Editoral Desk | State News | Amit Shrivastava
सोचिए, रात के दो बजे हैं। आप बहुमंजिला इमारत की चौथी मंज़िल पर सो रहे हैं और नीचे पार्किंग में धुआँ उठ रहा है। सीढ़ियों पर ताला है, अलार्म बजा नहीं, और आग बुझाने का सिलेंडर पिछली बार कब जाँचा गया था, किसी को याद नहीं। ऐसी कहानियाँ हम हर साल अख़बारों में पढ़ते हैं। फ़र्क़ बस जगह और नाम का होता है।
मध्य प्रदेश सरकार ने अब इस कहानी को बदलने की कोशिश की है। नगरीय विकास एवं आवास विभाग ने सोमवार को अधिसूचना जारी करके मध्य प्रदेश अग्निशमन व आपातकालीन सेवा सामान्य नियम-2026 लागू कर दिए हैं। इससे पहले विधानसभा फायर सेफ्टी एवं इमरजेंसी सर्विस विधेयक पारित कर चुकी थी। यानी कानून पहले आया, और अब उसे ज़मीन पर उतारने वाले नियम भी आ गए हैं।
किन इमारतों को फायर NOC लेना होगा?
नियमों में इमारत की ऊँचाई, हर मंज़िल का क्षेत्रफल और उपयोग, तीनों को आधार बनाया गया है। रिपोर्टों के मुताबिक़ मोटा हिसाब यह है:
- आवासीय भवन: 24 मीटर से ऊँचा और प्रति मंज़िल 750 वर्ग मीटर से ज़्यादा क्षेत्रफल हो तो NOC ज़रूरी।
- शैक्षणिक और संस्थागत भवन: 15 मीटर से ऊँचा और प्रति मंज़िल 500 वर्ग मीटर से ज़्यादा हो तो नियम लागू।
- व्यावसायिक और असेंबली भवन: 15 मीटर से ऊँचा और प्रति मंज़िल 750 वर्ग मीटर से ज़्यादा हो तो NOC अनिवार्य।
- औद्योगिक और ख़तरनाक श्रेणी के भवन: क्षेत्रफल के मानकों के आधार पर सर्टिफिकेट लेना होगा, और कई मामलों में ऊँचाई की कोई सीमा नहीं होगी।
यहाँ एक बात ध्यान देने की है। कानून से जुड़ी एक रिपोर्ट में रिहायशी इमारतों के लिए 15 मीटर की सीमा बताई गई है, जबकि नियमों की अधिसूचना पर आधारित रिपोर्ट में यह 24 मीटर है। नियम ही अंतिम और विस्तृत दस्तावेज़ होते हैं, इसलिए अपनी इमारत की श्रेणी पक्की करने के लिए नगरीय निकाय से लिखित जानकारी लेना सबसे सुरक्षित रहेगा।
प्रक्रिया क्या है: कदम दर कदम
पूरी व्यवस्था को आम आदमी की नज़र से देखें तो यह कुछ ऐसी बनती है:
- निर्माण से पहले फायर प्लान की मंज़ूरी। अब किसी भी भवन के निर्माण से पहले फायर प्लान की मंजूरी और फायर एनओसी लेना अनिवार्य होगा। यानी नक्शा पास कराते समय ही आग से बचाव का नक्शा भी पास कराना होगा।
- फायर NOC। निर्धारित श्रेणी की इमारतों को यह प्रमाणपत्र लेना होगा। सरकार निजी विशेषज्ञ एजेंसियों को भी लाइसेंस देगी, जो फायर प्लान, सेफ्टी ऑडिट और सर्टिफिकेशन के काम में मदद करेंगी।
- ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट। फायर NOC के बिना नगरीय निकाय ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट जारी नहीं कर सकेंगे। यानी NOC नहीं तो इमारत में रहने या दुकान चलाने की वैध अनुमति भी नहीं।
- ऑनलाइन आवेदन। राज्य में पहले से ई-नगर पालिका पोर्टल के ज़रिए फायर सेफ्टी प्लान और फायर सेफ्टी सर्टिफिकेट ऑनलाइन जारी किए जा रहे हैं। नए ढाँचे में इसी प्रक्रिया को और पारदर्शी बनाने की बात कही गई है। आवेदन से पहले पोर्टल या अपने नगर निगम और नगर पालिका कार्यालय से ताज़ा फॉर्म और शुल्क की जानकारी ज़रूर ले लें।
- हर साल फायर ऑडिट। यह शायद सबसे बड़ा बदलाव है, जिसकी चर्चा आगे करते हैं।
हर साल 30 जून: ऑडिट की तारीख़ याद रखिए
अब NOC लेकर चैन से बैठने का ज़माना गया। बहुमंजिला और निर्धारित श्रेणी के व्यावसायिक एवं आवासीय भवनों के मालिकों को हर साल 30 जून तक फायर ऑडिट रिपोर्ट सक्षम अधिकारी को सौंपनी होगी। ऑडिट में देखा जाएगा कि अग्निशमन उपकरण चालू हैं या नहीं, निकास के रास्ते खुले हैं या नहीं और बाक़ी सुरक्षा इंतज़ाम ठीक हैं या नहीं।
चूक होने पर भी तुरंत सज़ा नहीं है, पर चेतावनी साफ़ है। रिपोर्ट समय पर जमा न हुई तो पहले कारण बताओ नोटिस मिलेगा, फिर रिपोर्ट देने के लिए तीन महीने का अतिरिक्त समय मिलेगा। इसके बाद भी लापरवाही जारी रही तो फायर सेफ्टी सर्टिफिकेट निरस्त किया जा सकता है।
फायर सुपरवाइजर: हर बड़ी इमारत में एक प्रशिक्षित आदमी
अस्पताल, मॉल, बहुमंजिला इमारतें और व्यावसायिक परिसर अब किसी भी संयोग के भरोसे नहीं रह सकेंगे। इनमें प्रशिक्षित फायर सेफ्टी सुपरवाइजर की नियुक्ति अनिवार्य होगी। तय समय में नियुक्ति न करने पर पहले 10 रुपये प्रति वर्ग मीटर की पेनल्टी लगेगी, और फिर भी पालन न हुआ तो 10 हज़ार रुपये प्रतिदिन तक का जुर्माना लग सकता है।
फायर टैक्स: जेब पर असर कितना?
आम नागरिक के लिए सबसे ज़्यादा दिलचस्पी की बात शायद यही है। नए कानून के तहत नगर निगम, नगर पालिका और नगर परिषद जैसे निकायों को संपत्ति कर के साथ सरचार्ज के रूप में फायर टैक्स वसूलने का कानूनी अधिकार दिया गया है। इस पैसे का मक़सद दमकल सेवाओं का ढाँचा मज़बूत करना और 10 मिनट के भीतर पहुँचने का लक्ष्य पाना बताया गया है।
अब सवाल यह कि कितना देना होगा? यहाँ ख़बरों में अंतर है। एक रिपोर्ट में संपत्ति कर पर 2 प्रतिशत फायर टैक्स की बात है, जबकि दूसरी रिपोर्ट के मुताबिक़ दरें राज्य सरकार तय करेगी और वसूली की प्रक्रिया संबंधित निकायों की अधिसूचनाओं से साफ़ होगी। इसलिए जब तक आपके शहर का निकाय दर घोषित न करे, किसी एक संख्या को पक्का मानकर चलना ठीक नहीं।
जुर्माने और सज़ाएँ: कौन-सी चूक कितनी महँगी?
- बिना फायर NOC के भवन का उपयोग करने पर 5 लाख रुपये तक का जुर्माना।
- प्रशासन द्वारा सील किए गए भवन की सील तोड़ने पर भी 5 लाख रुपये तक का जुर्माना।
- झूठी फायर कॉल या फ़र्ज़ी अलार्म पर 20 हज़ार रुपये तक का जुर्माना।
- सुपरवाइजर नियुक्त न करने पर पेनल्टी और फिर रोज़ाना जुर्माना।
- आपकी लापरवाही से लगी आग से पड़ोसी का नुक़सान हुआ तो भरपाई आपको करनी होगी। पीड़ित 30 दिन के भीतर सक्षम अधिकारी के सामने दावा कर सकता है, जिसका निपटारा अधिकतम 90 दिन में होगा।
सिर्फ़ मालिकों पर नहीं, दमकल पर भी सख्ती
कानून की एक अच्छी बात यह है कि जवाबदेही एकतरफ़ा नहीं है। ड्यूटी के दौरान बिना उचित कारण काम छोड़कर जाने या लापरवाही बरतने वाले दमकलकर्मियों के लिए 3 महीने तक की जेल, 3 महीने की वेतन कटौती या दोनों की सज़ा का प्रावधान है। साथ ही आपात स्थिति में फायर टीम को किसी भी सरकारी या निजी जल स्रोत से बिना शुल्क पानी लेने का अधिकार होगा, ताकि पानी जुटाने में क़ीमती मिनट न गँवाने पड़ें।
नए फायर स्टेशन भी बनेंगे, और उन्हें पुलिस थानों की तर्ज़ पर साफ़ क्षेत्राधिकार और कमान व्यवस्था के साथ विकसित किया जाएगा। यानी "यह इलाक़ा किसके ज़िम्मे है" वाली उलझन में आग नहीं फैलेगी।
शादी के पंडाल और धार्मिक आयोजन भी दायरे में
हमारे यहाँ शादियों और धार्मिक आयोजनों के पंडाल भी बड़े हादसों की वजह बनते रहे हैं। नए नियमों में इन्हें सेल्फ-रेगुलेटरी श्रेणी में रखा गया है। आयोजकों को अग्निरोधी कपड़े इस्तेमाल करने होंगे और निकास द्वार पर्याप्त चौड़े रखने होंगे। नवरात्रि, दीवाली और शादियों के इस मौसम में यह नियम सीधे आम परिवारों से जुड़ता है।
आम आदमी क्या करे?
अगर आप किसी फ्लैट में रहते हैं, तो अपनी सोसायटी की प्रबंध समिति से पूछिए कि फायर NOC है या नहीं, अलार्म और स्प्रिंकलर चालू हैं या नहीं, और सुपरवाइजर कौन है। अगर आप दुकान, क्लिनिक, कोचिंग या कारख़ाना चलाते हैं, तो अपनी श्रेणी और NOC की ज़रूरत नगर निकाय से लिखित में पूछ लें, और 30 जून की तारीख़ कैलेंडर में दर्ज कर लें। अगर आप किसी आयोजन के आयोजक हैं, तो टेंट वाले से सिर्फ़ रेट नहीं, कपड़े की क़िस्म और निकास द्वार के बारे में भी पूछिए। और अगर कहीं कमी दिखे, तो शिकायत करने से न हिचकिए।
चुनौतियाँ भी कम नहीं
कानून जितना सख्त दिखता है, उसकी असली परीक्षा अमल में होगी। प्रदेश के कई छोटे शहरों में दमकल केंद्र, गाड़ियाँ और प्रशिक्षित स्टाफ़ पहले से कम हैं। सालाना ऑडिट तभी असरदार होगा जब निरीक्षण ईमानदार हो और निजी एजेंसियों पर निगरानी रहे। कहीं ऐसा न हो कि सर्टिफिकेट काग़ज़ों में मिलता रहे और इमारतें असुरक्षित बनी रहें। फायर टैक्स से जुटा पैसा सचमुच दमकल सेवाओं पर ही ख़र्च हो, यह पारदर्शिता भी ज़रूरी है। छोटे व्यापारियों और मध्यम वर्ग के लिए प्रक्रिया सरल और शुल्क वाजिब रहे, तो पालन भी बढ़ेगा।
आख़िर में
आग से सुरक्षा कोई महँगी सजावट नहीं, बल्कि वह बीमा है जिसे हम उम्मीद करते हैं कि कभी इस्तेमाल न करना पड़े। नए नियम इसी सोच को क़ानूनी ताक़त देते हैं। अब ज़िम्मेदारी तीन तरफ़ है: सरकार पर कि वह नियम ईमानदारी से लागू करे, भवन मालिकों पर कि वे उन्हें बोझ नहीं, ज़िम्मेदारी मानें, और हम सब पर कि हम अपनी इमारत और अपने आयोजन में सुरक्षा के सवाल पूछना शुरू करें।
क्योंकि आग बताकर नहीं आती, पर तैयारी बताकर की जा सकती है।
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