मध्य प्रदेश शासन के उच्च शिक्षा विभाग द्वारा प्रदेश के शासकीय महाविद्यालयों में अध्ययनरत विद्यार्थियों को किताबी ज्ञान के साथ-साथ व्यावहारिक और व्यावसायिक कौशल से जोड़ने के लिए लगातार विशेष प्रयास किए जा रहे हैं। इसका मुख्य उद्देश्य युवाओं को आत्मनिर्भर बनाना, उन्हें स्वावलंबी रूप में तैयार करना तथा स्वरोजगार के नए और बेहतरीन अवसरों से जोड़ना है। आज के इस प्रतिस्पर्धात्मक दौर में पारंपरिक शिक्षा के साथ-साथ आधुनिक तकनीकों का ज्ञान होना हर युवा के लिए अत्यंत आवश्यक हो गया है।

इसी महत्वपूर्ण विजन के तहत कटनी जिले के अंतर्गत आने वाले शासकीय महाविद्यालय विजयराघवगढ़ में स्नातक स्तर के विद्यार्थियों के लिए एक विशेष व्यावसायिक प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. अरुण कुमार सिंह के कुशल मार्गदर्शन में आयोजित इस प्रशिक्षण का मुख्य केंद्र-बिंदु जैविक खेती, शस्य विज्ञान और आधुनिक कृषि तकनीकें हैं। इस प्रशिक्षण के माध्यम से विद्यार्थियों को खेती की उन नवीन विधाओं से अवगत कराया जा रहा है, जिससे भविष्य में वे कृषि के क्षेत्र में न केवल खुद को सक्षम बना सकें बल्कि समाज को भी एक नई दिशा दे सकें।

जैविक कृषि विशेषज्ञ रामसुख दुबे द्वारा दिया जा रहा व्यावहारिक ज्ञान

किसी भी तकनीकी प्रशिक्षण की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसे पढ़ाने वाले विशेषज्ञ का अनुभव और मार्गदर्शन कितना सुदृढ़ है। शासकीय महाविद्यालय विजयराघवगढ़ के इस प्रशिक्षण सत्र में विद्यार्थियों को कृषि क्षेत्र की बारीकियों से रूबरू कराने की जिम्मेदारी जाने-माने जैविक कृषि विशेषज्ञ श्री रामसुख दुबे को सौंपी गई है।

श्री रामसुख दुबे अपने लंबे अनुभव और सरल शिक्षण शैली के माध्यम से विद्यार्थियों को खेती की आधुनिक, वैज्ञानिक और कम लागत वाली तकनीकों की व्यावहारिक जानकारी दे रहे हैं। उनका फोकस इस बात पर अधिक है कि युवा किताबी ज्ञान तक सीमित न रहें, बल्कि वे खेती-किसानी की जमीनी वास्तविकताओं और वैज्ञानिक प्रबंधों को भली-भांति समझ सकें। विद्यार्थियों में भी इस प्रशिक्षण को लेकर खासा उत्साह देखा जा रहा है और वे खेती की बारीकियों को अत्यंत तल्लीनता के साथ सीख रहे हैं।

खेती के विभिन्न प्रकारों और शस्य विज्ञान का विस्तृत अध्ययन

प्रशिक्षण के दौरान विद्यार्थियों को कृषि के विविध स्वरूपों और शस्य विज्ञान (Agronomy) के विभिन्न पहलुओं का गहराई से अध्ययन कराया जा रहा है। कृषि क्षेत्र की विविधता को समझाते हुए विशेषज्ञों ने विद्यार्थियों को निम्नलिखित प्रमुख प्रकारों के बारे में विस्तार से जानकारी दी:

  • विशिष्ट खेती (Specialized Farming): इसके अंतर्गत किसी एक विशेष फसल या उत्पाद पर मुख्य रूप से ध्यान केंद्रित करने की प्रक्रिया को समझाया गया, जिससे अधिकतम लाभ कमाया जा सके।

  • मिश्रित खेती (Mixed Farming): खेती के साथ-साथ पशुपालन या अन्य सहायक गतिविधियों को जोड़कर किसानों की आय को सुरक्षित और स्थिर बनाने के तरीकों पर चर्चा की गई।

  • शुष्क खेती (Dryland Farming): कम वर्षा वाले क्षेत्रों या सीमित सिंचाई के संसाधनों में भी सफलतापूर्वक फसलें उगाने की तकनीकों का प्रशिक्षण दिया गया।

  • बहुफसली खेती (Multiple Cropping): एक ही भूमि पर वर्ष के दौरान एक से अधिक फसलें लेकर भूमि की उर्वरा शक्ति का सदुपयोग करने और उत्पादन बढ़ाने के तौर-तरीके बताए गए।

  • रैंचिंग खेती (Ranching): पशुओं के चरने और व्यापक स्तर पर चारागाह प्रबंधन से जुड़ी कृषि पद्धतियों से विद्यार्थियों को अवगत कराया गया।

इसके साथ ही, शस्य विज्ञान के अंतर्गत आने वाली विभिन्न ঋतुओं की फसलों जैसे खरीफ, रबी एवं जायद की फसलों की विशेषताओं की जानकारी दी गई। विद्यार्थियों को अनाज वाली, दलहनी, रेशे वाली, चारा, शर्करा, सब्जी और तिलहनी फसलों के उत्पादन से जुड़ी वैज्ञानिक तकनीकों के बारे में भी पूर्ण रूप से प्रशिक्षित किया गया।

फसल उत्पादन की वैज्ञानिक प्रक्रिया और प्रबंधन

एक सफल फसल के उत्पादन के लिए बीज चयन से लेकर उसके भंडारण तक कई चरण होते हैं। प्रशिक्षण के दौरान विद्यार्थियों को फसल उत्पादन की इन तमाम प्रक्रियाओं की चरण-दर-चरण वैज्ञानिक जानकारी दी गई:

  1. मिट्टी तैयार करना: खेत की जुताई, पाटा लगाना और मिट्टी की भौतिक दशा सुधारने की विधियां।

  2. बीज चयन और बुवाई: उन्नत किस्म के प्रमाणित बीजों का चयन करने तथा सही गहराई और दूरी पर बुवाई करने का तरीका।

  3. जैविक खाद का उपयोग: रासायनिक उर्वरकों के दुष्प्रभावों से बचते हुए केंचुआ खाद, गोबर की खाद और अन्य जैविक उर्वरकों के प्रयोग से मिट्टी की उपजाऊ क्षमता बनाए रखना।

  4. सिंचाई प्रबंधन: जल संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग करते हुए फसलों को सही समय पर पानी देने की तकनीक।

  5. खरपतवार और कीट नियंत्रण: बिना रासायनिक कीटनाशकों के प्राकृतिक तरीकों से खरपतवारों को नष्ट करना और पौधों की सुरक्षा करना।

  6. कटाई, गहाई एवं भंडारण: फसल के पकने पर उसकी सही समय पर कटाई करना, थ्रेशिंग (गहाई) करना और अनाज को सुरक्षित रखने के लिए वैज्ञानिक भंडारण विधियों को अपनाना।

जीरो बजट फार्मिंग: कम लागत में अधिक उत्पादन की कुंजी

वर्तमान समय में खेती की बढ़ती लागत और रासायनिक खादों पर निर्भरता किसानों के लिए एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है। इस समस्या का सबसे प्रभावी समाधान जीरो बजट नेचुरल फार्मिंग (Zero Budget Natural Farming) है। महाविद्यालय में चल रहे इस प्रशिक्षण का मुख्य आधार यही तकनीक है।

जैविक कृषि विशेषज्ञ श्री रामसुख दुबे ने विद्यार्थियों को समझाया कि जीरो बजट फार्मिंग का मूल उद्देश्य खेती में बाहरी महंगे रासायनिक आदानों (इनपुट) पर खर्च को शून्य करना है। स्थानीय स्तर पर उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों, गोवंश आधारित उत्पादों और पारंपरिक ज्ञान का उपयोग करके किस प्रकार लागत को न्यूनतम किया जा सकता है, इसका व्यावहारिक प्रशिक्षण विद्यार्थियों को दिया जा रहा है। कम से कम लागत लगाकर अधिक से अधिक उत्पादन प्राप्त करना और खेती को एक लाभ का सौदा बनाना ही इस प्रशिक्षण का सर्वोपरि लक्ष्य है।

शस्य विज्ञान के वैज्ञानिक आयाम और सैद्धांतिक पृष्ठभूमि

प्रशिक्षण के दौरान विद्यार्थियों को यह भी बताया गया कि शस्य विज्ञान केवल खेती करने का नाम नहीं है, बल्कि यह एक संपूर्ण वैज्ञानिक अनुशासन है। इसके तहत भूमि का उचित और न्यायसंगत प्रबंधन करते हुए वैज्ञानिक विधियों से फसलों को उगाने का गहन अध्ययन किया जाता है।

श्री रामसुख दुबे ने प्रकाश डालते हुए बताया कि शस्य विज्ञान के दायरे में कई महत्वपूर्ण वैज्ञानिक विषय समाहित हैं, जिनमें मुख्य रूप से निम्नलिखित शामिल हैं:

  • पादप आनुवंशिकी (Plant Genetics): पौधों के वंशानुगत गुणों और उन्नत नस्लों का अध्ययन।

  • पादप क्रिया विज्ञान (Plant Physiology): पौधों के आंतरिक शारीरिक कार्यों, वृद्धि और विकास की प्रक्रिया का अध्ययन।

  • मौसम विज्ञान (Meteorology): मौसम और जलवायु का फसलों पर पड़ने वाले प्रभावों का विश्लेषण।

  • मृदा विज्ञान (Soil Science): मिट्टी के रासायनिक, भौतिक और जैविक गुणों का अध्ययन ताकि फसल की पैदावार को अधिकतम किया जा सके।

निष्कर्ष और भविष्य की दिशा

कटनी जिले के शासकीय महाविद्यालय विजयराघवगढ़ में आयोजित यह तकनीकी प्रशिक्षण सत्र ग्रामीण युवाओं और विद्यार्थियों के लिए वरदान साबित हो रहा है। प्राचार्य डॉ. अरुण कुमार सिंह के नेतृत्व और विशेषज्ञ श्री रामसुख दुबे के मार्गदर्शन में युवा छात्र-छात्राएं पारंपरिक कृषि से हटकर आधुनिक, जैविक और जीरो बजट फार्मिंग की बारीकियों को आत्मसात कर रहे हैं।

यह पहल न केवल महाविद्यालय के विद्यार्थियों को आत्मनिर्भर और स्वावलंबी बनाएगी, बल्कि आने वाले समय में वे अपने क्षेत्र के किसानों को भी आधुनिक और लाभकारी कृषि पद्धतियों अपनाने के लिए प्रेरित कर सकेंगे। इस प्रकार के व्यावहारिक प्रशिक्षण कार्यक्रम उच्च शिक्षा की सार्थकता को सिद्ध करते हैं और देश के कृषि सेक्टर को एक नई ऊर्जा प्रदान करते हैं।

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