मालवा के रतलाम की हवाओं में घुला चटपटा स्वाद आज दुनिया भर में अपनी पहचान बना चुका है। करीब 1900 से इस शुद्ध और पारंपरिक स्वाद को सहेजने का कार्य 'जनता सेव' कर रहा है, जो शहर की सांस्कृतिक और व्यापारिक पहचान का एक अहम हिस्सा बन चुका है।
रतलामी सेव के उद्भव का इतिहास 1890 के दशक से जुड़ता है। युद्ध के समय जब पारंपरिक नाश्ते कम पड़ने लगे, तब पेट भरने के लिए मैदे की सेंवई जैसी कोई चीज बनाई गई। लेकिन उसमें वह स्वाद नहीं था जो मन को तृप्त कर सके। स्वाद को बेहतर करने के लिए इसमें बेसन और विशेष मसाले मिलाए गए। इसके कड़कपन को दूर कर इसे खस्ता और मुलायम बनाने के लिए बेसन में 'मोयन' (तेल) डाला गया। यहीं से उस बेजोड़ स्वाद का जन्म हुआ, जिसने खाने वालों को दंग कर दिया। शुरुआत में इसे 'भीलड़ी सेव' के नाम से जाना जाता था, जो बाद में अपने अद्भुत खस्तापन के कारण विश्व विख्यात 'रतलामी सेव' में तब्दील हो गई।
'जनता सेव' के संचालक और रतलामी सेव नमकीन मंडल के निवर्तमान अध्यक्ष, श्री शैलेंद्र गांधी बताते हैं कि इस बेजोड़ स्वाद की नकल करने की अनगिनत कोशिशें हुईं। लोग रतलाम का पानी, तेल और यहाँ तक कि कारीगर भी अपने साथ ले गए, लेकिन वह मूल स्वाद कहीं और नहीं गढ़ा जा सका। जीआई टैग (GI Tag) मिलने का रोचक किस्सा साझा करते हुए वे कहते हैं:
श्री गांधी गर्व के साथ एक और चौंकाने वाला तथ्य बताते हैं कि उनके सालों के इतिहास में 'जनता सेव' ने आज तक किसी भी 'प्रिजर्वेटिव' (Preservative) का इस्तेमाल नहीं किया है। इसके बावजूद यह सेव भारत में डेढ़ महीने और विदेशों की जलवायु में चार महीने तक खराब नहीं होती।
'जनता सेव' जैसे प्रतिष्ठान केवल धनोपार्जन नहीं करते, बल्कि प्राचीन भारतीय 'व्यापार धर्म' का सच्चे अर्थों में पालन करते हैं। शुद्धता और गुणवत्ता से रत्ती भर भी समझौता न करने की यह नीति स्वदेशी उद्यमशीलता और 'वोकल फॉर लोकल' (Vocal for Local) का सबसे सशक्त उदाहरण है। मशीनरी और मिलावट के इस दौर में भी बिना रसायनों के शुद्ध बेसन, मोयन और मसालों के सटीक संतुलन से तैयार यह नमकीन रतलाम की माटी की अस्मिता है। यह प्रमाणित करता है कि हमारे स्थानीय कौशल और पारंपरिक पाक-कला के विज्ञान में कितनी शक्ति निहित है।
श्री शैलेंद्र गांधी और 'जनता सेव' की यह ऐतिहासिक यात्रा हमें यह महत्वपूर्ण सीख देती है कि यदि अपनी जड़ों, संस्कृति और शुद्धता के प्रति पूर्ण निष्ठा हो, तो एक स्थानीय उत्पाद भी वैश्विक मंच पर जीआई टैग जैसी ऐतिहासिक और अकाट्य मान्यता प्राप्त कर सकता है। यह विरासत हमारी आने वाली युवा पीढ़ियों के लिए स्वदेशी उद्यम की एक सच्ची प्रेरणा है।
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