State News | National Politics | 29 September 2026 | Amit Shrivastava
भारत में चुनाव की विश्वसनीयता केवल मतदान के दिन तय नहीं होती। चुनाव से पहले तैयार होने वाली मतदाता सूची उतनी ही महत्वपूर्ण है। किसका नाम सूची में है, किसका नाम नहीं है, किस नाम को लेकर आपत्ति है और किसी नागरिक को अपना नाम साबित करने के लिए क्या प्रक्रिया अपनानी होगी, ये सभी सवाल लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियाद से जुड़े हैं।
इसी संदर्भ में Election Commission of India यानी ECI का Special Intensive Revision, SIR इस समय देश की सबसे चर्चित चुनावी प्रक्रियाओं में शामिल है। चुनाव आयोग इसे मतदाता सूचियों को अधिक सटीक, अद्यतन और विश्वसनीय बनाने की प्रक्रिया के रूप में देखता है। दूसरी ओर, Indian National Congress और कुछ अन्य विपक्षी दल SIR के तरीके, verification, संभावित exclusions, documents, appeals और Election Commission की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठा रहे हैं।
सितंबर 2026 में यह विवाद सड़क से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। कांग्रेस ने देश के अलग-अलग राज्यों में प्रदर्शन किए हैं और Chief Election Commissioner Gyanesh Kumar के इस्तीफे की मांग को अपने अभियान का प्रमुख हिस्सा बनाया है। भोपाल में भी कांग्रेस ने SIR के विरोध में प्रदर्शन किया।
लेकिन SIR को समझने के लिए सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि आखिर यह प्रक्रिया है क्या, इसकी जरूरत क्यों बताई जा रही है और विवाद किस बात पर है।
SIR क्या है और इसकी जरूरत क्यों बताई जा रही है?
Special Intensive Revision यानी SIR मतदाता सूचियों का विशेष और व्यापक पुनरीक्षण है। सामान्य revision के मुकाबले इसमें electoral rolls की जमीनी स्तर पर अधिक विस्तृत जांच और verification किया जाता है।
समय के साथ मतदाता सूची में कई तरह के बदलाव आते हैं। किसी मतदाता की मृत्यु हो सकती है, कोई व्यक्ति स्थायी रूप से दूसरे स्थान पर जा सकता है, कोई नया नागरिक मतदान की उम्र तक पहुंच सकता है या एक ही व्यक्ति का नाम अलग-अलग स्थानों पर दर्ज हो सकता है। तेजी से बढ़ते urbanisation और migration के कारण पुराने electoral records और वास्तविक स्थिति के बीच अंतर भी पैदा हो सकता है।
27 मई 2026 के अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने बिहार के संदर्भ में यह दर्ज किया कि वहां पिछला intensive revision 2003 में हुआ था और इसके बाद लंबे समय तक summary revisions के जरिए electoral rolls को अपडेट किया जाता रहा। कोर्ट ने SIR की वैधता पर विचार करते हुए electoral roll की accuracy और reliability को free and fair elections से जोड़ा।
वर्तमान Phase III में ECI के अनुसार 16 राज्यों और 3 केंद्र शासित प्रदेशों में SIR किया जा रहा है। इसके तहत 3.94 लाख से अधिक Booth Level Officers करीब 36.73 करोड़ electors के घर-घर जाएंगे, जबकि राजनीतिक दलों द्वारा नियुक्त लगभग 3.42 लाख Booth Level Agents भी प्रक्रिया में भाग लेंगे।
इसका उद्देश्य केवल नाम हटाना नहीं है। उद्देश्य electoral roll को verify करना, नए पात्र मतदाताओं को शामिल करना, गलतियों को सुधारना और अपात्र या duplicate entries की पहचान करना है।
भारत में SIR और मतदाता सूची revision की सामान्य प्रक्रिया
मतदाता सूची का revision भारत की चुनावी व्यवस्था में कोई नई अवधारणा नहीं है। Election Commission समय-समय पर electoral rolls को update करता है। नए मतदाताओं का registration, address correction, नाम में बदलाव और अन्य संशोधन इसी व्यवस्था का हिस्सा हैं।
SIR में field-level verification का महत्व अधिक होता है। Booth Level Officers मतदाताओं से संपर्क करते हैं और electoral records की जानकारी verify करते हैं। Election Commission के electoral roll portal पर मतदाता अपना नाम खोज सकते हैं, registration और correction से संबंधित services का उपयोग कर सकते हैं तथा SIR से जुड़े resources भी देख सकते हैं।
ECI ने SIR को participative exercise बताया है। इसके अनुसार political parties को प्रत्येक polling booth के लिए Booth Level Agents नियुक्त करने के लिए कहा गया है, ताकि revision process में राजनीतिक दलों की भागीदारी और transparency बनी रहे।
यानी सामान्य सिद्धांत यह है कि मतदाता सूची लगातार update होती रहे और किसी भी correction या exclusion के लिए निर्धारित प्रक्रिया उपलब्ध हो।
यहीं से SIR की दूसरी महत्वपूर्ण बात सामने आती है। मतदाता सूची को साफ करना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है कि कोई genuine voter गलती से सूची से बाहर न हो।
कांग्रेस की SIR पर मुख्य आपत्तियां क्या हैं?
कांग्रेस का विरोध मुख्य रूप से SIR के implementation और safeguards को लेकर है। पार्टी का आरोप है कि बड़े पैमाने पर verification और संभावित exclusions से genuine voters प्रभावित हो सकते हैं।
कांग्रेस और विपक्षी दलों की ओर से उठाए जा रहे प्रमुख सवालों में शामिल हैं:
- किसी मतदाता को notice देने या उसका नाम हटाने का स्पष्ट कारण क्या है?
- पुराने electoral rolls से mapping कैसे की जा रही है?
- जिन नागरिकों के पास पुराने documents नहीं हैं, उनके लिए क्या पर्याप्त विकल्प हैं?
- Notice मिलने के बाद response और appeal के लिए कितना समय और सहायता उपलब्ध है?
- बड़ी संख्या में appeals को समय पर कौन और कैसे निपटाएगा?
- Election Commission की decision-making और internal functioning कितनी transparent है?
सितंबर के अंतिम सप्ताह में कांग्रेस ने इन मुद्दों को लेकर देशव्यापी demonstrations किए। बिहार में पार्टी ने विभिन्न जिलों और शहरों में protest marches आयोजित किए। राजस्थान में कांग्रेस नेताओं के प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने water cannons का इस्तेमाल किया और नेताओं को हिरासत में लिया।
भोपाल में भी कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने SIR के खिलाफ प्रदर्शन करते हुए CEC Gyanesh Kumar के इस्तीफे की मांग की।
यहां यह अंतर रखना जरूरी है कि कांग्रेस द्वारा लगाए गए आरोप राजनीतिक दावे हैं। Election Commission इन आरोपों को स्वीकार नहीं करता और SIR को electoral rolls की integrity बनाए रखने की अपनी जिम्मेदारी का हिस्सा बताता है।
सुप्रीम कोर्ट ने SIR पर शुरुआती तौर पर क्या कहा?
SIR विवाद में सबसे महत्वपूर्ण न्यायिक पड़ाव 27 मई 2026 का Supreme Court judgment है।
Association for Democratic Reforms और अन्य याचिकाओं से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में SIR करने की Election Commission की शक्ति को बरकरार रखा।
अदालत ने Article 324 और Representation of the People Act, 1950 की Section 21(3) के तहत Election Commission को special revision करने की शक्ति को मान्यता दी। Court ने कहा कि Section 21(3) Election Commission को विशेष revision का अधिकार देता है, बशर्ते वह reasons record करे।
यह फैसला SIR की मूल constitutional और statutory authority के प्रश्न पर महत्वपूर्ण है।
लेकिन इसे इस अर्थ में नहीं देखा जाना चाहिए कि SIR के तहत होने वाली हर individual administrative action न्यायिक समीक्षा से बाहर है। बाद की अदालत की कार्यवाहियों में notice, verification, appeals और procedural safeguards जैसे मुद्दे अलग-अलग रूप में सामने आए हैं।
एक और महत्वपूर्ण distinction है। Electoral roll में किसी व्यक्ति की eligibility की जांच और उसकी citizenship का अंतिम कानूनी निर्धारण एक ही प्रक्रिया नहीं है। इसलिए SIR को citizenship adjudication की पूरी प्रक्रिया बताना सही नहीं होगा।
सुप्रीम कोर्ट के 2026 के फैसले में Aadhaar के मुद्दे पर भी महत्वपूर्ण clarification आया। Court ने कहा कि Aadhaar citizenship का proof नहीं है, लेकिन Representation of the People Act के तहत identity establish करने के सीमित उद्देश्य से इसे consideration में लिया जा सकता है।
वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट में SIR से जुड़े कौन से मुद्दे हैं?
1. West Bengal SIR
West Bengal में SIR के बाद बड़ी संख्या में voters से जुड़े appeals और grievances सामने आए हैं। सितंबर में Election Commission की ओर से Supreme Court को दी गई जानकारी के अनुसार बड़ी संख्या में deleted voters ने inclusion के लिए appeals दाखिल की हैं।
29 सितंबर को Supreme Court ने West Bengal SIR से जुड़े एक मामले की hearing को जल्द करने की मांग स्वीकार नहीं की। Court ने संकेत दिया कि तत्काल urgency का आधार सीमित है और मामला अपने नियमित schedule पर आगे बढ़ेगा।
West Bengal का मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां सवाल केवल voter list revision का नहीं, बल्कि exclusion के बाद appeals को कितनी तेजी से और प्रभावी तरीके से निपटाया जा रहा है, इसका भी है।
2. Delhi SIR और notices का सवाल
Delhi SIR से जुड़े मामलों में notices और "logical discrepancy" जैसे grounds को लेकर सवाल उठे हैं।
इस तरह के मामलों में मूल प्रश्न यह है कि अगर किसी voter को adverse notice मिलता है तो क्या उसे पर्याप्त जानकारी दी जा रही है कि discrepancy क्या है और उसे दूर करने के लिए कौन सा evidence देना होगा।
यह SIR की constitutional power से अलग implementation और due-process का सवाल है।
3. Election Commission की functioning पर broader legal scrutiny
सितंबर के अंतिम सप्ताह में Supreme Court के सामने Election Commission की functioning से जुड़े broader questions भी पहुंचे हैं। 29 सितंबर को Court ने ECI के कामकाज को चुनौती देने वाली एक petition पर early hearing के लिए अगले सप्ताह की तारीख तय करने पर सहमति जताई।
इसी बीच Chief Election Commissioner और अन्य Election Commissioners के बीच कथित internal differences को लेकर भी राजनीतिक बहस तेज हुई है। Indian Express की एक रिपोर्ट के अनुसार दो Election Commissioners ने पिछले 10 महीनों में कई मामलों पर written objections दर्ज किए थे। Election Commission ने जवाब में कहा कि decision-making में differing views होना सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है और आयोग के फैसले unanimous रहे हैं।
इन घटनाओं को SIR के हर individual decision के खिलाफ judicial finding के रूप में नहीं पढ़ना चाहिए। यह एक broader institutional debate है, जिसमें ECI की decision-making process भी चर्चा का विषय बनी है।
Election Commission का पक्ष क्या है?
Election Commission SIR को electoral rolls को accurate और reliable बनाने की प्रक्रिया बताता है।
ECI के अनुसार Phase III में political parties के Booth Level Agents को भी शामिल किया गया है। आयोग ने यह भी कहा है कि SIR participative exercise है जिसमें electors, political parties और election officials सभी stakeholders हैं।
26 सितंबर की Commission meeting के बाद ECI ने unmapped और logical discrepancy वाले voters से संबंधित एक महत्वपूर्ण procedural change भी बताया। ऐसे मामलों में BLOs voters के घर जाकर documents collect कर सकते हैं और उन्हें ECINet पर upload कर सकते हैं। ऐसे voters को सामान्यतः ERO/AERO office में hearing के लिए बुलाने की जरूरत नहीं होगी, हालांकि exceptional cases में hearing हो सकती है।
यह बदलाव इस बहस के बीच महत्वपूर्ण है कि verification प्रक्रिया नागरिकों के लिए कितनी accessible होनी चाहिए।
कांग्रेस की protest strategy क्या है?
कांग्रेस ने SIR के खिलाफ अपनी रणनीति को केवल एक राज्य तक सीमित नहीं रखा है। पार्टी का अभियान कई स्तरों पर चल रहा है।
पहला स्तर, nationwide mobilisation। कांग्रेस ने state units को Election Commission से जुड़े offices तक protest marches करने का आह्वान किया है। सितंबर के अंतिम सप्ताह में कई राज्यों में demonstrations हुए।
दूसरा स्तर, CEC की जवाबदेही। कांग्रेस ने Chief Election Commissioner Gyanesh Kumar के इस्तीफे की मांग को अपने campaign का प्रमुख हिस्सा बनाया है। कई protests में इस मांग के साथ independent inquiry की भी मांग उठी है।
तीसरा स्तर, voter rights को राजनीतिक मुद्दा बनाना। कांग्रेस SIR को केवल electoral roll revision नहीं, बल्कि voter rights और electoral transparency के व्यापक मुद्दे से जोड़ रही है।
इसके साथ ही protests में अलग-अलग राज्यों में पुलिस कार्रवाई भी देखने को मिली है। Jaipur में कांग्रेस नेताओं को detention और water cannon का सामना करना पड़ा, जबकि अन्य स्थानों पर भी police intervention की खबरें सामने आईं।
इस protest strategy का वास्तविक महत्व आगे इस बात से तय होगा कि individual voter grievances कितनी तेजी से resolve होती हैं और Election Commission procedural safeguards को किस तरह लागू करता है।
असली सवाल: साफ मतदाता सूची या सुरक्षित मताधिकार?
SIR पर चल रही बहस को केवल "कांग्रेस बनाम Election Commission" के रूप में देखना इस मुद्दे को छोटा कर देता है।
एक तरफ electoral roll की accuracy लोकतंत्र के लिए जरूरी है। यदि मृत व्यक्ति, duplicate entries या स्थायी रूप से स्थान बदल चुके लोगों के नाम बने रहते हैं, तो voter database की quality प्रभावित हो सकती है।
दूसरी तरफ, यदि verification process में genuine voter की स्थिति गलत तरीके से flag हो जाती है और appeal मुश्किल या धीमी हो, तो उसका प्रभाव सीधे नागरिक के voting right पर पड़ सकता है।
इसलिए असली चुनौती दोनों उद्देश्यों के बीच संतुलन बनाने की है।
सटीक मतदाता सूची भी चाहिए और पात्र मतदाता की सुरक्षा भी।
आगे क्या देखना महत्वपूर्ण होगा?
SIR पर आने वाले समय में कुछ आंकड़े और घटनाएं विशेष रूप से महत्वपूर्ण होंगी:
- कितने voters verification में flagged हुए।
- कितने नाम final electoral rolls में retained या restored हुए।
- कितनी appeals pending हैं और उनका disposal किस गति से हो रहा है।
- कितने cases में notices और mapping को लेकर विवाद सामने आते हैं।
- Supreme Court West Bengal और Delhi से जुड़े मामलों में क्या procedural directions देता है।
- Election Commission अपने verification criteria और safeguards को किस तरह और कितना स्पष्ट करता है।
इन सवालों के जवाब SIR की प्रशासनिक सफलता के साथ-साथ public trust के लिए भी महत्वपूर्ण होंगे।
निष्कर्ष: SIR की असली परीक्षा voter list के साथ voter trust की भी है
SIR का घोषित उद्देश्य electoral rolls को अधिक accurate और updated बनाना है। Supreme Court ने मई 2026 में Election Commission की SIR करने की शक्ति को मान्यता दी है। लेकिन इसके बाद की घटनाओं ने यह स्पष्ट किया है कि किसी प्रक्रिया की legal authority और उसकी implementation quality अलग-अलग सवाल हो सकते हैं।
कांग्रेस ने SIR को लेकर देशभर में विरोध प्रदर्शन शुरू किए हैं और CEC Gyanesh Kumar के इस्तीफे की मांग को अभियान का प्रमुख मुद्दा बनाया है। Election Commission दूसरी ओर SIR को electoral roll की integrity से जुड़ी प्रक्रिया बताता है। Supreme Court में West Bengal, Delhi और Election Commission की functioning से जुड़े अलग-अलग procedural और institutional questions अभी भी महत्वपूर्ण हैं।
आखिरकार मतदाता सूची केवल एक सरकारी database नहीं है। वह उस नागरिक के लोकतांत्रिक अधिकार का आधार है जो मतदान केंद्र तक पहुंचता है।
इसलिए एक मजबूत electoral system के लिए दो लक्ष्य एक साथ जरूरी हैं: अपात्र entries की पहचान और प्रत्येक पात्र मतदाता की सुरक्षा।
SIR की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जाएगी कि कितने नाम हटाए गए। उतना ही महत्वपूर्ण होगा कि कितने genuine voters की स्थिति स्पष्ट हुई, कितनी appeals समय पर सुनी गईं और क्या पूरी प्रक्रिया एक सामान्य नागरिक के लिए समझने और इस्तेमाल करने योग्य रही।
यही वह बिंदु है जहां electoral roll की accuracy और voter trust एक-दूसरे से जुड़ते हैं।
Image Source: https://inc.org
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