Editorial Desk | State News | Amit Shrivastava

शनिवार की रात रांची के IIIT हॉस्टल में एक कमरा अंदर से बंद था। बाहर से बार-बार दरवाज़ा खटखटाया गया, पर कोई जवाब नहीं आया। बिहार का एक प्रथम वर्ष का छात्र, आदित्य, अब नहीं रहा। उसने अगस्त में ही कॉलेज में दाख़िला लिया था। यानी घर छोड़े हुए उसे सिर्फ़ दो महीने हुए थे। मिड-सेमेस्टर परीक्षाएँ 8 अक्टूबर से शुरू हुई थीं। पुलिस की शुरुआती जाँच में परीक्षा के दबाव की आशंका जताई गई है, लेकिन जाँच जारी है और अंतिम निष्कर्ष आना बाकी है।

घटना के बाद कैंपस में छात्र सड़कों पर उतरे। उनका आरोप है कि समय पर चिकित्सा मदद नहीं मिली। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने मामले का संज्ञान लिया है और संस्थान के निदेशक ने सहायता व्यवस्था की समीक्षा का भरोसा दिया है। पुलिस का कहना है कि आत्महत्या और छात्रों का विरोध अलग-अलग घटनाएँ हैं। इन सब बातों की जाँच होगी। लेकिन एक सवाल जाँच से बड़ा है: यह सिलसिला रुक क्यों नहीं रहा?

यह अकेली घटना नहीं है

पिछले दो वर्षों की ख़बरों पर नज़र डालिए तो तस्वीर डराने वाली है।

जनवरी 2024 में रांची के ही BIT मेसरा का एक 20 साल का इंजीनियरिंग छात्र हॉस्टल में मृत मिला। पुलिस के मुताबिक़ उसके कमरे से मिले नोट में उसने अपने माता-पिता से माफ़ी माँगी थी। वह अंतर्मुखी था और बाक़ी छात्रों से दूर रहता था। उसी महीने IIT कानपुर के एक पीएचडी छात्र की मृत्यु भी सुर्खियों में रही। अक्टूबर 2024 में IIT दिल्ली के एक छात्र की मौत हुई, जिसके बारे में पुलिस ने बताया कि वह मनोचिकित्सक के इलाज में था। मार्च 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने IIT दिल्ली के दो छात्रों की मौतों पर FIR दर्ज करने का आदेश दिया। उसी साल अगस्त तक देश के IITs में 10 छात्रों की मृत्यु की ख़बरें आ चुकी थीं, जिनमें अकेले IIT खड़गपुर के चार मामले थे। अगस्त 2025 में IIIT ओंगोल में 17 साल के एक छात्र की मौत हुई, जिसकी पढ़ाई औसत से बेहतर थी। उसने अपनी माँ को भेजे संदेश में अवसाद की बात लिखी थी।

कोटा की कहानी अलग से लिखी जानी चाहिए। रिपोर्टों के अनुसार वहाँ 2023 में 26 और 2024 में 17 कोचिंग छात्रों की मौत हुई, और 2025 में भी मामले थमे नहीं।

एक ईमानदार बात: इन दो वर्षों में IIT, NIT, IIIT और अन्य टॉप संस्थानों में हुई मौतों का कोई एक आधिकारिक और पूरा आँकड़ा सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। यही अपने आप में एक समस्या है। जिस संकट को हम गिन भी नहीं पा रहे, उसे सुलझाएँगे कैसे? सुप्रीम कोर्ट ने इसीलिए NCRB को स्कूल और कॉलेज के छात्रों के आँकड़े अलग-अलग दर्ज करने और एक केंद्रीय व्यवस्था बनाने का निर्देश दिया है।

जो आँकड़ा उपलब्ध है, वह भी कम चिंताजनक नहीं। NCRB की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार 2024 में देश में 14,488 छात्रों ने अपनी जान ली। दस साल पहले, 2014 में यह संख्या 8,068 थी, यानी लगभग 80 प्रतिशत की बढ़ोतरी। यानी हर दिन औसतन करीब 40 छात्र। ये सिर्फ़ संख्याएँ नहीं हैं, ये किसी के घर का चिराग़ हैं।

असली वजह क्या है?

सबसे आसान जवाब है "पढ़ाई का दबाव", और अक्सर वही दे दिया जाता है। लेकिन यह अधूरा सच है। पढ़ाई का दबाव अकेला कारण नहीं, बल्कि कई परतों की आख़िरी परत है।

पहली परत है पहचान का संकट। जो बच्चा अपने गाँव, क़स्बे या ज़िले का टॉपर था, वह IIT या IIIT में पहुँचकर अचानक भीड़ में एक साधारण चेहरा बन जाता है। उसने बचपन से सुना है कि वह "होशियार" है। जब पहले ही इम्तिहान में नंबर कम आते हैं, तो उसे लगता है कि वह नकली है, कि उसका चयन ग़लती से हुआ। मनोविज्ञान में इसे "इम्पोस्टर सिंड्रोम" कहते हैं।

दूसरी परत है अचानक मिली आज़ादी और अचानक छिनी सुरक्षा। 17 या 18 साल का बच्चा पहली बार घर से सैकड़ों किलोमीटर दूर, नए शहर, नई भाषा और नए खान-पान के बीच अकेला होता है। रोज़ की चिंता पूछने वाली माँ की आवाज़ अब सिर्फ़ फ़ोन पर बचती है, और फ़ोन पर बच्चा अक्सर कहता है, "सब ठीक है।"

तीसरी परत है संस्थागत ढाँचा। रैंक, ग्रेड, बैकलॉग और प्लेसमेंट की व्यवस्था में गिरने वाले के लिए कोई जाल नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने ख़ुद माना है कि प्रदर्शन के पैमानों, प्रतिस्पर्धा और संस्थागत कठोरता से भरे माहौल में छात्र भारी मानसिक तनाव झेलते हैं। इसके अलावा रैगिंग, जातिगत भेदभाव, छात्रवृत्ति में देरी और ख़ाली पड़े पद जैसे मुद्दे भी अदालत की सुनवाइयों में उठे हैं।

चौथी परत है मदद माँगने का कलंक। हमारे समाज में "काउंसलर के पास जाना" अब भी कमज़ोरी की निशानी माना जाता है। बच्चा सोचता है कि लोग क्या कहेंगे, और बीमारी भीतर पलती रहती है।

घर और स्कूल के बीच की खाई

अब ज़रा आईना देखें। हम माता-पिता क्या कर रहे हैं?

हमने बच्चों को सपने नहीं, लक्ष्य दिए हैं। "IIT निकालना है" परिवार का सामूहिक प्रोजेक्ट बन जाता है। माँ-बाप की बचत, ज़मीन का टुकड़ा, रिश्तेदारों की उम्मीदें, सब उस एक बच्चे के कंधे पर होती हैं। और जब बच्चा हारता है, तो उसे अपनी हार से ज़्यादा माता-पिता की मायूसी का डर सताता है। BIT मेसरा के छात्र का आख़िरी नोट इसी का सबूत है: उसने जाते हुए भी माफ़ी माँगी।

हम बच्चे की सफलता पर जश्न मनाना जानते हैं, पर असफलता पर साथ बैठना नहीं जानते। हम पूछते हैं, "कितने नंबर आए?" यह कम ही पूछते हैं, "तुम कैसे हो?"

स्कूल की भूमिका भी कटघरे में है। हमारी स्कूली शिक्षा बच्चे को परीक्षा पास करना सिखाती है, हार से निपटना नहीं। भावनाओं को समझना, तनाव को पहचानना, मदद माँगना, ये चीज़ें पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं हैं। कोचिंग संस्कृति ने इसे और बिगाड़ा है, जहाँ बच्चा किशोरावस्था में ही दिन के 14 घंटे बैच, टेस्ट और रैंक के बीच बिताता है। स्कूल से कोचिंग और कोचिंग से कॉलेज तक वह कभी यह सीखता ही नहीं कि "असफल होना भी ज़िंदगी का हिस्सा है।"

इतना अकेलापन क्यों?

यह इस पीढ़ी की सबसे अजीब विडंबना है। इतने "कनेक्टेड" बच्चे इतने अकेले क्यों हैं?

क्योंकि इंस्टाग्राम पर सबकी ज़िंदगी चमकदार दिखती है, और अपनी कमज़ोरी छिपाने की आदत पड़ जाती है। क्योंकि हॉस्टल में हर बच्चा उसी प्रतिस्पर्धा में है, और जिसके साथ आप रैंक की दौड़ में हैं, उसके सामने कमज़ोर पड़ना आसान नहीं होता। क्योंकि दोस्ती भी अक्सर नोट्स और टेस्ट सीरीज़ के लेन-देन तक सिमट जाती है। और क्योंकि जो बच्चा पहले से चुप रहता है, उसकी चुप्पी किसी को खटकती नहीं। BIT मेसरा के मामले में भी यही हुआ: वह कक्षा और शाम की सभा, दोनों से अनुपस्थित रहा, और तब तक किसी ने नहीं पूछा।

अकेलापन अचानक नहीं आता। वह धीरे-धीरे आता है, और उसके संकेत होते हैं: कक्षा से ग़ायब रहना, खाना-सोना बिगड़ना, फ़ोन कम उठाना, बात-बात पर चिढ़ना या एकदम शांत हो जाना। इन संकेतों को पढ़ने वाली कोई आँख हमारे सिस्टम में अक्सर होती ही नहीं।

तुरंत क्या करना होगा

सुप्रीम कोर्ट ने इस साल 15 जनवरी को उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए नौ निर्देश जारी किए। अब सवाल अमल का है। मेरी समझ से ये क़दम अब टाले नहीं जा सकते:

  1. हर संस्थान में पर्याप्त प्रशिक्षित काउंसलर। सिर्फ़ नाम का "वेलनेस सेंटर" नहीं, बल्कि ऐसे पेशेवर जो बच्चों की संख्या के अनुपात में हों, रात में भी उपलब्ध हों, और जिनके पास जाना कलंक न समझा जाए।
  2. परीक्षा के समय विशेष निगरानी। प्रथम वर्ष के छात्रों और परीक्षा के दिनों में वार्डन, फ़ैकल्टी सलाहकार और सीनियर छात्रों की "बडी सिस्टम" सक्रिय हो। जो छात्र अनुपस्थित रहे, उसके बारे में उसी दिन पूछताछ हो।
  3. आपातकालीन चिकित्सा की तैयारी। हर हॉस्टल परिसर में एम्बुलेंस, ऑक्सीजन और प्राथमिक उपचार का भरोसेमंद इंतज़ाम हो। IIIT रांची में छात्रों ने ठीक इसी पर सवाल उठाया है, और इसकी निष्पक्ष जाँच ज़रूरी है।
  4. पूरा डेटा, पूरी जवाबदेही। हर मौत पर FIR, स्वतंत्र जाँच और सालाना सार्वजनिक रिपोर्ट। संस्थानों को आँकड़े छिपाने की नहीं, साझा करने की आदत डालनी होगी।
  5. शैक्षणिक लचीलापन। बैकलॉग, फ़ेल होने और सेमेस्टर ब्रेक को सज़ा नहीं, दूसरे मौक़े की तरह देखा जाए। एक परीक्षा पूरे भविष्य का फ़ैसला न लगे।
  6. रैगिंग और भेदभाव पर शून्य सहनशीलता, साथ ही छात्रवृत्ति और ख़ाली पदों की समय-सीमा के भीतर पूर्ति।
  7. स्कूल स्तर पर जीवन-कौशल की पढ़ाई। भावनात्मक साक्षरता, तनाव प्रबंधन और मदद माँगना, इन्हें विषय की तरह पढ़ाया जाए।
  8. अभिभावकों की काउंसलिंग। दाख़िले के समय ही माता-पिता को बताया जाए कि बच्चा किस दबाव से गुज़रेगा और उनसे क्या अपेक्षित है।

मीडिया और समाज की ज़िम्मेदारी

एक बात हम पत्रकारों के लिए भी। ऐसी ख़बरों में तरीक़ों का ब्योरा, "पहली बार में हार गया" जैसी भाषा या किसी एक कारण को निर्णायक बताना ख़तरनाक हो सकता है। हमें कहानी की जगह समाधान पर टिके रहना चाहिए।

और हम सबके लिए: अगले हफ़्ते जब आपका बेटा, बेटी, भाई, बहन या दोस्त फ़ोन करे, तो रिज़ल्ट से पहले उसका हाल पूछिए। उसे बताइए कि आपका प्यार उसके नंबरों पर टिका नहीं है।

आख़िर में

आदित्य अब वापस नहीं आएगा। उसका परिवार रांची पहुँच चुका है और एक ऐसा सवाल लिए बैठा है जिसका कोई जवाब नहीं। लेकिन अगर इस बार हम सुनने, बदलने और जवाबदेह होने की ठान लें, तो शायद अगली बार किसी हॉस्टल का दरवाज़ा समय पर खुल जाए।

अगर आप या आपका कोई जानने वाला परेशान है, तो अकेले न सहें। टेली-मानस हेल्पलाइन 14416 या 1800-891-4416 पर 24 घंटे निःशुल्क बात की जा सकती है।