गणपति बप्पा हीरो....!—बच्चों के नारों से गूंजा गांव, नाचते-गाते हुई बप्पा की विदाई

दस दिनों तक गणेश भक्ति में डूबा रहा कट्ठीवाड़ा अंचल, ग्रामीणों ने श्रद्धा और उल्लास के साथ दी विदाई

 

कट्ठीवाड़ा। प्रेम गुप्ता 

दस दिनों तक घर-घर में भक्ति, गांव-गांव में उत्साह और हर ओर गणपति बप्पा के जयकारों से गूंजता रहा कट्ठीवाड़ा अंचल। गणेशोत्सव के समापन पर जब बप्पा को विदाई देने की घड़ी आई तो ग्रामीणों की आंखों में श्रद्धा थी, चेहरों पर उत्साह और कदमों में उमंग। नाचते-गाते और ढोल की थाप पर झूमते हुए ग्रामीणों ने अपने आराध्य गणपति को भावभीनी विदाई दी।

अंचल में जगह-जगह स्थापित गणेश प्रतिमाओं की दस दिनों तक पूरी श्रद्धा के साथ पूजा-अर्चना की गई। सुबह-शाम आरती हुई और प्रतिदिन बप्पा को अलग-अलग मिष्ठान व नमकीन का भोग लगाया गया। दिनभर अपनी दिनचर्या में व्यस्त रहने वाले ग्रामीण भी शाम होते ही पूजा-अर्चना और आरती के लिए एकत्रित होते रहे।

इन दस दिनों में गांवों का माहौल पूरी तरह भक्तिमय रहा। गणपति पंडालों में बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक की भागीदारी दिखाई दी। आरती के दौरान पूरा वातावरण गणपति बप्पा मोरया के जयकारों से गूंज उठता था। उत्सव के दौरान कुछ समय के लिए लोगों की रोजमर्रा की चिंताएं और परेशानियां भी जैसे पीछे छूट गईं।

 

बच्चों के लिए भगवान भी और ‘हीरो’ भी

गणेशोत्सव में सबसे खास आकर्षण बच्चों की मासूम आस्था रही। बच्चों के लिए गणपति बप्पा सिर्फ आराध्य नहीं, बल्कि उनके अपने ‘हीरो’ और ‘सुपरस्टार’ भी थे। अपनी स्थानीय बोली और मासूम अंदाज में बच्चों ने ऐसे नारे लगाए कि पूरा माहौल खिलखिला उठा।

“सेव चना और फाफड़ा, गणपति बप्पा आपड़ा…”

“तपेली में सीरो, गणपति बप्पा हीरो…”

“एक, दो, तीन, चार… गणपति बाबा सुपरस्टार…”

बच्चों के ये नारे उत्सव में अलग ही रंग भरते रहे। उनकी मासूम आवाजों में बप्पा के प्रति अपनापन और आस्था साफ दिखाई दी। यही वजह रही कि इस बार का गणेशोत्सव केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि ग्रामीण अंचल के सामाजिक और पारिवारिक उल्लास का भी हिस्सा बन गया।

 

बप्पा के आगमन से विसर्जन तक उत्सव ही उत्सव

गणेश स्थापना से लेकर विसर्जन तक गांवों में उत्सव का माहौल बना रहा। बच्चों और किशोरों में बप्पा के स्वागत को लेकर विशेष उत्साह रहा। कहीं पंडाल सजाए गए तो कहीं घरों में गणपति की स्थापना कर परिवार के सदस्यों ने पूजा-अर्चना की।

दस दिनों तक बप्पा को अलग-अलग व्यंजनों का भोग लगाने से लेकर सामूहिक आरती और जयकारों तक, हर दिन ग्रामीणों ने अपनी परंपरा और श्रद्धा के अनुसार गणेश भक्ति की। आखिरकार विसर्जन के दिन ढोल-नगाड़ों और जयकारों के बीच बप्पा को विदाई दी गई।

विदाई के इस भावुक क्षण में श्रद्धा भी थी, उल्लास भी और अगले वर्ष फिर जल्दी आने की उम्मीद भी—“गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ।”