आगम-अनुयोग के मर्म पर देशभर के विद्वानों का महामंथन

आचार्य श्री आर्जवसागर जी के सान्निध्य में दो दिवसीय राष्ट्रीय विद्वत् संगोष्ठी संपन्न, आगम से आत्मकल्याण तक के विविध आयामों पर हुआ गहन शास्त्रीय विमर्श

बड़ौत (उत्तर प्रदेश)। (संवाददाता मुकेश कुमार जैन)। जैन आगम परंपरा, शास्त्रीय चिंतन और शोध की समृद्ध धारा को एक मंच प्रदान करने वाली दो दिवसीय राष्ट्रीय विद्वत् संगोष्ठी श्री अजितनाथ सभागार, मंडी-बड़ौत में 12 एवं 13 सितंबर को गरिमापूर्ण वातावरण में संपन्न हुई। आचार्य श्री आर्जवसागर जी महाराज द्वारा रचित ‘आगम-अनुयोग’ ग्रंथ को केंद्र में रखकर आयोजित इस संगोष्ठी में देश के विभिन्न राज्यों से आए विद्वानों, प्रोफेसर्स एवं शोधार्थियों ने आगम के विविध आयामों पर गहन शास्त्रीय मंथन किया।

एस.ए. यूनिवर्सिटी, नवादा (बिहार) के तत्वावधान तथा आचार्य श्री आर्जवसागर जी महामुनिराज के पावन सान्निध्य में आयोजित इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में जैन दर्शन, अध्यात्म, कर्मसिद्धांत, ध्यान, लोक-विज्ञान, जैन गणित, मुनि-चारित्र एवं आत्मकल्याण जैसे विषयों पर शोधपूर्ण आलेख प्रस्तुत किए गए। संगोष्ठी के दौरान विद्वानों ने आगमिक संदर्भों, शास्त्रीय प्रमाणों और तार्किक विवेचन के माध्यम से ‘आगम-अनुयोग’ ग्रंथ की गहराइयों को समझने का प्रयास किया।

चारों अनुयोगों को एक सूत्र में पिरोने वाला ग्रंथ

विद्वानों ने ‘आगम-अनुयोग’ को ऐसा महत्वपूर्ण ग्रंथ बताया, जिसमें चारों अनुयोगों की व्यापक दृष्टि को एक सूत्र में प्रस्तुत करने का प्रयास दिखाई देता है। इसमें आध्यात्मिक साधना से लेकर कर्मसिद्धांत, जीव-विज्ञान, लोक रचना, मुनि-चर्या, ध्यान और आत्मकल्याण तक के अनेक पक्षों का समावेश है।

संगोष्ठी में आगम के छह विशेषण एवं पंच ध्यातव्य मन्तव्य, ग्रंथ-नाम की सार्थकता, आचार्य श्री आर्जवसागर जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व, भोगभूमि एवं कुलकर व्यवस्था, पुरुषार्थ-तीर्थ-तीर्थंकर, तीर्थंकर प्रकृति बंध एवं कल्याणक तथा तीर्थंकर माताओं के स्वप्न जैसे विषयों पर विचार रखे गए।

वहीं भगवान ऋषभदेव एवं अन्य महापुरुषों के वैराग्य, जैन गणित, लोक रचना एवं जीवोत्पत्ति, उत्सर्पिणी-अवसर्पिणी, केवली-श्रुतकेवली एवं अंगपूर्व परंपरा, लोक-विज्ञान, जीवों की अवगाहना एवं आयु, देवों के स्वरूप, गुणस्थान, मार्गणा एवं जीवसमास, ज्ञान एवं सम्यक्त्व आदि विषय भी चर्चा के केंद्र में रहे।

कर्मसिद्धांत से ध्यान तक हुई गहन चर्चा

संगोष्ठी के शोध सत्रों में आचारांग एवं मुनि-चारित्र, निर्यापक एवं सामाचार, भिक्षुक प्रतिमाओं एवं असंयम, छह अधिकार, कर्मों के बंध-उदय-सत्त्व, सल्लेखना, मुनियों के छह काल, वीतरागी मंत्र, ध्यान एवं पंच धारणाओं तथा सप्त नयों सहित अनेक महत्वपूर्ण विषयों पर विद्वानों ने अपने शोध-पत्र प्रस्तुत किए।

इन शोध-पत्रों में आगमिक प्रमाणों और तार्किक दृष्टि के साथ विषयों की सूक्ष्मताओं को स्पष्ट किया गया। विद्वत् मंथन का प्रमुख उद्देश्य केवल शास्त्रों के शब्दार्थ तक सीमित न रहकर उनके आध्यात्मिक अभिप्राय और आत्मकल्याणकारी संदेश को जन-जन तक पहुंचाना रहा।

देशभर से जुटा विद्वत्समाज

संगोष्ठी में डॉ. श्रेयांसकुमार जैन, बड़ौत, प्रो. नलिन के. शास्त्री, दिल्ली, प्रो. अशोक जैन, वाराणसी, ब्र. जय निशांत जैन, टीकमगढ़, डॉ. नरेंद्र जैन, टीकमगढ़, पं. विनोदकुमार जैन, रजवांस, डॉ. सुरेंद्र जैन भारती, बुरहानपुर, डॉ. अनिल जैन, जयपुर, डॉ. धर्मेंद्र जैन, जयपुर, प्रो. अनेकांत जैन, दिल्ली, डॉ. ज्योतिबाबू शास्त्री, उदयपुर, डॉ. पंकज जैन, इंदौर, डॉ. सुनील जैन ‘संचय’, ललितपुर, डॉ. आशीष जैन, शाहगढ़, डॉ. सोनल जैन, दिल्ली, डॉ. आनंद जैन, वाराणसी, डॉ. शैलेश जैन, उदयपुर, डॉ. शिखर चंद्र जैन, दिल्ली, डॉ. ज्योति जैन, खतौली, डॉ. समता मारोरा, इंदौर, डॉ. अल्पना मोदी, ग्वालियर, इंजीनियर बहिन ऋषिका जैन, दमोह, अरविंद तिवारी सहित अनेक विद्वानों एवं प्रोफेसर्स की सहभागिता रही।

आचार्य श्री ने बताया—शब्दों से आगे समझना होगा आगम का मर्म

संगोष्ठी के विभिन्न सत्रों में प्रस्तुत शोध-पत्रों पर आचार्य श्री आर्जवसागर जी महामुनिराज ने समीक्षात्मक एवं मार्गदर्शक उद्बोधन प्रदान किया। उन्होंने आगम-अनुयोग के अध्ययन की आवश्यकता बताते हुए कहा कि आगम को समझने के लिए केवल शब्दों का अध्ययन पर्याप्त नहीं है। उसके पीछे छिपी आध्यात्मिक भावना, उद्देश्य और अभिप्राय को समझना भी उतना ही आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि अध्ययन, मनन और आचरण—इन तीनों के समन्वय से ही शास्त्र-ज्ञान जीवन में सार्थक परिवर्तन ला सकता है। आचार्य श्री ने देशभर से आए विद्वानों को आशीर्वाद प्रदान करते हुए विद्वत् परंपरा को आगे बढ़ाने और जैन धर्म के ज्ञान एवं संदेश को देश-विदेश में प्रसारित करने की प्रेरणा दी।

बड़ौत की धरती पर बना यादगार ज्ञान-संगम

संगोष्ठी के निर्देशक डॉ. श्रेयांसकुमार जैन, बड़ौत एवं संयोजक इंजी. बहिन ऋषिका जैन, दमोह के विशेष प्रयासों से आयोजन को व्यापक स्वरूप मिला। आयोजक श्री 1008 अजितनाथ दिगम्बर जैन प्राचीन मंदिर कमेटी, मंडी-बड़ौत द्वारा देशभर से आए विद्वानों का स्वागत एवं सम्मान किया गया।

समापन अवसर पर मंदिर कमेटी ने सभी विद्वानों, शोधार्थियों, श्रद्धालुओं एवं सहयोगियों के प्रति आभार व्यक्त किया। दो दिनों तक चले इस आयोजन में ज्ञान, शोध, शास्त्र और अध्यात्म का ऐसा संगम देखने को मिला, जिसने बड़ौत की धरती पर राष्ट्रीय विद्वत् परंपरा का एक नया अध्याय जोड़ दिया।