हटा /- जैन धर्म की दस लक्षण पर्व प्रारंभ होते ही नगर के चारों जैन मंदिरों में भक्तों की भीड़ उमड़ने लगी है सभी मंदिरों में प्रातः अभिषेक, शांति धारा, पूजन विधान का संगीत में आयोजन किया जा रहा है,सांगानेर राजस्थान से आई महिमा दीदी,रिया दीदी ,रुचि एवं पूजा दीदी के द्वारा धर्म देशना दी जा रही है साथ ही सारे दिन धार्मिक आयोजन के साथ-साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम के माध्यम से पर्व की महत्वता बतलाई जा रही है।
उत्तम क्षमा धर्म..
दशलक्षण पर्व के प्रथम दिवस उत्तम क्षमा धर्म के दिन दीदी रुचि ने बताया कि जिस पर्युषण महापर्व, जिस दशलक्षण धर्म का पालन हम लोग कर रहे हैं, उसका संबंध युग के आरंभ से है। यह पर्व एक त्रैकालिक पर्व है जो तीनों लोकों में, तीनों समय मनाया जाता है। धरती में एक बीज बोया जाता है। वह बीज मृदु माटी का संसर्ग पाकर नम होता है। उसके भीतर से अंकुर फूटता है, फिर उसमें विकास होता है और क्रमशः वृक्ष का रूप धारण करता है। जो दशा एक बीज से वृक्ष की है, वही दशा क्षमा से लेकर ब्रह्मचर्य तक की है। धरती का मतलब होता है क्षमा। जब हम अपने भीतर धर्म का बीज क्षमा की धरती पर डालते हैं, तो हमारी चेतना का बीज अंकुरित होता है। मृदु माटी के संसर्ग से मृदुता आना यानी मार्दव आना और उसके बाद उससे जो अंकुर फूटता है, वह एक दम सीधा निकलता है। इसी का नाम सरलता और आर्जव है। फिर ऐसे वह अंकुर उगकर बाहर आता है, उसका खरपतवार उग जाता है, उसकी सफाई का नाम शौच है। और सत्य के सूरज के दर्शन पाते ही वह संयम रूपी फूल खिलते हैं और धूप में तपता हुआ फल लगते हैं। उन फलों को अपने पास न रखकर वह फलों का त्याग देता है और जब पेड़ फलों को त्याग देता है तो उससे आकिंचन्य स्वरूप प्रकट होता है, ममत्व रहित हो जाता है और यही हमारे परम ब्रह्म का स्वरूप है, यही ब्रह्मचर्य है। इस प्रकार से यह दशलक्षण की यात्रा है, बड़ी अद्भुत कड़ी है। आज दशलक्षण का पहला धर्म क्षमा। क्षमा की महिमा हम सब ने सुनी है। मैं सोचती हूँ, पर किसकी बात करूँ जब कभी क्षमा की बात आती है, तो बहुत सारी स्थितियाँ क्षमा की प्रतिमूर्ति दिख जाती हैं।
जो वास्तविक क्षमा है, उसे कहा जाता है—
"सत्यपि प्रतिकारसामर्थ्येऽपकारसहनं क्षमा।"
अर्थात, प्रतिकार का सामर्थ्य होते हुए भी दूसरे के अपकार को सहन करना क्षमा है और यही वास्तविक क्षमा है। हम क्रोध रूपी ज़हर को अपने जीवन में अंगीकार करते हैं और उससे हम खुद का ही सर्वनाश करते हैं। इसीलिए हमें इस क्रोध रूपी ज़हर को नाश करके क्षमा रूपी अमृत को अपने जीवन में धारण करना है और अपनी इस आत्मा का कल्याण कर मोक्ष रूपी लक्ष्मी को प्राप्त करना है।
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