीत इस्तेमाल करने” की नहीं है
लोकगीत को फिल्म में डाल देना और लोकसंस्कृति को फिल्म की भाषा बना देना, दोनों अलग बातें हैं। ‘हनुमान अंश’ के गीतों की दिलचस्पी इसलिए है क्योंकि इनमें polished Bollywood sound से अलग एक earthy quality दिखाई देती है। आवाज में मिट्टी है। भाषा में स्थानीयपन है। कहानी में लोकहास्य है। और धुन में वह सहजता है जो किसी studio-created formula से अलग महसूस होती है।
अगर आने वाले समय में filmmakers अलग-अलग क्षेत्रों के लोक कलाकारों को खोजकर उनकी original शैली में songs record करें, तो यह एक बड़ा cultural movement बन सकता है। कल्पना कीजिए कि किसी mainstream Hindi film में Bundelkhand की असली Rai कलाकार मंडली दिखाई दे। किसी दूसरे film में Malwa का असली लोकगायक अपनी original आवाज में गाए। किसी तीसरी फिल्म में Rajasthan का folk ensemble सिर्फ background score न हो, बल्कि कहानी का हिस्सा हो। तब cinema केवल भारत की कहानी नहीं बताएगा।
Cinema भारत की अनेक आवाजों में भारत को सुनाएगा।
छोटे कलाकारों की बड़ी जीत
‘हनुमान अंश’ की दूसरी महत्वपूर्ण बात इसकी cast और filmmaking team है। फिल्म के प्रमुख कलाकारों में Shobhinaw Satyaa, Chandan Anand, Anil Rastogi, Purnima Tiwari और अन्य कलाकार शामिल हैं। Film credits में कई ऐसे कलाकार और supporting performers भी दर्ज हैं जो सामान्य Bollywood star system के बड़े नाम नहीं हैं। (IMDb)
यही इस फिल्म की खूबसूरती का एक हिस्सा है। जब किसी film का budget इतना बड़ा नहीं होता, तब हर कलाकार को अपने performance से screen पर जगह बनानी पड़ती है। यहां star aura के बजाय character और storytelling का महत्व बढ़ जाता है। Director Vishal Chaturvedi ने फिल्म की story, screenplay और dialogues भी लिखे हैं और film के director तथा producer के रूप में भी credited हैं। (IMDb)
Production credits में Anupriya Nagar, Namrata G Singh और Ragini Sona जैसे नाम भी शामिल हैं। (IMDb) यह पूरी प्रक्रिया यह बताती है कि cinema सिर्फ star-driven industry नहीं है। एक फिल्म के पीछे writer, director, cinematographer, editor, music team, casting directors, art department, costume team, sound designers और सैकड़ों छोटे-बड़े contributors होते हैं। ‘हनुमान अंश’ की सफलता में इस simple, focused filmmaking approach को भी समझने की जरूरत है।
Bollywood के लिए इससे क्या बदलेगा?
अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल।
क्या ‘हनुमान अंश’ की सफलता के बाद Bollywood ऐसी और फिल्में बनाएगा? इसका निश्चित उत्तर अभी देना जल्दबाजी होगा। लेकिन industry के लिए एक commercial signal जरूर बना है। एक छोटी फिल्म ने यह दिखाया है कि audience की रुचि केवल बड़े stars, बड़े budgets और बड़े action spectacles तक सीमित नहीं है।
इसका मतलब यह नहीं कि बड़े budget की फिल्में नहीं चलेंगी। बल्कि इसका मतलब यह है कि market में कहानी के अलग-अलग प्रकारों के लिए जगह हो सकती है। एक filmmaker अब यह सोच सकता है कि किसी संत, किसी लोकदेवता, किसी regional spiritual tradition, किसी forgotten folk hero या किसी स्थानीय cultural story पर film बनाई जा सकती है।
OTT ने पहले ही regional stories के लिए space बनाया है। अब theatrical success ऐसे projects को एक अलग commercial confidence दे सकती है।
‘Kantara’ ने जो रास्ता दिखाया, ‘Hanuman Ansh’ ने उसे दूसरे तरीके से आगे बढ़ाया
भारतीय cinema में यह पहली बार नहीं है कि किसी local cultural tradition ने national audience को आकर्षित किया हो। ‘Kantara’ इसका बड़ा उदाहरण है। उस फिल्म में coastal Karnataka की Bhoota Kola tradition कहानी के केंद्र में थी। Bhoota Kola को coastal Karnataka में प्रचलित ritual performance के रूप में explain किया था, जिसमें स्थानीय spirits या deities की worship की जाती है। फिल्म की national success के बाद इस tradition पर देशभर में चर्चा हुई।
यहां एक महत्वपूर्ण बात है। जब regional culture cinema के माध्यम से national audience तक पहुंचता है, तो उसके साथ उसके इतिहास और identity पर भी चर्चा शुरू होती है। यही cultural cinema की ताकत है। ‘हनुमान अंश’ में भी बुंदेली भाषा और लोकधुनों को देखने-सुनने का अवसर मिल रहा है। यानी एक फिल्म का असर केवल theatre तक सीमित नहीं रह सकता। वह लोगों को किसी भाषा, किसी गीत, किसी लोकपरंपरा या किसी धार्मिक कथा के बारे में जानने के लिए प्रेरित कर सकता है।
Sanatan और भारतीय cinema: बढ़ती रुचि को कैसे समझें?
पिछले कुछ वर्षों में भारतीय cinema में mythology, spirituality, devotional narratives और Indian cultural traditions से जुड़ी फिल्मों और कहानियों की visibility बढ़ी है। इसे केवल एक trend कह देना शायद पर्याप्त नहीं होगा। इसके पीछे कई factors हो सकते हैं। दर्शकों की बदलती रुचि। Digital platforms के कारण regional content की पहुंच। Social media के कारण word of mouth की तेजी। Young audience का अपने cultural roots में interest और filmmakers का यह समझना कि भारतीय mythology और लोकपरंपराओं में contemporary storytelling के लिए बहुत बड़ी सामग्री मौजूद है।
लेकिन यहां एक balance जरूरी है। Sanatan traditions को cinema में दिखाने का अर्थ केवल बड़े visual effects या mythology के नाम का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। कई बार असली शक्ति एक छोटे लोकगीत, एक स्थानीय बोली, एक गांव की परंपरा या किसी बुजुर्ग की कही कथा में होती है। ‘हनुमान अंश’ का सबसे महत्वपूर्ण lesson शायद यही है।
अब Bollywood को गांव की ओर देखना होगा
भारत के हर region में ऐसी कहानियां हैं जिन्हें अभी तक बड़े पर्दे पर पर्याप्त जगह नहीं मिली। बुंदेलखंड में लोककथाएं हैं। मालवा में लोकनाट्य हैं। निमाड़ में लोकपरंपराएं हैं। राजस्थान में असंख्य वीरगाथाएं हैं। पूर्वोत्तर में अलग-अलग indigenous storytelling traditions हैं। दक्षिण भारत में हजारों वर्षों की धार्मिक और लोक परंपराएं हैं। इन सबको यदि filmmaker research, authenticity और संवेदनशीलता के साथ cinema में लाता है, तो audience को केवल entertainment नहीं मिलेगा। उसे अपने ही देश का वह हिस्सा दिखाई देगा जिसे उसने शायद पहले कभी screen पर नहीं देखा।
असली बदलाव तब होगा जब लोक कलाकार भी screen पर दिखाई देंगे
मेरे लिए ‘हनुमान अंश’ की सबसे बड़ी संभावनाओं में से एक यही है। अगर एक local singer की आवाज करोड़ों लोगों तक पहुंच सकती है, तो अगला कदम यह होना चाहिए कि ऐसे artists को केवल playback singer की तरह नहीं, बल्कि cultural storytellers की तरह देखा जाए। लोकनर्तकों को choreography में शामिल किया जाए। ग्रामीण संगीतकारों को original instruments के साथ record किया जाए। स्थानीय dialect writers को screenplay consultation में जोड़ा जाए। और सबसे जरूरी, उनकी कला को “rustic flavour” कहकर सीमित न किया जाए। वह भारत की original cultural capital है।
‘हनुमान अंश’ का सबसे बड़ा box office record शायद कोई और है
₹366 करोड़ का worldwide gross निश्चित रूप से extraordinary number है। लेकिन इस फिल्म का सबसे बड़ा record शायद यह नहीं है। सबसे बड़ी बात यह है कि इसने यह सवाल फिर से सामने रखा है:
क्या दर्शक हमेशा बड़े budget की कहानी चाहते हैं, या वे बड़ी भावना वाली कहानी भी देखना चाहते हैं?
इस फिल्म की यात्रा का उत्तर audience ने अपने तरीके से दिया है।
पहले धीमी शुरुआत। फिर word of mouth। फिर shows में वृद्धि। फिर national conversation। और अंततः hundreds of crores का box office. यह journey cinema business के लिए भी interesting case study है।
निष्कर्ष: भारत की अगली बड़ी cinematic story शायद किसी गांव में लिखी जा रही है
‘हनुमान अंश’ को केवल ₹2 करोड़ से ₹366 करोड़ तक पहुंची फिल्म के रूप में देखना इस कहानी को छोटा कर देना होगा। इसके भीतर एक दूसरी कहानी भी चल रही है। एक बुंदेली आवाज बड़े पर्दे तक पहुंच रही है। एक लोकभाषा national audience तक पहुंच रही है। एक छोटे budget की filmmaking team बड़े box office से मुकाबला कर रही है। कम चर्चित कलाकार पहचान बना रहे हैं। और भारतीय spiritual तथा cultural stories commercial cinema की भाषा में नए तरीके से सामने आ रही हैं। आज जब cinema तेजी से global हो रहा है, शायद उसी समय उसकी सबसे बड़ी ताकत local होने में भी छिपी है। क्योंकि भारत की कहानी एक भाषा में नहीं है। एक शहर में नहीं है। एक music style में नहीं है। और निश्चित रूप से केवल Bollywood में नहीं है। भारत की कहानी हजारों गांवों में है। चौपालों में है। मंदिरों में है। लोकगीतों में है। आल्हा की हुंकार में है। बुंदेली के सहज हास्य में है। और उन कलाकारों में है जिनका नाम अभी national headlines में नहीं है।
‘हनुमान अंश’ ने शायद Bollywood को कोई formula नहीं दिया है। उसने उससे कहीं महत्वपूर्ण एक संभावना दिखाई है।
अगर कहानी सच्ची हो, भाषा अपनी हो, संगीत जमीन से निकला हो और दर्शक उससे जुड़ जाए, तो छोटे budget की फिल्म भी बहुत बड़ी cinematic यात्रा तय कर सकती है। और शायद अब समय आ गया है कि Mumbai के studios के साथ-साथ Bundelkhand के गांवों, Malwa की गलियों, Rajasthan के लोकमंचों, Northeast की परंपराओं और भारत के हजारों अनकहे cultural spaces की तरफ भी camera घुमाया जाए। क्योंकि अगली बड़ी फिल्म की कहानी किसी महंगे set पर नहीं,
शायद किसी गांव की चौपाल पर पहले से गाई जा रही है।
Continue With Google