मालवा की उपजाऊ माटी और रतलाम के अनूठे पानी से सजी 'रतलामी सेव' आज दुनियाभर में मशहूर है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि घरों में बनने वाली इस तीखी और स्वादिष्ट सेव को पहली बार बाजार में लाने का श्रेय 'सकलेचा नमकीन' को जाता है? यह सिर्फ एक दुकान नहीं, बल्कि रतलाम शहर के स्वाद और प्राचीन व्यापारिक मूल्यों का एक अहम हिस्सा है।
भारत में व्यापार को सदैव 'धर्म' (व्यापार धर्म) माना गया है, जहां धनार्जन से अधिक शुद्धता, प्रामाणिकता और समाज सेवा को सर्वोपरि रखा जाता है। रतलाम में इसी 'व्यापार धर्म' की गौरवशाली नींव सकलेचा परिवार ने वर्ष 1904 में रखी थी।
वर्तमान में इस प्रतिष्ठान को संभाल रहे सकलेचा परिवार की पांचवीं पीढ़ी के श्री सहर्ष सकलेचा बताते हैं कि नमकीन बनाने का मुख्य उद्देश्य बेहद खास था। जब 'रतलाम महल' का निर्माण हो रहा था, तब वहां काम करने वाले मजदूरों के लिए लंबे समय तक चलने वाले नाश्ते की व्यवस्था के लिए पहली बार यह सेव बनाई गई थी। शुरुआती दौर में यह सेव मैदे से तैयार की जाती थी, लेकिन समय के साथ इसमें शुद्ध चने की दाल के बेसन का उपयोग शुरू हुआ। बेसन, स्थानीय मसालों की महक और कड़ाही में उसे तलने की पारंपरिक विधि—इन सभी को मिलाकर जो स्वाद जन्मा, उसने रतलाम के इतिहास में एक नया अध्याय लिख दिया। सकलेचा की यह दूरदर्शी पहल न केवल एक सफल व्यवसाय बनी, बल्कि इसने स्थानीय कारीगरों के लिए रोजगार के अपार अवसर भी पैदा किए।
शहर के पुराने बाशिंदों और स्थानीय जानकारों से बात करने पर सकलेचा नमकीन की विरासत के कई अनछुए पहलू सामने आते हैं। पीढ़ियों से सकलेचा का स्वाद चखते आ रहे बुजुर्ग ग्राहकों का कहना है, "सकलेचा ने केवल सेव नहीं बेची, उन्होंने देश-दुनिया में रतलाम का नाम स्थापित किया है।"
इस विरासत को खास बनाने वाले कुछ प्रमुख तथ्य:
रतलाम शहर मुख्य रूप से तीन 'S' के लिए प्रसिद्ध है—सोना, साड़ी और सेव। इनमें 'सेव' का जो सांस्कृतिक और आर्थिक महत्व है, वह सकलेचा नमकीन की ऐतिहासिक पहल के बिना पूरी तरह से अधूरा है। आज रतलाम को 'रतलामी सेव' के लिए जो 'भौगोलिक संकेतक' (GI Tag) प्राप्त है, उसकी पृष्ठभूमि तैयार करने में ऐसे ही शुरुआती और निष्ठावान व्यापारियों का बड़ा योगदान रहा है।
पैकेटबंद विदेशी स्नैक्स के इस दौर में, 1904 से खड़ी सकलेचा नमकीन जैसी ऐतिहासिक दुकान हमें हमारी असली जड़ों और स्वदेशी व्यापारिक मूल्यों से जोड़े रखती है। यह उद्यमशीलता की वह प्रामाणिक कहानी है, जिसे आने वाली पीढ़ियों के लिए सहेजा जाना चाहिए। रतलाम की संकरी गलियों में आज भी मसालों की वह पुरानी महक ज़िंदा है, जो गर्व के साथ भारतीय शुद्ध स्वाद की पहचान कराती है।
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