कालूराणा बाबादेव...   श्राद्ध पक्ष के 16 दिनों तक पहाड़ी पर कठोर साधना..  देवताओं को बुलावा !

कट्ठीवाड़ा के मेघ मांडवा में आज भी जीवित है अनूठी आदिवासी परंपरा, चार गांवों के बड़वा निभाते हैं धार्मिक विधान

कट्ठीवाड़ा। प्रेम गुप्ता

घने जंगलों और ऊंची पहाड़ियों के बीच कट्ठीवाड़ा अंचल में आज भी ऐसी आदिवासी परंपराएं जीवित हैं, जिनमें आस्था, प्रकृति और पहाड़ों का गहरा जुड़ाव दिखाई देता है। मेघ मांडवा की पहाड़ी पर सोलह श्राद्ध के दौरान निभाई जाने वाली यह परंपरा इसी विरासत की अनूठी मिसाल है।

सोलह श्राद्ध के प्रारंभ से लेकर सोलहवें दिन तक बड़वा और पुजारे पहाड़ी पर रहकर साधना करते हैं। इस दौरान उनका आहार भी बेहद सीमित रहता है। वे केवल उबला हुआ कद्दू, बिना नमक-मिर्च के ग्रहण करते हैं। पूरे 16 दिनों तक इसी अनुशासन के साथ देव आराधना और पारंपरिक धार्मिक विधान किए जाते हैं।

कालू राणा बाबा देव की पहाड़ी पर होता है देवताओं का आह्वान

स्थानीय मान्यता में कालू राणा बाबा देव का विशेष महत्व है। क्षेत्र के सबसे ऊंचे पहाड़ रतनमाल को लेकर भी इस परंपरा में विशेष आस्था जुड़ी है। मान्यता के अनुसार कालू राणा बाबा देव की पहाड़ी पर बैठकर बड़वा पारंपरिक गायणा के माध्यम से विभिन्न देवी-देवताओं का आह्वान करते हैं।

चार गांवों—कवछा, डाबचा, इंदलावाट और हवेलीखेड़ा—से जुड़े पांच बड़वा इस परंपरा को निभाते हैं। पहाड़ी की शांत वादियों में गूंजता पारंपरिक गायणा इस साधना को विशिष्ट स्वरूप देता है।

पंद्रहवीं श्राद्ध पर डूंगरी माता का विशेष विधान

परंपरा में पंद्रहवीं श्राद्ध का दिन भी महत्वपूर्ण माना जाता है। समीप की पहाड़ी पर विराजित डूंगरी माता को पारंपरिक विधि-विधान के साथ कालू राणा बाबा देव की पहाड़ी पर लाया जाता है। यहां धार्मिक अनुष्ठान संपन्न होने के बाद नवरात्रि की सुबह माता को पुनः उनकी गुफा स्थित मंदिर में विराजित किया जाता है।

स्थानीय समाजसेवी पारसिंह बारिया के अनुसार यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है और आज भी स्थानीय समाज इसे उसी श्रद्धा और अनुशासन के साथ निभाता आ रहा है। आधुनिक दौर में भी प्रकृति, पहाड़ और लोक आस्था से जुड़ी यह परंपरा आदिवासी संस्कृति की जीवंत पहचान बनी हुई है।