State News | विशेष राजनीतिक रिपोर्ट | Amit Shrivastava

भारत में चुनाव केवल सरकार चुनने की प्रक्रिया नहीं हैं, बल्कि लोकतंत्र में नागरिकों के विश्वास की सबसे बड़ी परीक्षा भी हैं। ऐसे में जब मतदाता सूची की शुद्धता, चुनाव आयोग की निष्पक्षता और मताधिकार को लेकर सवाल उठने लगें, तो बहस केवल राजनीतिक दलों तक सीमित नहीं रहती। वह आम नागरिक के अधिकारों और लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता से जुड़ जाती है।
अक्टूबर 2026 में मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ देशभर में हो रहे विरोध प्रदर्शनों ने इसी बहस को तेज कर दिया है। कांग्रेस और विपक्षी INDIA गठबंधन उनके इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। दूसरी तरफ, युवाओं के नेतृत्व वाला Cockroach Janta Party (CJP) और छात्र संगठन भी आंदोलन में शामिल हैं। मामला अब संसद और सड़कों से आगे बढ़कर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है।
10 अक्टूबर को दिल्ली में प्रस्तावित CJP प्रदर्शन से पहले पुलिस ने व्यापक सुरक्षा व्यवस्था की और कई प्रदर्शनकारियों तथा आंदोलन के नेताओं को हिरासत में लिया। इससे चुनाव सुधार की बहस के साथ शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के अधिकार पर भी सवाल उठने लगे हैं।

1. आखिर विवाद की असली वजह क्या है?
विवाद के केंद्र में है चुनाव आयोग की Special Intensive Revision (SIR) यानी मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण।
इस प्रक्रिया का घोषित उद्देश्य मतदाता सूची को अद्यतन करना, मृत व्यक्तियों, स्थानांतरित मतदाताओं और डुप्लीकेट प्रविष्टियों की पहचान करना तथा पात्र मतदाताओं का रिकॉर्ड दुरुस्त करना है। चुनाव आयोग के पास मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण का संवैधानिक और कानूनी अधिकार है। लेकिन विरोध करने वाले दलों और संगठनों का आरोप है कि SIR की प्रक्रिया में दस्तावेजों की शर्तें, नामों को हटाने की प्रक्रिया, तकनीकी गड़बड़ियां और अपीलों के निपटारे में देरी वास्तविक मतदाताओं को मतदान से वंचित कर सकती है। विभिन्न राज्यों में मतदाता सूची से बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने के बाद यह विवाद और गहरा हुआ। प्रदर्शनकारी समूहों ने लगभग 13.30 करोड़ नाम हटाए जाने का आंकड़ा उठाया है, लेकिन इस संख्या को पात्र मतदाताओं की गलत तरीके से हुई कुल कटौती मान लेना सही नहीं होगा। हटाए गए नामों में मृत, स्थानांतरित, डुप्लीकेट और अन्य श्रेणियों के मतदाता भी शामिल हो सकते हैं। असली सवाल यह है कि हटाए गए नामों में कितने पात्र मतदाता थे और उन्हें अपनी स्थिति सुधारने का प्रभावी अवसर मिला या नहीं। एक अन्य विवाद Form-6 से जुड़ा है, जिसका इस्तेमाल मतदाता सूची में नाम जुड़वाने के लिए किया जाता है। रिपोर्टों के अनुसार, इसमें अतिरिक्त घोषणा संबंधी बदलाव और उसे लागू करने की प्रक्रिया पर भी सवाल उठे हैं। विरोधियों का आरोप है कि चुनाव आयोग के कुछ निर्णय आवश्यक सामूहिक विचार-विमर्श के बिना लिए गए। आयोग और संबंधित पक्षों की प्रतिक्रिया तथा सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत रिकॉर्ड इस मुद्दे के आगे के कानूनी परीक्षण के लिए महत्वपूर्ण होंगे।

2. कांग्रेस का आंदोलन: इस्तीफे की मांग से राष्ट्रपति तक
कांग्रेस ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय राजनीतिक अभियान का रूप दे दिया है। राहुल गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, प्रियंका गांधी वाड्रा और अन्य नेताओं ने दिल्ली में प्रदर्शन करते हुए मुख्य निर्वाचन आयुक्त के इस्तीफे की मांग उठाई। 6 और 7 अक्टूबर को विपक्षी नेताओं ने चुनाव आयोग के कार्यालय तक पहुंचने और निर्वाचन आयुक्तों से मुलाकात करने का प्रयास किया। पुलिस ने मार्च को रोका और कई नेताओं को हिरासत में लिया। राहुल गांधी और अन्य नेताओं का विरोध प्रदर्शन कई घंटे तक चला। 7 अक्टूबर को छत्तीसगढ़ के लिए निर्धारित CEC का दौरा भी स्थगित कर दिया गया, हालांकि आधिकारिक तौर पर इसके लिए अपरिहार्य कारण बताए गए।
9 अक्टूबर को आंदोलन ने एक नया मोड़ लिया, जब INDIA गठबंधन के नेताओं ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात कर ज्ञापन सौंपा।
ज्ञापन में चार प्रमुख मांगें रखी गईं:

  1. मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा।
  2. SIR को तत्काल रोकना और विपक्ष के अनुसार गलत तरीके से हटाए गए मतदाताओं के नाम बहाल करना।
  3. भविष्य के चुनावों में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों के स्थान पर बैलेट पेपर की वापसी।
  4. पिछले दो वर्षों में हुए उन विधानसभा चुनावों की समीक्षा या निरस्तीकरण, जिनमें विपक्ष का दावा है कि चुनावी अनियमितताओं के निर्णायक प्रमाण मौजूद हैं।

गठबंधन ने 2023 के मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति संबंधी कानून को निरस्त करने की मांग भी उठाई। राहुल गांधी ने कहा कि राष्ट्रपति ने आरोपों के समर्थन में सबूत मांगे हैं और विपक्ष उन्हें प्रस्तुत करेगा। कांग्रेस के लिए आगे की चुनौती अपने राजनीतिक अभियान को ठोस दस्तावेजों, प्रभावित मतदाताओं के मामलों और कानूनी प्रक्रियाओं से जोड़ने की है। केवल इस्तीफे की मांग से आगे बढ़कर उसे यह भी दिखाना होगा कि किन क्षेत्रों में पात्र मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटे और उन मामलों का समाधान कैसे हो सकता है।

3. INDIA गठबंधन: कांग्रेस, TMC, AAP और अन्य दल एक मंच पर
यह आंदोलन अब केवल कांग्रेस का अभियान नहीं रह गया है। INDIA गठबंधन के कई घटक दल इसमें शामिल हुए हैं।
9 अक्टूबर को राष्ट्रपति से मिलने वाले प्रतिनिधिमंडल में कांग्रेस के राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे के साथ तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी, जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला, समाजवादी पार्टी के राजीव राय, NCP (शरदचंद्र पवार) की सुप्रिया सुले, RJD के मनोज झा और वामपंथी दलों के नेता शामिल थे।
AAP ने भी चुनाव प्रक्रिया और विरोध प्रदर्शनों पर कार्रवाई को लेकर चिंता जताई है। विपक्षी दलों का साझा तर्क है कि मतदाता सूची में पारदर्शिता, चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और मताधिकार की सुरक्षा किसी एक पार्टी का नहीं, बल्कि लोकतंत्र का प्रश्न है।
हालांकि
गठबंधन के भीतर सभी दलों की प्राथमिकताएं एक जैसी नहीं हैं। कुछ दल SIR की प्रक्रिया रोकने और नाम बहाल करने पर अधिक जोर देते हैं, जबकि कांग्रेस सहित कुछ नेता बैलेट पेपर की वापसी और निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति संबंधी कानून में बदलाव भी चाहते हैं। यही अंतर आगे गठबंधन की रणनीति को प्रभावित कर सकता है। साझा मंच बनाए रखना और मांगों पर व्यावहारिक सहमति कायम करना उसके लिए महत्वपूर्ण होगा।

4. CJP का आंदोलन: युवाओं का गुस्सा और दिल्ली में हिरासत
इस विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू Cockroach Janta Party यानी CJP का आंदोलन है। यह युवा-केंद्रित समूह चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची में बदलावों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहा है।
CJP ने 2 अक्टूबर को मुंबई में विरोध प्रदर्शन किया था। इसके बाद 10 अक्टूबर को दिल्ली में बड़े प्रदर्शन का आह्वान किया गया। आंदोलन का उद्देश्य ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे, SIR की वापसी और मतदाता सूची से हटाए गए पात्र मतदाताओं के अधिकारों की बहाली की मांग को राष्ट्रीय स्तर पर उठाना है। 10 अक्टूबर को दिल्ली पुलिस ने CJP के संस्थापक अभिजीत डिपके और अन्य नेताओं को दिल्ली पहुंचने पर हिरासत में लिया। विभिन्न रिपोर्टों में बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिए जाने की जानकारी सामने आई। प्रशासन ने सुरक्षा और कानून-व्यवस्था का हवाला दिया, जबकि प्रदर्शनकारियों ने इसे शांतिपूर्ण विरोध को रोकने की कार्रवाई बताया।
CJP और All India Students' Association (AISA) ने भी इस आंदोलन को समर्थन दिया है। इन समूहों की मांगों में SIR वापस लेने, 2025 की मतदाता सूचियों को आधार बनाने और गलत तरीके से हटाए गए मतदाताओं को बहाल करने जैसे प्रस्ताव शामिल हैं। कुछ प्रदर्शनकारी बैलेट पेपर की वापसी और 2023 के नियुक्ति कानून को निरस्त करने की भी मांग कर रहे हैं।
यहां एक जरूरी अंतर समझना होगा। पुलिस द्वारा हिरासत में लिया जाना अपने आप में किसी आरोप को सही या गलत साबित नहीं करता। उसी तरह प्रशासन द्वारा कानून-व्यवस्था का हवाला देना भी शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार की न्यायिक समीक्षा को समाप्त नहीं करता। दोनों पक्षों के कदमों का आकलन उपलब्ध तथ्यों और कानून के आधार पर होना चाहिए।

5. सुप्रीम कोर्ट में अब तक क्या हुआ?
इस विवाद में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां राजनीतिक आरोपों के साथ चुनाव आयोग की कानूनी शक्तियों और निर्णय लेने की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए गए हैं।
बिहार SIR पर पहले का फैसला
27 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में SIR कराने के चुनाव आयोग के अधिकार को वैध माना। अदालत ने माना कि मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करना स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ यह नहीं है कि SIR के तहत लिया गया हर निर्णय स्वतः सही है। किसी विशिष्ट मतदाता का नाम हटाने, प्रक्रिया में अनियमितता या अपील के निपटारे से जुड़े सवालों की अलग से जांच की जा सकती है।
5 अक्टूबर: CEC को निलंबित करने से इनकार, लेकिन नोटिस जारी
सुप्रीम कोर्ट ने 5 अक्टूबर को उस याचिका पर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग से जवाब मांगा, जिसमें आरोप लगाया गया था कि महत्वपूर्ण फैसले अन्य दो निर्वाचन आयुक्तों की सहमति या जानकारी के बिना लिए गए। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने तत्काल अंतरिम आदेश देकर ज्ञानेश कुमार को निलंबित करने से इनकार किया। अदालत ने कहा कि चुनाव आयोग को सामूहिक रूप से काम करना चाहिए और निर्णय नियमों के अनुसार सर्वसम्मति या बहुमत से होने चाहिए। याचिका में SIR, मतदान केंद्रों के युक्तिकरण और आदर्श आचार संहिता से जुड़े फैसलों पर सवाल उठाए गए। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि कुछ निर्णय CEC ने अकेले लिए। अदालत ने फिलहाल इन आरोपों को सिद्ध तथ्य नहीं माना, बल्कि संबंधित पक्षों से जवाब मांगते हुए मामले की जांच आगे बढ़ाई।
Form-6 पर सवाल
अदालत के सामने Form-6 में किए गए बदलावों का मुद्दा भी आया। रिपोर्टों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसने उस अतिरिक्त घोषणा को मंजूरी नहीं दी थी, जिसके लिए नए मतदाताओं से पुराने मतदाता रिकॉर्ड से संबंध जोड़ने की जानकारी मांगी जा रही थी।
अदालत ने यह जानने में रुचि दिखाई कि बदलाव किसने और किस अधिकार के तहत किया। इस मुद्दे पर चुनाव आयोग से रिपोर्ट और स्पष्टीकरण मांगे जाने की जानकारी सामने आई है।
पश्चिम बंगाल: हटाए गए मतदाताओं की अपील
9 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के खिलाफ दायर अपीलों पर प्राथमिकता से सुनवाई की संभावना पर विचार किया। पांच आवेदकों ने अदालत से आग्रह किया कि उनकी अपीलों का शीघ्र निपटारा हो, ताकि वे नवंबर में प्रस्तावित कोलकाता और हावड़ा नगर निकाय चुनावों में मतदान कर सकें।
रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयोग ने पहले अदालत को बताया था कि SIR के बाद पश्चिम बंगाल में दाखिल 38 लाख से अधिक अपीलों में 22 लाख से ज्यादा हटाए गए मतदाताओं से संबंधित थीं। सुप्रीम कोर्ट ने इस विषय पर 16 अक्टूबर को सुनवाई करने की बात कही। अदालत यह भी विचार कर रही है कि अपीलों के निपटारे में तेजी लाने के लिए न्यायाधिकरणों को क्या निर्देश दिए जा सकते हैं।
इसलिए फिलहाल यह कहना सही नहीं होगा कि सुप्रीम कोर्ट ने CEC को दोषी ठहरा दिया है या SIR को पूरे देश में अवैध घोषित कर दिया है। अदालत ने कुछ मामलों में SIR के अधिकार को मान्यता दी है, जबकि दूसरी याचिकाओं में प्रक्रिया, पारदर्शिता और निर्णय लेने के तरीके की जांच जारी है।

6. समाधान क्या हो सकते हैं?
इस विवाद का समाधान केवल किसी एक व्यक्ति के इस्तीफे या विरोध प्रदर्शन समाप्त होने से नहीं निकलेगा। इसके लिए ऐसे कदम जरूरी हैं जिनसे मतदाता सूची की विश्वसनीयता और चुनाव आयोग की निष्पक्षता दोनों मजबूत हों।
पहला, हटाए गए नामों का पारदर्शी रिकॉर्ड: प्रत्येक हटाए गए नाम के लिए स्पष्ट कारण, संबंधित दस्तावेज और अपील की प्रक्रिया उपलब्ध होनी चाहिए। मतदाता को यह जानने का अधिकार होना चाहिए कि उसका नाम क्यों हटाया गया।
दूसरा, अपीलों का समयबद्ध निपटारा: विशेषकर उन मतदाताओं के मामले प्राथमिकता से सुने जाने चाहिए जिनके क्षेत्र में चुनाव निकट हैं। अपील लंबित रहने के कारण किसी पात्र नागरिक का मतदान का अवसर समाप्त न हो, इसके लिए अदालत और कानून के अनुरूप व्यावहारिक व्यवस्था बनाई जा सकती है।
तीसरा, चुनाव आयोग में सामूहिक निर्णय प्रक्रिया: महत्वपूर्ण निर्णयों का रिकॉर्ड, निर्वाचन आयुक्तों की राय और असहमति की स्थिति में अपनाई गई प्रक्रिया स्पष्ट होनी चाहिए। इससे किसी एक अधिकारी के निर्णय लेने को लेकर उठने वाले संदेह कम हो सकते हैं।
चौथा, स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट: मतदाता सूची से जुड़े सॉफ्टवेयर, डेटा मिलान और नाम हटाने की प्रक्रिया की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए। तकनीकी प्रणाली में त्रुटि मिलने पर सुधार की समयसीमा और जिम्मेदारी भी निर्धारित होनी चाहिए।
पांचवां, नियुक्ति कानून पर व्यापक बहस: निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति और संस्थागत स्वतंत्रता से संबंधित कानून में बदलाव की मांग पर संसद में चर्चा हो सकती है। इसका उद्देश्य किसी दल को लाभ पहुंचाना नहीं, बल्कि सभी राजनीतिक दलों और नागरिकों का भरोसा मजबूत करना होना चाहिए।
छठा, शांतिपूर्ण विरोध और कानून-व्यवस्था में संतुलन: प्रशासन को वास्तविक सुरक्षा जोखिमों से निपटने का अधिकार है, लेकिन विरोध की अनुमति, हिरासत और प्रतिबंधों पर स्पष्ट तथा अनुपातिक नियम लागू होने चाहिए। राजनीतिक दलों और आंदोलनकारी समूहों को भी शांतिपूर्ण प्रदर्शन और कानूनी प्रक्रिया का सम्मान करना चाहिए।

निष्कर्ष: असली परीक्षा लोकतंत्र में भरोसा बहाल करने की है
ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन भारत की चुनाव व्यवस्था को लेकर बढ़ती राजनीतिक और सामाजिक चिंता को सामने लाते हैं। कांग्रेस और INDIA गठबंधन इसे चुनावी पारदर्शिता और मताधिकार की लड़ाई बताते हैं। CJP और छात्र संगठन भी इसी मुद्दे पर आंदोलन कर रहे हैं। वहीं, चुनाव आयोग के अधिकार और SIR की वैधता से संबंधित सवालों पर न्यायिक परीक्षण जारी है।
आगे की दिशा इस बात से तय होगी कि आरोपों के समर्थन में क्या प्रमाण प्रस्तुत किए जाते हैं, हटाए गए मतदाताओं की अपीलों का निपटारा कितनी तेजी से होता है और चुनाव आयोग अपने निर्णयों में पारदर्शिता कैसे सुनिश्चित करता है।
लोकतंत्र में मतदाता सूची का साफ होना जरूरी है, लेकिन उतना ही जरूरी है कि कोई पात्र मतदाता गलती, तकनीकी समस्या या दस्तावेजी बाधा के कारण अपने मताधिकार से वंचित न हो।

 

अंततः सवाल केवल यह नहीं है कि ज्ञानेश कुमार अपने पद पर बने रहते हैं या नहीं। बड़ा सवाल यह है कि क्या चुनाव आयोग की प्रक्रिया इतनी पारदर्शी और जवाबदेह बन सकती है कि चुनाव के नतीजों से असहमत नागरिक भी व्यवस्था की निष्पक्षता पर भरोसा कर सकें।

 

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