सीहोर विजय मालवीय
*प्राचीन संस्कृति की अनुपम छटा बिखेरता है बारह खंभा मेला*
*पशुधन के स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए होती है पूजा-अर्चना, लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं*
*सीहोर।* भारत विविध बहुरंगी संस्कृतियों और परंपराओं का देश है, जो अपने जीवंत त्योहारों के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। भारतीय संस्कृति में केवल मनुष्य ही नहीं, बल्कि सृष्टि के प्रत्येक प्राणी के कल्याण की कामना की जाती है। इसका सबसे सुंदर उदाहरण है सीहोर जिला मुख्यालय से 35 किलोमीटर दूर लगने वाला बारह खंभा मेला, जहां पशुओं के स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए पूजा-अर्चना की जाती है।
दीपावली के दूसरे दिन अर्थात पड़वां के दिन इछावर तहसील के ग्राम देवपुरा में बारह खंभा मेला लगता है। यह मेला मध्यक्षेत्र का सबसे बड़ा मेला है, जिसमें दो लाख से अधिक श्रद्धालु पहुंचते हैं।
इस मेले में लाखों जनजातीय वर्ग के लोग अपने इष्ट देव की शिला का दूध से अभिषेक और पूजा-अर्चना कर अपने पशुधन के स्वास्थ्य और सुरक्षा की कामना करते हैं। यहां सुबह से शाम तक हजारों लीटर दूध से देवशिला का अभिषेक किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि देवशिला पर अपने दुधारू पशु का दूध चढ़ाने से वह साल भर रोगमुक्त रहते हैं। जनजातीय समुदाय के अलावा सभी वर्गों के श्रद्धालु यहां आते हैं।
*इसलिए पड़ा नाम बारह खंभा*
बारह खंभा मेला इछावर में प्राचीन काल से ही लगता आ रहा है। इछावर से 15 किमी दूर देवपुरा गांव में जनजातीय समुदाय के आराध्य देव की देवरूपी शिला है, जिसे बारह खंभा वाले देव महाराज के नाम से जाना जाता है। यह 12 शिला स्तंभों से बनी छत के नीचे विद्यमान थी। इसीलिए इस स्थान का नाम बारह खंभा पड़ गया। वर्तमान में देवपुरा गांव बारह खंभा के नाम से ही जाना जाता है।
*क्या है किवदंती?*
इस क्षेत्र में यह किवदंती प्रचलित है कि गांव के एक किसान को लगातार पशुधन की हानि हो रही थी। उसके पशु लगातार बीमार रहते और कुछ समय बाद उनकी मृत्यु हो जाती थी। कुछ समय बाद इस किसान को जंगल में एक ग्वाला मिला। ग्वाले ने उस किसान से कहा कि बारह खंभे के बीच एक देवशिला है। उस देवशिला पर पड़वां के दिन दूध चढ़ाना, फिर साल भर तुम्हारे पशु स्वस्थ रहेंगे। यह बात उस किसान ने ग्रामवासियों को बताई। तभी से यहां दीपावली के दूसरे दिन यानी पड़वां को दूध चढ़ाने की प्रथा शुरू हो गई और मेला लगने लगा।
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